निशांत आनंद
बीती रात 1 सितंबर को लगभग सुबह 4 बजे यमुनानगर जिले में स्थित हथिनीकुंड बराज से लगभग अभी तक 3.50 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जा चुका जिससे इस पूरे इलाके के अलावा दिल्ली में भी बाढ़ की संभावनाएं बताई जा रही हैं। दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने इसी बीच में पुरानी दिल्ली बराज को यातायात के लिए बंद कर दिया है। इसी बीच दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का यह बयान आया है कि यमुना के डिसिल्टिंग का काम पूरा कर लिया गया है और हम बिल्कुल इस स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं।
उत्तर भारत में भारी वर्षा ने तबाही की एक लकीर छोड़ दी है। हिमाचल प्रदेश के कई ज़िले कट गए हैं। जम्मू और कश्मीर में 40 से अधिक मौतों की खबर है, जबकि उफान लेती नदियों ने श्रीनगर और अनंतनाग में बाढ़ के निशान पार कर दिए हैं। पंजाब में पूरे-के-पूरे गांव डूब गए हैं और खेती की ज़मीन लापता हो गई है। राष्ट्रीय राजधानी ने भी अत्यधिक वर्षा और उफनती यमुना का सामना किया। दक्षिण-पश्चिम मानसून की तीव्रता और मात्रा तेज़ी से चरम सीमाओं के बीच झूल रही है।
अगस्त की बारिश केंद्रित बौछारों में आई है, जिसने हिमालय की नाजुक ढलानों को ढहा दिया, मैदानों में नदियों को किनारे तोड़ने पर मजबूर कर दिया और निचले इलाकों को डुबो दिया। यह अनिश्चितता भौगोलिक सीमाओं को पार कर रही है और मानसून की बढ़ती अप्रत्याशितता का संकेत देती है। इसके परिणाम केवल तात्कालिक क्षति तक सीमित नहीं हैं। थोड़े समय में अत्यधिक वर्षा स्थानीय कटाव को बढ़ा देती है।
पर्वतीय ढलान अस्थिर हो जाते हैं और दूर-दराज़ की बस्तियों के लिए भी जोखिम पैदा करते हैं। ऐसे संदर्भ में राहत केवल प्रतिक्रियात्मक उपायों तक सीमित नहीं हो सकती। यह तथ्य कि केंद्रित और विनाशकारी वर्षा अब बार-बार होने वाली संभावना बन गई है, जिसने राज्यों और केंद्र सरकार दोनों के लिए निवारक रणनीतियों में निवेश करना अनिवार्य बना देता है। ऐसी घटनाओं को अब भी अप्रत्याशित आपातकाल मानना पहले से मौजूद सबूतों से आँख मूँदने जैसा है।
वास्तव में, हर आपदा को “अभूतपूर्व” बताना उन सबकों से ध्यान भटका देता है जो पहले ही सीखे जाने चाहिए थे। हिमालयी राज्यों में, वनों की कटाई और सड़कों का चौड़ीकरण बिना किसी समायोजन के जारी है- जैसे कि पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों में ढलान-सुरक्षित इंजीनियरिंग, जबकि विशेषज्ञ बार-बार यह चेतावनी दे चुके हैं कि ढलानें अपूरणीय रूप से कमजोर हो रही हैं। जैसे-जैसे जल ग्रहण क्षेत्रों की अवशोषण क्षमता घटती है, ढलानों के खिसकने का ख़तरा बढ़ता है और निचले इलाकों में बांधों व नदियों में गाद जमा होकर बाढ़ का दबाव और भयंकर बना देती है।
फिर भी, बार-बार आने वाली आपदाओं के बावजूद, समय रहते चेतावनी और निकासी का तंत्र अभी भी अपर्याप्त है। भारी वर्षा के पूर्वानुमान की क्षमता बेहतर हुई है, लेकिन इसे विश्वसनीय जमीनी चेतावनी में बदलना संभव नहीं हो पा रहा। राहत एजेंसियां तब सक्रिय होती हैं जब नुकसान हो चुका होता है, जबकि नियमित अभ्यास, पहले से तैयार आपूर्ति और समुदाय की तैयारी अब भी नाकाफी है।
