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दुष्प्रचार का शिकार देश के प्रथम प्रधानमंत्री

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14 नवंबर श्री नेहरू का जन्मदिन……क्या नेहरू के पूर्वज मुगल थे ?*

 हरनाम सिंह

                 वर्ष 2014 देश में  सत्ता परिवर्तन पश्चात देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर अनेक अनर्गल झूठा प्रचार अभियान प्रारंभ हो गया। भारत निर्माण में नेहरू के योगदान को खारिज करते हुए, देश की मौजूदा समस्याओं का जिम्मेदार जवाहर नेहरू को ही बताया जाने लगा। अनावश्यक रूप से नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल की तुलना की जाने लगी। यह प्रचारित किया जाने लगा की श्री नेहरू ने अपनी पुत्री को राजनीति में पहचान बनाने का अवसर दिया और उन्होंने पटेल परिवार को भुला दिया। हद तो तब हो गई जब नेहरू के पूर्वजों को मुगल साबित करने के लिए अनेक झूठे तथ्य गढ़े गए। मानो भारत में मुगल होना ही अपराध और गाली हो।

               अब  यह कोई छुपा हुआ सच नहीं है कि इस दुष्प्रचार के पीछे सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगी संगठनों का प्रचार तंत्र  है। नेहरू ने अपनी आत्मकथा जो उन्होंने जून 1934- 35 के दौरान जेल में लिखी थी “माय स्टोरी” में वे लिखते हैं कि वे कश्मीरी हैं। उनके पूर्वज 18 वीं सदी की शुरुआत में धन और यश कमाने के लिए कश्मीर की तराईयों से उतरकर उपजाऊ मैदानों में पहुंचे थे। इसी सदी के प्रारंभ में मुगल साम्राज्य के अंत की भी शुरुआत हो चुकी थी।

              जो पुरखे पहाड़ों से उतर कर मैदानी शहरों में पहुंचे थे उनका नाम राज कौल था।इन्हीं राज कौल का परिवार कश्मीर से दिल्ली आया था। संस्कृत और फारसी के विद्वान राज कौल को मुगल बादशाहा द्वारा जागीर में जो मकान दिया गया था वह नहर के किनारे था, इसी कारण उनके नाम कौल के साथ नेहरू भी जुड़ गया। श्री नेहरू के अनुसार उनके परदादा का नाम लक्ष्मी नारायण नेहरू था, जो दिल्ली बादशाह के दरबार में कंपनी सरकार के पहले वकील थे। जवाहरलाल के दादा गंगाधर नेहरू का निधन अल्पायु में हो गया था। अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के कुछ समय पहले तक वे दिल्ली के कोतवाल थे। नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू ने कानपुर के बाद हाइकोर्ट इलाहाबाद में वकालत प्रारंभ की।

 *क्या नेहरू- पटेल में मतभेद थे ?*

               व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में यह प्रचार जोरों पर है कि सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू एक-दूसरे के विरोधी थे, और सरदार पटेल श्री नेहरू से अधिक योग्य थे। तथ्यों के अनुसार आजाद भारत के मंत्रिमंडल निर्माण की गतिविधियां स्वतंत्रता पूर्व ही प्रारंभ हो गई थी। 1 अगस्त 1947 को श्री नेहरू ने पटेल को पत्र लिखकर कहा कि “कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है। क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुद्रढ़ स्तंभ हैं।”

                 पत्र के जवाब में 3 अगस्त को सरदार पटेल उन्हें  लिखते हैं कि “आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए धन्यवाद। एक दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता  के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी जीवन के लिए आपके आधीन रहेगी।

 *इंदौर में कहा था नेहरू हमारे नेता हैं*

                सरदार पटेल की ये भावनाएं महज औपचारिक नहीं थी अपनी मृत्यु के लगभग डेढ़ माह पूर्व उन्होंने 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक की नींव रखने के अवसर पर अपने भाषण में कहा कि  “अब क्योंकि महात्मा गांधी हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें।”अनेक मुद्दों पर नेहरू और पटेल में मतभेद थे लेकिन उनमें मनभेद नहीं था।

                 जिस वंश परंपरा को लेकर प्रधानमंत्री सहित भाजपा और उसके सहयोगी संगठन आये दिनों कांग्रेस को कोसते हैं। नेहरू पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने अपनी पुत्री को राजनीति में लाभ पहुंचाया और उनके द्वारा पटेल परिवार को भुला दिया गया। लेकिन सच्चाई तो यह है कि नेहरू जी के जीवन काल में उनकी एकमात्र संतान इंदिरा गांधी ने संसद का मुंह तक नहीं देखा था। 1964 में नेहरू जी की मृत्यु पश्चात कांग्रेस ने इन्द्रा गांधी को राज्यसभा में भेजा था।

                  जबकि 1950 में सरदार पटेल की मृत्यु के बाद नेहरू ने उनकी पुत्री मणीबेन को 1952 के पहले आम चुनाव में कांग्रेस का टिकट दिलवाया और चुनाव जीतने में मदद की। 1957 में भी मनीबेन सांसद चुनी गई। 1964 में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। यही नहीं सरदार पटेल के पुत्र डाह्या भाई  भी 1957 तद्पश्चात 1962 में कांग्रेस पार्टी से सांसद चुने गए। 1973 में मृत्यु पर्यंत वे राज्यसभा के सदस्य रहे। जबकि उन दोनों भाई बहन को चुनाव में भाजपा की पूर्वज पार्टी जनसंघ का विरोध झेलना पढ़ा था।

 हरनाम सिंह

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