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सत्ता का चहेता ‘चुनाव आयोग

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कुमार प्रशांत

केन्द्र की सत्ता पर काबिज पार्टियों की मनमर्जी से मनचीते चुनाव आयुक्तों की बहाली पर अब सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले से रोक लगने की संभावना है,लेकिन क्या यह मौजूदा राजनीतिक जमातों के चलते संभव होगा? क्या बेलगाम लोकतांत्रिक संस्थाओं, खासकर विधायिका, के होते हुए यह कारगर हो सकेगा?

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ गया है कि अब ‘चुनाव आयोग’ का चयन तीन सदस्यों की एक समिति करेगी, न कि प्रधानमंत्री के इशारे पर नौकरशाही के चापलूसों का पत्ता फेंटकर चयन किया जाएगा। यह फैसला तब तक लागू रहेगा, जब तक संसद इसके लिए कोई नया कानून नहीं बनाती। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि न्यायपालिका ने विधायिका को उसकी भूमिका और मर्यादा इस तरह आदेश देकर समझाई है।  

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद से सत्तापक्ष में एकदम सन्नाटा है। विपक्ष ने भी थोड़ी-बहुत प्रतिक्रिया से ज्यादा कुछ नहीं कहा है। यह सन्नाटा क्यों है भाई? इसलिए कि सभी जान रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सत्ता व विपक्ष दोनों के पर कतर रहा है। जिस हम्माम में सब नंगे हों, उसमें तौलिये की बात करना सबकी नंग खोल देता है।  

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सत्तापक्ष की नीयत पर तीखी टिप्पणी करता है। यह टिप्पणी इतनी कठोर व मर्म पर चोट करने वाली है कि यदि हमारी व्यवस्था में थोड़ी भी लोकतांत्रिक आत्मा बची होती तो ‘चुनाव आयोग’ के वर्तमान अध्यक्ष का इस्तीफा कब का हो गया होता। सरकार का यदि कोई लोकतांत्रिक चरित्र होता तो उसने इस फैसले के तुरंत बाद वर्तमान ‘चुनाव आयोग’ भंग कर दिया होता तथा प्रधानमंत्री- नेता प्रतिपक्ष – प्रधान न्यायाधीश की समिति ने रातों-रात बैठकर नया ‘चुनाव आयोग’ गठित कर दिया होता।

ऐसा हुआ होता तो सत्ता पक्ष को अपनी विकृत लोकतांत्रिक छवि सुधारने तथा ‘चुनाव आयोग’ को अपनी हास्यास्पद स्थिति से बचने का मौका मिल जाता, लेकिन जो लोकतांत्रिक आत्मा कहीं बची ही नहीं है, उसकी कोई लहर उठे भी तो कैसे? हमारी संसद में भी इतनी नैतिक शक्ति नहीं बची है कि वह खुद को सुधार सके, बे-पटरी हुई अपनी गाड़ी को पटरी पर लौटा सके।  

लोकतंत्र का पेंच यह है कि उसमें संसद बनती भले बहुमत के बल पर है, पर चलती परस्पर विश्वास व सहयोग के बल पर ही है। ऐसा नहीं होता तो भारतीय संसद के इतिहास में अब तक की सबसे बड़े बहुमत से बनीं दो सरकारें – इंदिरा गांधी व राजीव गांधी की – ताश के पत्तों-सी बिखर नहीं जातीं?! इसलिए लोकतांत्रिक नैतिकता का तकाजा है कि संवैधानिक संस्थाएं एक-दूसरे की सुनें, एक-दूसरे का सम्मान करें।  

जिस संसदीय लोकतंत्र की रजत जयंती मानने की हम तैयारी कर रहे हैं, वह इतने वर्षों में हमें यह भी नहीं सिखा सका कि हमारी सारी लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान के गर्भ से पैदा हुई हैं इसलिए इनमें कोई संप्रभु नहीं है। संप्रभु है, इस देश की जनता, जिसने अपना संविधान बनाकर, अपने ऊपर लागू किया है। तो वह संविधान सबका पिता है। पिता के संरक्षण का दायित्व सबका है, लेकिन न्यायपालिका उसकी खास प्रहरी है।  

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