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बिहार चुनाव:मुद्दों का कुहासा ,असली मुद्दे कहाँ हैं?

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बिहार की चुनावी सियासत इन दिनों गर्म है। बिहार ब्रिटिश शासनकाल से ही मजदूरों के संघर्ष और असमान विकास के बीच झूलता रहा है, जहाँ बेरोज़गारी, प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि संकट और भ्रष्टाचार जैसे बुनियादी सवाल लगातार पीछे धकेल दिए जाते हैं। उनकी जगह ‘घुसपैठिया’, ‘ऑपरेशन सिन्दूर’, ‘धारा 370’, ‘कट्टा’, ‘बुर्का’, ‘पप्पू, टप्पू, अप्पू’ जैसी बेतुकी बहसें छा जाती हैं।

मोदी-नीतीश सरकार जिस ‘विकास’ और ‘सुशासन’ का ढोल पीटती है, उसकी जगह ‘जंगल राज’ का झूठा भय दिखाकर वोट मांगा जा रहा है। यह तब और हास्यास्पद हो जाता है जब देश का प्रधानमंत्री ‘कट्टा’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगता है, पर बिहार में रोज़ हो रहे अपराधों पर मौन साधे रहता है। ‘धर्म’, ‘जातिगत गौरव’ और ‘देशभक्ति’ जैसे कृत्रिम मुद्दों ने जनता के असली सवालों को निगल लिया है। 2025 के इस चुनाव में मुद्दों की ज़मीन खोखली है, लेकिन नारे बहुत हैं। जनता की चेतना को एक बार फिर भावनात्मक और झूठे विमर्शों में उलझा दिया है।

घुसपैठिया का मुद्दा झूठ का आयात

‘घुसपैठिया’ शब्द का बिहार की मिट्टी से कभी कोई सामाजिक या ऐतिहासिक रिश्ता नहीं रहा। बिहार का बॉर्डर नेपाल से लगता है जहाँ से बिहार की जनता की रोटी-बेटी का संबंध कायम है। फिर भी हर चुनाव में ‘घुसपैठिया’ का मुद्दा बार-बार उठाया जाता है। इससे पहले झारखंड चुनाव में भी यही किया गया था।

प्रधानमंत्री मोदी जैसे चुनावजीवी नेता ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से भी ‘घुसपैठिया’ का मुद्दा उछाला। इसकी जड़ में वह संदिग्ध ‘एसआईआर’ रही, जिसे चुनावी वर्ष में चुनाव आयोग ने नियमों की अनदेखी कर जल्दबाज़ी में लाया गया। जब इस पर सवाल उठे, तो आयोग की प्रवक्ता भाजपा बन गई और सफाई देना शुरू किया और ‘घुसपैठिया’ शब्द को लगातार दोहराया। एसआईआर प्रक्रिया में कितने तथाकथित ‘घुसपैठिए’ पाए गए — इस पर न चुनाव आयोग बोलता है, न भाजपा।

सवाल यह है कि आखिर बिहार में कोई ‘घुसपैठिया’ आएगा ही क्यों?

हर साल लाखों बिहारी मजदूर पंजाब, गुजरात, दिल्ली, मुंबई और तमिलनाडु तक रोज़गार की तलाश में जाते हैं। वे मजदूरी करते हैं, अपमान झेलते हैं, और फिर जब ‘घुसपैठिया’ जैसे शब्द बिहार की राजनीति में गूँजते हैं, तो यह मानो अपने ही लोगों का अपमान है। आज तो बिहार के युवा खाड़ी देशों तक रोज़गार की तलाश में जान जोखिम उठाकर जा रहे हैं।

असल में यह डर ‘आयातित’ है, जो राष्ट्रीय राजनीति से कुर्सी पाने के लिए लाया गया है। जिस तरह नागरिकता, एनआरसी और धर्म आधारित घुसपैठ की कहानियाँ गढ़ी गईं, उसी तर्ज़ पर बिहार में भी यह झूठ फैलाया जा रहा है। पब्लिक सब जानती है की तर्ज पर जनता जानती है कि बिहार की असली समस्याएँ ‘घुसपैठिए’ नहीं, बल्कि बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा और स्वास्थ्य हैं।

जंगल राज और ‘कट्टा’ का भय

बिहार की जनता को चुनावी मंच से बार बार ‘जंगल राज’ का भय दिखाया जा रहा है। इस बार प्रधानमंत्री ने एक नया शब्द गढ़ा ‘कट्टा’। उन्होंने कहा कि “राजद ने कांग्रेस को कट्टा दिखाकर मुख्यमंत्री पद की घोषणा करवाई है।” लेकिन सच यह है कि बिहार में लगातार हत्या और बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं।

28 अगस्त 2025 को पटना के मनेर थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की की लाश पेड़ से लटकी मिली। 27 अगस्त को गर्दनीबाग में पाँचवीं की छात्रा जली हुई अवस्था में स्कूल के शौचालय में पाई गई। 5 जुलाई 2025 को पटना के गाँधी मैदान थाना क्षेत्र में व्यापारी गोपाल खेमका की निर्मम हत्या कर दी गई, और 17 जुलाई को पटना के एक अस्पताल में घुसकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं, जुलाई के केवल 20 दिनों में 60 से से अधिक हत्याएँ हुईं।

एससीआरबी के आँकड़ों के अनुसार जून 2025 तक बिहार में 1,379 हत्याओं के मामले दर्ज हुए, जबकि 2024 में यह संख्या 2,786 और 2023 में 2,863 थी। क्या ये आँकड़े “सुशासन” की ओर इशारा करते हैं?

