शशिकांत गुप्ते
अलीगढ़ अब हरिगढ़ होने जा रहा है।यहाँ के निर्मित होने वालें तालें प्रसिद्ध है।पिछले लगभग अठारह महीनों से कोरोना महामारी से बचने के लिए एहतियातन देश की जनता तालाबंदी में जीवन यापन कर रही है।
बहुत से उद्योगों पर ताले लग गए हैं।यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछों कहाँ कहाँ ताले लगे हैं?
लहभग अस्सी+आठ माह पूर्व सत्ता परिवर्तन हुआ तब जनता को बहुत उम्मीद थी,अबकी बार अबकी बार, बहुत हुई महंगाई की मार,रोजगार वगैराह सारी समस्याओं से देश की जनता को निजात मिलेगी?इसे जनता का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।जनता के त्रासदी की स्थिति तो महान शायरी गालिब के इस शेर की तरह हो गई।
मरीजे ए इश्क पर रहमत खुद की
मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की गालिब
अब तालों पर चर्चा करना व्यर्थ है।समय आ गया है कि,अब हर एक ताले की चाबियां ढूंढी जाए।
तालों ने आमजन की स्थिति इसतरह की कर दी है।
नजर घायल जिगर छलनी
जुबां पर सौ सौ ताले
अब चाबियां ढूंढना अनिवार्य हो गया है।
सबसे पहले आमजन को स्वयं अपनी जुबाँ पर लगे ताले को खोलना होगा।ताला खोलने के लिए चाबी को ताले के अंदर तक घुसाने पड़ता है,और चाबी को घुमाना पड़ता है।तब कहीँ ताला खुलता है।बहुत से ताले जब अपनी ही चाबी से भी नहीं खुलते हैं,तब ऐसे तालों पर हथौड़ा चलना पड़ता है।वैसे तो ताले भारी पत्थर की मार से भी खुल जातें हैं,लेकिन पत्थर का प्रयोग करना वहशीयत कहलाता है।वहशीयत ही हिंसा को प्रेरीत करती है।
बहरहाल चर्चा चाबी खोजने की चल रही है।
सबसे पहले रोजगार के जो स्रोत बंद है,उनके ताले खोलना चाहिए।वर्तमान व्यवस्था हर समस्या के लिए वादों की चाबी का ही प्रचार कर रही है।
सच्चाई छुप नहीं सकती बनावटी दावों से
समस्याएं हल नहीं हो सकती झूठे वादों से
अब तो इंतिहा हो गई इतंजार की।
जनसमस्याओं के समाधान के लिए एक ही चाबी है।इस चाबी के इस्तेमाल का हक़ तो संविधान भी देता है।
यह चाबी है अहिंसक आंदोलन
वर्तमान में आंदोलन का श्रेय है देश के किसानों को है।
सन 2011 में बहुत ही अहम मुद्दे पर एक जन आंदोलन हुआ था।इस जनांदोलन पर यह आरोप लगता है कि,यह आंदोलन प्रायोजित था।इस आंदोलन की चाबी किस व्यवस्था के पास थी यह बहुत ही जटिल प्रश्न है?इस आंदोलन के कारण सत्ता परिवर्तन तो हुआ,लेकिन व्यवस्था ज्यों की त्यों ही नहीं रही बल्कि और खराब हो गई।
सवाल है हर तरह की समस्याओं के लिए चाबी तलाशना?
जाहिर सी बात है कि, हर समस्याओं के लिए भिन्न प्रकार आकार,और भिन्न मापदंड की चाबी ही इस्तेमाल करना पड़ेगी।
इनदिनों अलोकतांत्रिक सोच रखने वाले तो आंदोलन की भी आलोचना करतें हैं।
बनारस का पान खाने के बंद अक्ल का ताला खुलता है ऐसी मान्यता है।इस मान्यता की पोल तो तब खुलती है,जब यहॉ बहती पवित्र गंगा शैवाल जमने से प्रदूषित होती है।
हर समस्या के लिए एक ही चाबी पर्याप्त है।वह चाबी है अहिंसक क्रांति।अहिंसक आंदोलन लोकतंत्र की पहचान है।
समय रहतें जागना ही आदमी के सजगता का प्रमाण है।
अन्यथा जनता और आंदोलनकारियों को यह गीत गुनगुना पड़ेगा कि, हम तुम एक कमरे बंद हो और चाबी खो जाए।
ऐसा कतई नहीं होगा।इसदेश की जनता ने निरंतर दो सौ वर्षों तक हुक़ूमत करने वाले फ़िरंगियों को भी देश से निकाल बाहर किया है।
इस देश की जनता चाबी बनाने का हुनर जानती है।
यह शेर मौजु है।
खुले आसमाँ के तले भी बन्दिशों के ताले हैं
बेहतर है कि चाबियां बनाने हुनर सीखा जाए
शशिकांत गुप्ते इंदौर

