निरुक्त भार्गव
03 मई 2025 को एक बार फिर सभ्य नागरिक समाज के बीच “विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस” की अच्छी-खासी चर्चा बनी रही. अख़बारों ने बड़े-बड़े आलेख छापे, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी जमकर भड़ास निकाली गई. नेता नगरी को भी मौका मिल गया, स्वतंत्र प्रेस की वकालत करने का. कुछ-कुछ स्थानों पर बौद्धिक कार्यक्रम भी हुए, तो उज्जैन जैसे तथाकथित जागरूक शहर में गिनती-भर के लोगों ने प्रेस का झंडाबरदार बनने की कोशिश की. मैंने स्वयं इस बार अपनी तरफ से किसी भी तरह की चर्चाओं में शामिल होने से परहेज़ किया. सोचा, अपने यहां कई बरसों से विराजमान शलाका पुरुष का आशीर्वाद लिया जाए और मीडिया बिरादरी के खासे अहम दिन के बरक्स उनके श्रीमुख से कुछ खोज-खबर निकाली जाए. इस डिस्पैच में उनसे हुई मुलाकात का व्यवस्थित विवरण अपनी शैली में प्रस्तुत कर रहा हूं…..
लीजिए मिलिए प्रेम नारायण नागर से जो 100 बरस के होने जा रहे हैं. पूरे देश में इनके नाम का जिक्र एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के बतौर किया जाता है जिन्होंने कन्हैयालाल वैद्य जैसे अपने कई साथियों के साथ केंद्र सरकार की सम्मान निधि यानी पेंशन को लेने से ठुकरा दिया था. “हमने भारत भूमि को आज़ाद कराने में जो भी योगदान दिया वो किसी अपेक्षा के कारण नहीं किया था. हम किसी सरकार के नौकर भी नहीं थे कि पेंशन पाने के लिए लालायित हों.” वे मूलत: चांचोड़ा (जिला गुना) के हैं और प्रकारांतर में दतिया होकर शिवपुरी बस गए. बचपन में और युवा दहलीज़ पर आते-आते वो कुछ महीने जेल भी हो आए. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के निकट संपर्क में रहकर महात्मा गांधी के खादी आंदोलन ने उन्हें बेहद प्रभावित किया. एक मर्तबा दतिया में हिंसा का शिकार हुए एक दलित व्यक्ति की हत्या ने उन्हें इतना व्यथित कर दिया कि उन्होंने पत्रकारिता का दामन थाम लिया. उनके तीन पुत्र और एक पुत्री थे, दो उज्जैन में, एक शिवपुरी में और मंझले पुत्र मुंबई में. सुनने की क्षमता में आंशिक कमी के बावजूद देखने और बोलने में वो किसी से कम नहीं हैं. प्रतिदिन भोर फटते और सांझ ढलते वो सैर पर निकल जाते हैं…..
भरी गर्मी मैंने उनसे बात करना शुरू किया तो वे फूट पड़े: पत्रकारिता का सारा सत्यनाश हो चुका है. मैंने स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले की और बाद की पत्रकारिता को जिया है. अब कि पत्रकारिता विज्ञापन लाने वालों की पत्रकारिता रह गई है. पत्रकारिता चल तो रही है, लेकिन किसी सरकार, राजनीतिक दल या कॉरपोरेट हाउस की सरपरस्ती में. आजकल जिन राष्ट्रीय अख़बारों की खूब चर्चा होती है, उनमें से अधिकांश स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले आरम्भ नहीं हुए थे. उस दौर में बम्बई से प्रकाशित “विश्व मित्र” की बहुत चर्चा होती थी. मैंने मध्य प्रदेश के नामी आंचलिक अख़बारों का जन्म होते देखा है. इन दिनों अग्रणी होने की होड़ में लगे एक अख़बार के मालिक कागज़ बेचने का धंधा किया करते थे. एक पेज का बुलेटिन चालू करने के लिए उन्होंने उस समय सत्ता के एक प्रभावशाली व्यक्ति को अख़बार के विमोचन के लिए बुलाया और उनकी खुशामद करने के लिए उनके पुत्र के नाम से ही अपना अख़बार लांच कर दिया.
