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प्रवाह

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(16 जून को मालवा अंचल के ख्यात साहित्यकार समाजवादी चिंतक डॉ मंगल मेहता की 14 वीं पुण्यतिथि है इस अवसर पर उनकी दो कविताएं प्रस्तुत है)

कल आज नहीं है,
आज आज है
आपकी दीप्ति से दीपित ।
कल, कल ही रहेगा,
आज नहीं बनेगा,
आपके सपनों से रंगा-रंगा ।
(यदि आपके पास सपने हो तो)
कल-आज-कल
प्रवाह है-
अपनी समझसे
हर कोई बहाव देता है।
नाते – रिश्ते, ऋतुचक्र की धारा
रुढ़ रहा जो-
मोह के खाते मंड जाता हैं।
मोह में लगन हो कित्ती ही हो
उजास नहीं है, न है ताजगी।
दोनों हैं कर्म में, संघर्ष में
इसलिए आज आज है।
***

अभिमंत्रित करूं

ओ साधक
भटकूंगा तुम्हारे खातिर
सीखूंगा, साधूंगा
तुम दो आशीष-
अभिमंत्रित करू
इस दंभ नाग को ।
कान्हा तुम बोलो
कैसे नाथूं इस नाग को
फन पकड़, दूं पछाड़ ?
मन में बहती काली मलिन धार को
दूं पखार।
जूझूं, आ बैठूं फन पर
तुम सम्बल दो ।
ओ बहेलिये,
बहलाया बहुत,
खिलाया, मन भरमाया,
फोड़ूंगा अब लिप्सा की पुंगी
मुझको अपने डग भरने दो
दंभ नाग को अभिमंत्रित करने दो।

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