– तेजपाल सिंह ‘तेज’
इस दुनिया में किसी के लिए किसी के प्रति सच्ची हमदर्दी नहीं बची है। हम किसी शव को कब्रिस्तान तक छोड़कर लौटते हैं और भीतर से पूछते हैं—कितना समय और लगेगा किसी ऐसे व्यक्ति को खोजने में जो हमारे मन की गहराइयों को समझ सके। जीवन में “याद रखना” और “याद रह जाना” दो अलग बातें हैं। हम उन लोगों को याद रखते हैं जो हमारे अपने हैं, और उन लोगों को भी जो हमें अपना मानते हैं।
दिल और दिमाग की लड़ाई में नींद की मौत मामूली हो जाती है। पैसा हमें जीवन की सुविधाएं दे सकता है, लेकिन शांति केवल अच्छे कर्मों से मिलती है। इसलिए कभी-कभी अकेले रहना सबसे अच्छा विकल्प होता है। जब आप अकेले रहते हैं, तो कोई आपको तकलीफ नहीं देता, कोई आपको रुलाता नहीं, कोई आपको अपना बनाकर छोड़ता नहीं। अकेलापन तकलीफ़देह ज़रूर होता है, लेकिन उससे बेहतर है कि आप गलत लोगों की संगति में अपने मन की शांति खो दें।
मनुष्य अक्सर किसी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। पर सच यही है कि लोग तब तक आपके होते हैं जब तक आप उनके काम आते हैं। जिस दिन आप किसी के लिए उपयोगी नहीं रहते या कोई गलती कर बैठते हैं, उसी दिन वे आपकी सारी अच्छाइयां भूल जाते हैं और आपको आपकी औकात दिखा देते हैं। जीवन सबका है, पर यहाँ हर कोई वास्तव में “ज़िंदा” नहीं है। जिंदगी की कीमत दोस्तों की सच्चाई और दुश्मनों से मिली सीख से तय होती है। जिनसे कोई उम्मीद नहीं होती, वही अक्सर कठिन समय में सबसे पहले साथ खड़े होते हैं।
शक की कोई दवा नहीं, चरित्र का कोई ठोस सबूत नहीं, खामोशी से बड़ा कोई हथियार नहीं और शब्द से तेज़ कोई तीर नहीं होता। इसलिए कभी-कभी चुप रहना सबसे सशक्त उत्तर होता है। अगर किसी को फुर्सत में आपकी याद आए, तो उसे रहने दें — क्योंकि हर याद लौटने लायक नहीं होती। हम अकेले हैं, पर बेकार नहीं।
बोले गए शब्द, बीता हुआ समय और टूटा हुआ भरोसा कभी वापस नहीं आते। इसलिए सम्मान और आत्म गौरव के साथ जीना आवश्यक है। जो हक़दार हैं, उन्हें उनका अधिकार अवश्य देना चाहिए। जिन्होंने जीवन में अँधेरा देखा है, वही जानते हैं कि जब कुछ नहीं दिखता, तब भीतर की रोशनी ही असली सहारा होती है। लोग आपकी क़द्र तभी करेंगे जब आप उनकी तरह उन्हें नज़रअंदाज़ करना सीखेंगे।
जो व्यक्ति दुख आने से पहले ही दुखी हो जाता है, वह बेवजह अधिक पीड़ा सहता है। समझने वाला इंसान दुर्लभ होता है; जो मिल जाए, उसे समझकर छोड़ देना ही समझदारी है। गुस्सा बुरा है, लेकिन जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ उसे प्रकट करना चाहिए। वरना गलत करने वाले को कभी यह एहसास नहीं होगा कि उसने कुछ गलत किया है।
जीवन में गलतियां सभी से होती हैं, पर सबसे बड़ी गलती होती है—लोगों को पहचानने में चूक जाना। दिखावे और झूठ से बेहतर है सच्चाई, चाहे उससे दुश्मन ही क्यों न बन जाएँ। सच बोलने वाला व्यक्ति शायद अकेला हो जाए, लेकिन वह अपने आत्मसम्मान को नहीं खोता।
जब रिश्ते रुलाने लगें, तब उन्हें नज़रअंदाज़ करना सीख लेना चाहिए। ऐसा करने से जीवन कहीं अधिक सरल हो जाता है। कहा जाता है, अगर आप किसी के बारे में बहुत सोचते हैं, तो वह आपके सपनों में आता है। पर यदि आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो वह आपकी वास्तविक ज़िंदगी में क्यों नहीं आता? शायद इसलिए कि सही दिशा और सही समय का ज्ञान न हो तो उगता हुआ सूरज भी डूबता हुआ प्रतीत होता है।