उनकी याददाश्त के अनुसार, “उस समय की पत्रकारिता में ताकत थी, पत्रकारों का ध्येय वाक्य होता था, “जब तक कलम हमारे हाथ में है, तब तक हम तुमको मरने नहीं देंगे”. पत्रकार निर्भीक हुआ करते थे, किसी से भी दबते नहीं थे. इलाहाबाद में एक संपादक ने एडिटोरियल लिखा तो उसे जेल में डाल दिया गया. उसके बाद आए दूसरे संपादक ने भी वैसा ही कुछ लिखने की जुर्रत की और जेल भेज दिए गए. उस अख़बार के 12 संपादकों को जेल जाना पड़ा, ब्रिटिश डिक्टेटरशिप के चलते.
नागर जी के इन शब्दों पर ध्यान दीजिये: अब मैं मेरे शयन कक्ष में लगे टीवी को नहीं देखता, आखिर इसमें आता क्या है? केवल पेपर की सम्पादकीय पढ़ता हूं क्योंकि उनमें भी मार-धाड़, बलात्कार जैसी ख़बरें छाई रहती हैं. चारों तरफ पेज भरने का तमाशा लगा रहता है. अब के दौर में उसे पत्रकार माना जाता है जो एसपी साहब और थानेदार साहब के साथ चाय पीता है. पिछले साल एक सज्जन एक लड़के को लेकर मेरे पास आए और मुझसे मिलवाते हुए बताया कि ये एक पत्रकार है. मैंने उससे दो प्रश्न किए और इन सज्जन को बता दिया कि ये पत्रकार नहीं है. तब वो सज्जन बोले कि उसको कोई नौकरी नहीं मिली, तो मैंने कहा तू पत्रकार ही बन जा और इसीलिए वो उसे मेरे पास ले आए. मजबूरी में कोई पत्रकार कैसे बन सकता है?
सहसा अपने पुत्र दिलीप से नागर जी बोले कि कमरे की रौशनी को बढ़ाओ और एक पुस्तक दिखाते हुए तत्परता से बोले, अब मैं परवाह नहीं करता. मैंने शिवपुरी में पत्रकारिता करते समय ढेरों कलेक्टर और एसपी को देखा. चूंकि मैंने कभी गलत नहीं लिखा और किसी को ब्लैकमेल नहीं किया, तो सभी से अच्छे संबंध रहे. मैंने करीब 70 साल तक पत्रकारिता की, मगर अब देखता हूं कि सरकारों ने अपने हिसाब से कानून बना लिए हैं और जब चाहे वो पत्रकारों को खिलाफ लिखने पर नोटिस देते रहते हैं. लगातार कुरेदने पर वे बोले, “जैसे-जैसे समाज बदलेगा, वैसे-वैसे मीडिया बदलेगा. समाज बदल रहा है, राजनीति बदल रही है. “सत्ता होगी तो पैसा मिलेगा और पैसा होगा तो सत्ता मिलेगी” का फार्मूला चल रहा है. सब तो बदल रहा है, तो मीडिया भी बदलेगी, इसमें नई बात क्या है?
मोबाइल फोन को खुद रिसीव करना! मिलने पर सम्पूर्ण आत्मीयता बरतना! बातचीत के दौरान सबकी कुशलक्षेम पता कर लेना! बिदाई के दौरान पैरों के बड़े-बड़े डग भरते हुए और स्वाभाविक अट्टाहास लगाते हुए मैले-कुचले श्वेत चरित्रधारी महापुरुष बोले, जल्दि मिलना.
साभार
:
द्वारा गौरव चतुर्वेदी
Nirukt Bhargava

