नीलम ज्योति
पिता हैं तो पता नहीं चलता-
गर्म थपेड़ों का सर्द बयार का।
लिए हुए कर्ज का दिए हुए उधार का।
गिरते हुए लोगों का उठते हुए बाजार का।
खेत ना खलिहान का ना ही घरबार का।
ना किसी मजदूर का ना ही चौकीदार का।
ना ही बुआ दीदी का ना किसी बीमाऱ का।
पिता हैं तो पता नहीं चलता –
खिलौनों के दाम का बढ़ते हुए काम का।
दूध की कमी का ना किसी अंजाम का।
उगते हुए सूर्य का ढलती हुई शाम का।
घर आए मेहमान का विदाई के इंतज़ाम का।
बुआ ज़ी की साड़ी का फूफा जी के ज़ाम का।
दादी की थकान का ना मम्मी के आराम का।
पिता हैं तो पता नहीं चलता –
व्यापार में घाटे का गीले सूखे आटे का।
ना किसी के साझे का ना किसी के बांटे का।
ना किसी के पीटे का ना किसी के डांटे का।
ना दीदी की झिकझिक का ना भैया के चांटे का।
ना गिरकर लगी चोट का ना कुत्ते के काटे का।
ना शूलों की चुभन का ना लगे पैर में काटे का।
(चेतना विकास मिशन)

