–सुसंस्कृति परिहार
महाकवि , महाप्राण सूर्य कांत त्रिपाठी निराला का व्यक्तित्व एक दमदार आभा से दमकता रहा है। उन्होंने जीवन में जितनी त्रासदियों का सामना किया ऐसी जटिलताएं और किसी लेखक ने नहीं झेली होंगी।वे त्रासदियों का गरल पीकर ही विद्रोही कवि बने हैं वे निडर रहे संभवत: इसलिए पहलवानों की तरह अपनी काया को भी बनाया था और फिर बेख़ौफ़ लिखकर प्रतिकार करते हैं।उनकी एक लंबी कविता है ‘कुकुरमुत्ता’ इस कविता में कुकुरमुत्ता श्रमिक, सर्वहारा, शोषित वर्ग का प्रतीक है और गुलाब सामंती, पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधि है।एक नवाब साहब थे। उन्होंने अपने बगीचे में लगवाने के लिए फारस से गुलाब मंगवाए और उस गुलाब को अन्य फूलों के साथ लगवा दिए। बगीचे की देखभाल करने के लिए कई माली और नौकर नियुक्त किये गये , सारा बाग़ बहुत ही सुंदर ढंग से तैयार किया गया। बाग़ में अनेकों प्रकार के सुंदर फूलों के पौधे लगाए गए । जब फूलों के फूलने का मौसम आया तब फारस से लाया हुआ गुलाब का पौधा ख़ुशबूदार फूलों से खिल उठा जिससे समूचे बाग़ के अन्य फूलों की शोभा मंद पड़ गई। उसी के पास स्थित पहाड़ी की गंदगी में एक कुकुरमुत्ता अपना सिर उठाकर खड़ा था और गुलाब को धता बताते हुए उससे कहने लगा-
“अबे, सुन बे, गुलाब, भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!”
कुकुरमुत्ता गुलाब को ताना मारते हुए कहता है। तूने पूंजीपतियों के समान दूसरों का खून चूसा है तब तुझे यह खुशबू रंग और आभा प्राप्त हुई है। न जाने कितने नौकरों एवं मालियों ने तेरी देखभाल की होगी। इतना होने के बावजूद भी तेरे में काँटे हैं। तेरे पास जो भी आता है उसे तुझसे कष्ट ही मिलता है। तेरा व्यवहार तो उन पूंजीपतियों की तरह है जिससे कभी किसी को सुख नहीं मिल सकता है। तू बड़े-बड़े लोगों, राजाओं और अमीरों का प्यारा है। तू कभी साधारण वर्ग के साथ घुल-मिल नहीं सकता है। यहाँ कविता में कवि ने गुलाब के बहाने पूंजीपतियों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त किया है।अपनी बात को बड़े ही प्रतीकात्मक अंदाज़ में कहकर निराला ने सामंतों और पूंजीपतियों को जमकर फ़टकार लगाई है।
एक दूसरी कविता ‘वह तोड़ती पत्थर/’ में वह लिखते हैं वह तोड़ती पत्थर/मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर/वह तोड़ती पत्थर /कोई न छायादार/पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार/श्याम तन, भर बंधा यौवन/नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन/गुरु हथौड़ा हाथ/करती बार-बार प्रहार/सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार/चढ़ रही थी धूप/गर्मियों के दिन/दिवा का तमतमाता रूप/उठी झुलसाती हुई लू/रुई ज्यों जलती हुई भू/गर्द चिनगीं छा गई प्रायः हुई दुपहर /वह तोड़ती पत्थर …….श्रम साधना में लीन एक स्त्री के श्रम सौंदर्य का जितना सशक्त जीवंत चित्रण मिलता है वह तत्कालीन समकालीन कविता की धरोहर है। कवि इलाहाबाद के किसी रास्ते पर उस महिला को पत्थर तोड़ते हुए देखते है। वह एक ऐसे पेड़ के नीचे बैठी है, जहा छाया नहीं मिल रही आस पास भी कोई छायादार जगह नहीं हैं। इस प्रकार कवि शोषित समाज की विषमता का वर्णन करते हुए बताते है कि मजदूर वर्ग अपना काम पूरी लगन के साथ करते है। कवि महिला के रूप का वर्णन करते हुए कहते है, की महिला का रंग सावला है, वह युवा है आंखो में चमक है और मन अपने कार्य में लगा रखा हैं। वह पत्थर तोड़ रही हैं। सूरज अपने चरम पर जा पहुंचा है, गर्मी बढ़ती जा रही है। कवि बताते है दिन में सबसे कष्टदायक समय यही हैं। धरती – आसमान सब इस भीषण गर्मी से झुलस रहे है। कवि बताना चाहते हैं कि महिला अपनी गरीबी के कारण दुखी है परन्तु उसने अभी तक अपनी हिम्मत नहीं हारी है। अचानक महिला को अपने कार्य का स्मरण होता है और एकाएक एक फिर से अपने कार्य में लग जाती है।श्रम की महत्ता प्रतिपादित करते हुए यहां निराला उस समाज पर चोट करते हैं जिन्हें इस सौन्दर्य और श्रम की अनुभूति नहीं होती ना ही संवेदनाएं जागती हैं।इतनी सूक्ष्म और बारीक दृष्टि सिर्फ निराला ने पाई।
