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करें कोई भरे कोई?

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी ने मिलते ही बगैर किसी औपचरिकता के एक सूफ़ी संत द्वारा रचित,यह रचना सुना दी।
शेख हो या ब्रहमन कोई
रात भर सज़दे करें
माथे घिसे सौ सौ बार
न रहमत न कभी बरकत पाएगा
जो किसी का दिल दुखाएगा
सज़ा पाएगा

उक्त दार्शनिक रचना सुनकर मैने पूछा सुबह सुबह किसको सज़ा दिलवा रहे हो?
सीतारामजी ने बहुत ही गम्भीर मुखमुद्रा बनाकर सन 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म ऊंचे लोग के इस गीत की पंक्ति गुनगुनाकर जवाब दिया। यह गीत प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुलतानपूरी ने लिखा है।

अजब तेरी दुनिया गज़ब इंसान
सच रोये और झूठ हँसे
मैं न समझू इन बातों को
कैसी तूने रीत रचि भगवन
पाप करे पापी भरे पुण्यवान
अजब तेरी दुनिया गज़ब इंसान

यह सुन मैने भी अपने अल्प ज्ञान का परिचय देतें हुए यह संत रहीम रचित दोहा सुना दिया।
क्षमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात।

सीतारामजी की मेरे साथ हो रही चर्चा को राध्येशामजी सुन रहे थे। वे भी है तो भारतीय ही। राधयेशामजी ने हम दोनों की चर्चा में शरीक होकर संत कबीर साहब का यह दोहा सुना दिया।
ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट |
ज्ञानी अज्ञानी मिलै, हौवे माथा कूट ||

सीतारामजी ने कहा यह कबतक चलेगा। क्या हम अपनी लकीर को बड़ा दिखाने के लिए दूसरों की लकीर पोंछते ही रहेंगे।
सीतारामजी आगे कुछ कहना चाह रहे थे। उस समय राधेश्यामजी के मोबाइल पर रिंगटोन बजी।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान

सीतारामजी रिंगटोन में बजी पंक्तियों को सुनकर प्रसन्न हो गएं।
सीतारामजी ने कहा मुझे यकायक सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म नया रास्ता
के गीत का स्मरण हुआ। यह गीत लिखा है गीतकार साहिर लुधियानवी ने।
ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान
सारा जग तेरी सन्तान
कोई नीच ना कोई महान सबको सन्मति दे भगवान
जातों नसलों के बँटवारे, झूठ कहाए तेरे द्वारे
तेरे लिए सब एक समान, सबको सन्मति दे भगवान

यह सब सुनकर लगता है। हम कहीं उल्टी दिशा में तो नहीं जा रहें हैं। हमें तो वसुधैवकुटुंबकम
के रास्ते पर चलना है।
मैने सीताराम जी का समर्थन करते हुए। सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म गोपी के इस भजन रूपी गीत की कुछ पंक्तिया सुना दी। इस गीत के रचियता हैं गीतकार राजेंद्र कृष्णजी
सुख के सब साथी,
दुख में ना कोई,
मेरे राम, मेरे राम,
तेरा नाम …
जीवन आनी, जानी छाँया,
झूठी माया, झूठी काया,
राजा हो या रंक सभी का,
अंत एक सा होइ,
बाहर की तू, माँटी फाँके,
मन के भीतर क्यों ना झाँके,
उजले तन पर मान किया,
और मन की मैल,ना धोई,

सीतारामजी ने चर्चा को विराम देते हुए कहा कि जो कुछ भी रहा है।
विदेशों में जो आलोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है।
यह सब सुन कर फिरंगियों द्वारा कही गई बात सच साबित हो रही है।
भारत की स्वतंत्रता के बाद फिरंगियों ने उनके अपने देश के संविधान में लिखा है। हमनें भारत को स्वतंत्रता नहीं दी है। हमने भारत को Communal Award दिया है। मतलब साम्प्रदायिक पुरस्कार दिया है।
सीतारामजी ने कहा एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। इस उक्ति आशय यूँ समझना चाहिए, तालाब मतलब सारा समाज और मछली से तात्पर्य संकीर्ण, विचार।
इस मछली रूपी मानसिकता को ही बदलना है।
हमें तो भारतीय भाई भाई का नारा बुलंद करना है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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