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पहले पहली बुझाओ जिंदगी की

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शशिकांत गुप्ते

आज मुझे समझ में नहीं आ रहा है, क्या लिखूं? किस मुद्दे पर लिखूं? क्यों लिखूं? इन प्रश्नों का जवाब मुझे मेरे व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी ने यूँ दिया।
कहने लगे आपके सारे प्रश्न अनावश्यक हैं। यदि थोड़ा भी गम्भीर होकर सोचोंगे तो,तुरंत समझ में आ जाएगा कि,वर्तमान,में राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक हर क्षेत्र में व्यंग्यकारों के लिए व्यंग्य लिखने के लिए भरपूर मुद्दें हैं।
मैने कहा नहीं धार्मिक क्षेत्र को छोड़ शेष क्षेत्र पर लिखा जा सकता है। इनदिनों किसी संवेदनशील विषय पर लिखना या बोलना गुस्ताख़ी कहा जाएगा। गुस्ताखी का मतलब होता है बे-अदबी,अशिष्टता।
सीतारामजी ने कहा इनदिनों तो अशिष्टता भी विश्व ख्याति प्राप्त करने का कारण बन जाती है?
मैने कहा चर्चा एक ही बिंदु पर अटक रही है।
मुख्य मुद्दा है व्यंग्यकारों के लिए व्यंग्य लिखने के लिए असंख्य मुद्दें हैं?
इनदिनों देश के विशेषज्ञों से राय-मशविरा करने के बाद योजना बनाई जाती है, लेकिन जिन लोगों के हित में योजना बनाई जाती है,दुर्भागय से उन्हें समझमें ही नहीं आती है?
सीतारामजी ने मुझे शायर जुबैर अली ताबिश इस युवा शायर के शेर सुनाकर जवाब दिया।
कोरें कागज़ पर रो रहे हो तुम
मै तो समझा था,पढे-लिखे हो तुम

इनदिनों आमजन को बहुत गलतफहमियां हो रहीं हैं। आमजन नीति पर भावनात्मक रूप से भरोसा करता है,और हश्र होता इस शेर की तरह।
वो पास जरा मुस्करा के क्या बैठ गया
मै इस मज़ाक को दिल से लगा कर बैठ गया

इनदिनों जनहित की योजनाओं को समझने के लिए,पहेलियों को बुझना पड़ेगा।
इसपर शायर जुबैर अली ताबिश फ़रमाते हैं।
पहेली जिंदगी की तू कब नादान समझेगा
बहुत दुश्वारियां होंगी यदि तू आसान समझेगा

दुश्वारियां का मतलब मुसीबतें,कठिनता,दरिद्रता आदि।
इसी तारतम्य में शायर अपने शेर के माध्यम से सलाह देता है।
किसी भूखे से मत पूछो मोहब्बत किस को कहतें हैं
तुम आँचल बिछाओगे,वो दस्तरखान समझेगा

(दस्तरखान मतलब भोजन की थाली)
देश की वर्तमान स्थिति के निर्मित होने का कारण यह हो सकता है।
कुछ लोग रहनुमा तो बनते हैं। लेकिन उनकी मानसिकता इसतरह की होती है।
ओ जिसने आँख अदा की है देखने के लिए
उसी को छोड़ के सब कुछ दिखाई देता हैं

सीतारामजी ने चर्चा समाप्त करते हुए कहा कि कोई कितना भी गुमान करें। अंतः यथार्थ यही प्रकट होता है।
दरख़्त काट कर जब थक गया लकड़हारा
तो एक दरख़्त के साये में जाकर बैठ गया

यह शाश्वत सत्य है कि अंत में अपना साया भी साथ छोड़ देता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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