तारीफ़ करना आसान है, लेकिन अपमान बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। क्योंकि अपमान वह कर्ज है जो समय आने पर ब्याज समेत लौटाया जाता है। अंततः, इंसान दो कारणों से अपने सारे रिश्ते खो देता है—एक, गलतफहमी; और दूसरा, घमंड।
“अपना-पराया” का भाव, मनुष्य के जीवन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को समझने में मदद करती है। यह निबंध इस अवधारणा को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करेगा।
“अपना” और “पराया” ये दो शब्द, मनुष्य के जीवन में गहरे अर्थ रखते हैं। ये शब्द न केवल व्यक्ति के रिश्तों को परिभाषित करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं और कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। “अपना” शब्द, प्रेम, स्नेह, और विश्वास का प्रतीक है, जबकि “पराया” शब्द, अजनबीपन, दूरी, और अविश्वास का प्रतीक है।
शरीर में “अपना-पराया”:
सबसे पहले, शरीर के स्तर पर “अपना-पराया” की पहचान होती है। हमारा शरीर, अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली के माध्यम से, बाहरी तत्वों (जैसे बैक्टीरिया और वायरस) को “पराया” मानकर उनसे लड़ता है, जबकि अपने शरीर के अंगों और कोशिकाओं को “अपना” मानता है। यह एक जैविक प्रक्रिया है जो हमें स्वस्थ और जीवित रहने में मदद करती है।
सामाजिक जीवन में “अपना-पराया”:
सामाजिक जीवन में, “अपना-पराया” का अर्थ और भी जटिल हो जाता है। एक परिवार में, माता-पिता अपने बच्चों को “अपना” मानते हैं, और बच्चे अपने माता-पिता को। भाई-बहन, पति-पत्नी, और अन्य रिश्तेदार भी इसी तरह “अपने” माने जाते हैं। लेकिन, समाज में, हम उन लोगों से भी मिलते हैं जिन्हें हम नहीं जानते, और जिन्हें हम “पराया” मानते हैं। उदाहरण—
1. पारिवारिक संबंध:
एक परिवार में, सदस्य एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ होते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं, और एक-दूसरे के प्रति समर्पित होते हैं। वे “अपने” होते हैं। वहीं, एक अनजान व्यक्ति, जो परिवार के किसी सदस्य को चोट पहुंचाने की कोशिश करता है, उसे “पराया” माना जाता है।
2. मित्रता:
मित्र, वे लोग होते हैं जिनके साथ हम अपनी खुशी और दुख बांटते हैं, और जो हमारे प्रति वफादार होते हैं। वे “अपने” होते हैं। वहीं, एक ऐसा व्यक्ति जो मित्र बनकर धोखा देता है, उसे “पराया” माना जाता है।
3. कार्यस्थल: सहकर्मी एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं, और एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। वे “अपने” होते हैं। वहीं, एक ऐसा व्यक्ति जो सहकर्मियों के खिलाफ काम करता है, या उनके साथ सहयोग नहीं करता है, उसे “पराया” माना जाता है।
निष्कर्ष: “अपना-पराया” की अवधारणा, मनुष्य के जीवन का एक अभिन्न अंग है। यह न केवल हमारे रिश्तों को परिभाषित करती है, बल्कि यह भी निर्धारित करती है कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं। “अपने” और “पराये” के बीच का अंतर, कभी-कभी स्पष्ट होता है, और कभी-कभी धुंधला। लेकिन, यह समझना महत्वपूर्ण है कि “अपने” और “पराये” दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं, और हमें सभी के प्रति सम्मान और सहानुभूति रखनी चाहिए। अतिरिक्त विचार—
· “अपना-पराया” की अवधारणा, सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों में भिन्न हो सकती है।
· “अपने” और “पराये” के बीच का अंतर, कभी-कभी स्वार्थ और पूर्वाग्रह से प्रेरित हो सकता है।
· हमें “अपने” और “पराये” के बीच के अंतर को पार करने और सभी के साथ सहानुभूति रखने का प्रयास करना चाहिए।

