– गिरिजेश वशिष्ठ
25 जून 1975 को जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल थोपा, तब पूरे देश ने जाना कि लोकतंत्र कितना नाज़ुक होता है। जेलों में भरे गए नेता, खामोश कर दी गई प्रेस, बंधी हुई अदालतें, और डरी हुई संसद – यह सब कुछ लोकतंत्र के नाम पर हुआ।
पचास साल बाद, अब जब हम उस काले अध्याय को याद कर रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या हमने उससे कोई सबक लिया? कड़वा सच यह है कि हमारे नेताओं ने इमरजेंसी से लोकतंत्र बचाने का नहीं, उसे कुचलने के नए-नए तरीके सीखने का सबक लिया।
सत्ता बदली, तौर-तरीके नहीं
1977 से लेकर अब तक भारत में कांग्रेस ने करीब 26 साल और बाकी गैर-कांग्रेसी सरकारों (जनता पार्टी, गठबंधन, भाजपा) ने 24 साल राज किया है। लेकिन अफसोस, किसी भी सरकार ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए कोई ठोस इंतज़ाम नहीं किया। सबने सत्ता में बैठते ही वही किया जो 1975 में इंदिरा गांधी ने किया था – बस अब उसके लिए क़ानून का सहारा नहीं लेना पड़ता, क्योंकि तंत्र उनके क़ब्जे में है।
दिखावे के सुधार, मगर हकीकत में ढकोसला
जनता पार्टी सरकार ने 1978 में 44वाँ संविधान संशोधन लाया जिसमें यह तय किया गया कि अब आपातकाल सिर्फ ‘सशस्त्र विद्रोह’ में ही लगाया जा सकता है, और जीवन के अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता। पर ये कानून किताबों में रह गए।
ना तो चुनाव आयोग को पूरी स्वतंत्रता दी गई, ना ही जाँच एजेंसियों को। प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाएं बनीं, लेकिन उनमें दम नहीं डाला गया। यानी जो संस्थाएं जनता की तरफ से सरकार पर नज़र रखती थीं, उन्हें जानबूझ कर कमज़ोर किया गया।
कांग्रेस ने क्या सीखा?
इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस को मौका मिला कि वह खुद को सुधारे, मगर उसने वही इमरजेंसी वाली प्रवृत्ति बरकरार रखी।
1985 में शाह बानो मामला आया। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला के पक्ष में फ़ैसला दिया, लेकिन राजीव गांधी ने दबाव में आकर संविधान बदल डाला।
1988 में Defamation Bill लाया गया जिससे पत्रकारों की जुबान पर ताला लगाया जा सके, मगर देशव्यापी विरोध के चलते पीछे हटना पड़ा।
CBI, IB जैसी संस्थाएं कांग्रेस के दौर में भी नेताओं के इशारे पर चलती रहीं। बोफोर्स कांड इसकी मिसाल है जहाँ जाँच एजेंसियों को राजनीतिक निर्देश दिए गए।
भाजपा ने क्या किया?
2014 के बाद भाजपा ने इमरजेंसी को खूब याद दिलाया, लेकिन असल में वही सब किया, बस बिना घोषणा के:
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर हमला (2023): नया कानून बनाकर आयोग की नियुक्ति पर पूरा नियंत्रण सरकार ने ले लिया।
NDTV का अधिग्रहण (2022): सरकार के करीबी उद्योगपति ने मीडिया हाउस को अपने कब्जे में ले लिया।
BBC पर छापा (2023): प्रधानमंत्री पर बनी डॉक्यूमेंट्री दिखाने के बाद आयकर विभाग की कार्रवाई हुई।
UAPA और NSA का दुरुपयोग: पत्रकारों, छात्रों और कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के वर्षों तक जेल में रखा गया।
संसद में विपक्ष को कुचलना: 2023 के सत्र में 140 से ज़्यादा सांसदों को निलंबित कर बिल पास कर लिए गए – ठीक इमरजेंसी जैसी कार्यवाही, पर बिना उसकी घोषणा के।
प्रेस और संस्थाएं बन गईं मूकदर्शक
आज प्रेस पर सेंसरशिप नहीं, बल्कि खुद सेंसर करने का डर है। मालूम है कि सवाल पूछोगे तो विज्ञापन बंद होंगे, मुकदमे होंगे, या किसी एजेंसी के लोग दफ़्तर में होंगे। यही डर अब न्यायपालिका और विश्वविद्यालयों तक फैल गया है।
JNU, BHU, और IIT जैसे संस्थानों में सत्ता के करीबी कुलपति बैठा दिए गए हैं।
NCERT की किताबों से इतिहास को इस तरह बदला जा रहा है कि वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्षता हाशिये पर है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी लगा रहीं हैं लानत
फ्रीडम हाउस (2024): भारत को ‘Partly Free’ बताया
V-Dem रिपोर्ट (2023): भारत अब “चुनावी तानाशाही” (Electoral Autocracy) है
प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग (RSF, 2024): भारत 161वें पायदान पर पहुँच गया
ऑक्सफैम रिपोर्ट (2023): 1% अमीरों के पास देश की 40% दौलत है
UN और Amnesty: कश्मीर, UAPA और मानवाधिकारों पर गहरी चिंता
नेताओं ने क्या किया?
नेताओं ने सत्ता को साधन और संस्थाओं को औज़ार बना लिया।
कोई पार्टी इससे अछूती नहीं रही – कांग्रेस, भाजपा, क्षेत्रीय दल – सबने जो सत्ता में आया, उसने अपनी मर्ज़ी से संस्थाओं को घुटनों पर लाया।
CBI से विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी कराई
ED से चुनाव से पहले छापे डलवाए
अदालतों से अहम मामलों पर “तारीख पे तारीख” ली
और चुनाव आयोग से सिर्फ़ अनुकूल तारीख़ों की उम्मीद रखी
जनता भी चुप है – यही सबसे बड़ा खतरा
इमरजेंसी में जनता ने सड़कों पर उतर कर विरोध किया था। आज डर, थकान और प्रचार के कारण असहमति अपराध बना दी गई है।
नया देशभक्त वह है जो सवाल नहीं करता, और जो सवाल करे – वह ‘गद्दार’ कहलाता है।
इमरजेंसी की सबसे बड़ी सीख थी कि लोकतंत्र सिर्फ़ क़ानूनों से नहीं, संस्थाओं और नागरिकों की सजगता से चलता है।
लेकिन इन पचास सालों में हमारे नेताओं ने लोकतंत्र से नहीं, तानाशाही के तरीके अपनाने से सीखा है।
अब जनता के पास बस वोट है, मगर विकल्प नहीं।
अब प्रेस के पास कलम है, मगर स्याही नहीं।
अब अदालतें हैं, मगर निर्णय की हिम्मत नहीं।
घोषित आपातकाल नहीं है, मगर लोकतंत्र अब भी सांस रोक कर जी रहा है।
– गिरिजेश वशिष्ठ