दुर्भाग्य से, राज्य और केंद्र, बार-बार अस्थिर घोषित किए गए इलाकों में भी, रणनीतिक सड़क परियोजनाओं और शहरी विस्तार को तात्कालिक प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि जलवायु-सहनशील बुनियादी ढांचे का विकास पिछड़ रहा है। प्रतिपूरक वनीकरण और पुनर्वास शायद ही कभी उस गुणवत्ता से मेल खाते हैं जो खो चुकी है।
चेनाब और व्यास नदी में जब व्यापक बढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई है तब एक नजारा और भी देखने को मिला है जहां बड़ी मात्रा में लकड़ी तस्करी का पर्दाफाश हुआ ओर कई हजार टन से ज्यादा लकड़ियां इन नदियों में बाढ़ के साथ सामने आईं। इससे दो बातें बहुत स्पष्ट हो जाती हैं कि वन विभाग के नाकों तले यह तस्करी की जा रही है। और दूसरा यह कि किस व्यापक मात्रा में हिमालय जैसे सुभेद्य क्षेत्र में भी इस स्तर पर डिफॉरेस्टेशन का काम धड़ल्ले से चल रहा है।
वही एक दूसरा ट्रेंड भी सामने आया जहां न केवल वाणिज्यिक प्लांटेशन का काम हिमालय के क्षेत्र में बढ़ा है वहीं दूसरी तरफ खाद्य फसलों के उत्पादन में भी एक गिरावट देखी गई है। यह ट्रेंड इस बात को साफ दर्शाता है कि इस देश में सतत विकास के नाम पर जो परोसा जा रहा है वह वास्तव में मुनाफाखोर और वाणिज्यीकरण का एक दूसरा रूप है।
इसका सामूहिक असर साफ़ दिखाई देता है- उजड़ी ढलानें, सिकुड़ते जलग्रहण क्षेत्र और लगातार बढ़ते ख़तरे में आबादियाँ। राहत कार्य सुर्ख़ियाँ और बजट तो पा लेते हैं, लेकिन जब तक सतत बुनियादी ढांचा, भूस्खलन शमन और समय पूर्व चेतावनी प्रणालियों को समान गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब तक अगली मानसूनी बौछार एक और क्षति चक्र शुरू कर देगी। “आपदा के बाद” धैर्य और मजबूती की प्रशंसा करने के बजाय, पहले से व्यवस्थित रूप से कमज़ोरियों को घटाना अब बहुत देर से लंबित है।
जहां सरकार करोड़ों करोड़ रुपए हिमालय के क्षेत्र में आधारभूत संरचना खास कर सड़कों के प्रसार में लगा रही है वहीं उसका एक दूसरा पक्ष यह है कि राज्य उसके आधार को देखने में असफल रहा है जहां उसी जमीन पर इतने बड़े प्रोजेक्ट को बनाने का प्रयास कर रहा है जो बेहद ही संवेदनशील और सुभेद्य दोनों है। तो अगर ऐसी स्थिति में कोई सड़क टूट जाए या कोई सुरंग धंस कर गायब हो जाए तो इसे प्राकृतिक आपदा कहना तो बेहद बेईमानी होगी। यह तो वही बात हो गई कि आग हाथ में लेकर चले हैं आग बुझाने।
मैदानी क्षेत्रों में भारी बढ़ के कारण स्थिति और भयावह हो सकती है और इस समस्या के बादल घेरने लगे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में जहां नदियां अपना कहर दिखा रही हैं वहीं दूसरी तरफ यही नदियां मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर रही हैं जिसके कारण फसलों को भी व्यापक नुकसान हो रहा है। यही स्थिति बनी रही तो देश में खाद्य फसलों की कमी हो सकती है और बड़े मात्रा में आयत का बोझ भी बढ़ने की संभावना की जा सकती है। ऐसी स्थिति में जब रुपया गिरा जा रहा है और डॉलर की तुलना में 88 रुपए तक आ गया है ऐसे में वर्तमान बाढ़ की स्थिति और भयावह सवाल खड़े करती है।