इसके अलावा उनकी एक और कविता की याद आ जाती है वह है ‘जब राजे ने अपनी रखवाली की’ यह रचना तो आज बहुत ही प्रासंगिक हो जाती है जब सामंती सोच के दायरे पंख पसार रहे हों और जनता गूंगी बहरी बनी सब स्वीकार करते हुए मस्त हो।कविता देखें-
‘राजे ने रखवाली की/क़िला बनाकर रहा/बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं/चापलूस कितने सामंत आए/मतलब की लकड़ी पकड़े हुए/कितने ब्राह्मणआए/ पोथियों में जनता को बाँधे हुए/कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए/लेखकों ने लेख लिखे/ऐतिहासिकों ने इतिहासोंके पन्ने भरे/नाट्य कलाकारों ने कितने नाटक रचे/रंगमंच पर खेले/जनता पर जादू चला राजे के समाज का/लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं/धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ/लोहा बजा धर्म पर/सभ्यता के नाम पर/ख़ून की नदी बही/आँख-कान मूँदकर जनता ने डुबकियाँ लीं/आँख खुली-राजे ने अपनी रखवाली की।’
कविता में महाकवि निराला ने राजतन्त्र पर जबरदस्त व्यंग्य किया है। कवि कहता हैं कि राजा देश की रक्षा के नाम पर विभिन्न उपाय करता है पर वह व्यवस्था वस्तुतः स्वयं उसकी अपनी रक्षा के लिए होती है। इन सबका यह परिणाम हुआ कि राजा और उसके समर्थक वर्ग का जादू जनता पर चल गया है। वह उन्हें महान् समझने लगी है। राजा की रानियाँ भी समाज की नारियों के लिए आदर्श नारी मानी जाने लगीं। राज्याश्रय में पलने वाले धार्मिकों ने जनता को धोखा देने वाले धर्म को बढ़ावा दिया हैं। अपने धर्म एवं सभ्यता को श्रेष्ठ बताकर उनका प्रचार किया तथा इस प्रक्रिया में संघर्ष हुआ, शस्त्र चले, खून की नदियाँ बहीं। राजाओं के आदेश पर जनता ने अपना खून बहाया और उनकी इच्छा को ईश्वर की इच्छा मानकर वह कटती-मरती रही किन्तु जब जनता की आँख खुलीं तो उसकी समझ में आया कि राजा ने अपनी रखवाली की ,उनकी रक्षा नहीं की वरन् स्वयं की रक्षा ही की है।आज लगभग कुछेक स्थितियों को छोड़कर हाल वही है निराला सच लिख देते हैं जब आंख खुलेगी बहुत देर हो जाएगी।
लगता है,इसीलिए अंत में निराला ‘वीणा वादिनी वर दे’ लिखने प्रेरित होकर ऐसी सरस्वती वंदना लिखते हैं जो वीणा बजाती हुई जीती जागती देवी की हैं।वे उनसे जो वरदान मांगते हैं उनमें नवीनता का संदेश देते हुए अंधियारा हटाने की बात करते हैं जो आज भी स्टीक और प्रासंगिकता लिए हुए हैं।वे लिखते हैं ‘वीणा वादिनी वर दे!/ वीणा वादिनी वर दे/प्रिय स्वतंत्र रव -अमृत मंत्र-नव/ भारत में भर दे/काट अंध उर के बंधनस्तर/बहा जननी ज्योतर्मय निर्झर/कलुष भेद तम हर प्रकाशभर/ जग मग जग कर दे!/नव गति, नव लय, ताल-छंद नव/नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;/नव नभ के नव विहग-वृंद को/नव पर, नव स्वर दे /वर दे, वीणा वादिनि वर दे।’ इस कविता में वे नई चेतनायुक्त नवीनता का खुलकर आव्हान करते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म वसंत पंचमी के दिन हुआ इस दिन ,बंगाल बिहार में सरस्वती पूजा का विधान है और नन्हें बच्चों के पाठन पाठन की शुरुआत इसी दिन से प्रारंभ की जाती है। इस अवसर पर तथा आज भी देश के हज़ारों विद्यालयों में यह गीत प्रार्थना के समय गाया जाता है।जो एक क्रांतिकारी गीत है। निराला सम्यक बदलाव के पक्षधर हैं। आज उनकी बात सुनना और अपनी आंख खोलना बहुत ज़रूरी है।तभी देश में बढ़ते नये तरीके के शोषण और ख़ौफ के दरवाजे बंद किए जा सकते हैं।वे अपराजेय रहे और हमें भी अपराजेय रहने का मूलमंत्र देकर गए है। वे प्रगतिगामी एवं परिवर्तन कारी कवि थे। (दमोह, मध्यप्रदेश)
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