चुनाव घोषणा के बाद से अख़बारों में अपराध की खबरें लगातार आ रही हैं। चुनाव प्रचार के समय दुलचंद यादव की हत्या सबसे चर्चित रही, जिसमें जदयू के प्रत्याशी अनंत सिंह गिरफ्तार हुए। अनंत सिंह की अपराधी दुनिया से सब परिचित हैं।

जेल जाने के बाद उनके प्रचार की कमान केंद्रीय मंत्री लल्लन सिंह और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने संभाली। पहले ही दिन इन दोनों पर एफआईआर दर्ज हुई क्योंकि वे 48 गाड़ियों के काफ़िले के साथ रोड शो कर रहे थे। सोचिए, जब केंद्रीय मंत्री और उपमुख्यमंत्री खुलेआम हत्या के आरोपी का समर्थन करें, तो हत्यारों का मनोबल बढ़ेगा या घटेगा?

आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधि

एडीआर ने पहले चरण के चुनाव में भाग ले रहे 1314 उम्मीदवारों में से 1303 के हलफनामों का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि 423 (32%) उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें 27% पर हत्या और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं।

बिहार के 56 सांसदों (लोकसभा और राज्यसभा) में से 41 (73 फीसदी) पर आपराधिक मामले हैं जिनमें 38 फीसदी पर पर हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। क्या ऐसे सांसद और विधायक ही बिहार में ‘सुशासन’ लाएँगे?

जनता की भावनाओं से खेल

बिहार का चुनाव उस समय हो रहा है जब राज्य में छठ आयोजन और भावनात्मक मुद्दों को खूब भुनाया जा रहा है। भाजपा शासित प्रदेशों में इस बार छठ महापर्व के नाम पर भव्य सरकारी आयोजन किए गए। रेल मंत्री रेलवे स्टेशनों पर जाकर यात्रियों से मिले और दिल्ली में बसुदेव घाट पर विशेष घाट का निर्माण हुआ, जहाँ प्रधानमंत्री के आगमन की योजना थी।

आप नेता सौरभ भारद्वाज ने यमुना किनारे जाकर दिखाया कि यह घाट कृत्रिम रूप से बनाया गया है। वीडियो वायरल हुआ और प्रधानमंत्री कार्यक्रम में नहीं पहुँचे। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि सरकार “आस्था के नाम पर नौटंकी” कर रही है। इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने “छठ मइया के अपमान” का नारा उछाल दिया।

गृह मंत्री अमित शाह माता जानकी के भव्य मंदिर का उल्लेख करते हुए विपक्ष को ‘राम-विरोधी’ और ‘सीता-विरोधी’ बता रहे हैं। लेकिन अयोध्या में राम मंदिर उद्घाटन के समय ‘सीता माता’ का नाम तक नहीं लिया गया। वहाँ राम से भी बड़े प्रतीक के रूप में मोदी को प्रस्तुत किया गया। क्या यह स्वयं “राम और सीता” का अपमान नहीं है?

योगी आदित्यनाथ ने ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ जैसे नारे से भाषाई ज़हर फैलाने का काम किया। इससे पहले उन्होंने चुनाव आयोग के ‘पर्दानशीन’ शब्द को ‘बुर्का’ से जोड़ने की कोशिश की थी। गांधी के तीन बंदरों की तुलना इंडिया गठबंधन के तीन नेताओं— राहुल, तेजस्वी और अखिलेश से करते हुए उन्हें “पप्पू, टप्पू, अप्पू” कहा गये।

प्रधानमंत्री ने 3 नवंबर को सहरसा की रैली में कहा कि “महागठबंधन वाले कहाँ-कहाँ जाते हैं, सोशल मीडिया पर देखकर शर्म आती है।” क्या ऐसे शब्द किसी उच्च पद पर बैठे व्यक्ति की मर्यादा के अनुकूल हैं?

किसानों को साधने की लॉलीपॉप

15 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्णिया में मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की। उनका दावा था कि इससे बिहार के किसानों को लाभ होगा। उन्होंने कहा कि विदेश यात्राओं के दौरान वे अन्य राष्ट्राध्यक्षों को मखाना देते हैं और बिहार के किसानों के परिश्रम की चर्चा करते हैं।

लेकिन प्रधानमंत्री यह भूल जाते हैं कि उनके ही शासनकाल में भारत ने सबसे बड़ा किसान आंदोलन देखा, जिसमें बिहार के किसानों ने भी भाग लिया। तीन कृषि कानूनों की वापसी के लिए 700 से अधिक किसानों ने अपनी जान दी, पर सरकार ने अब तक अपने वादे पूरे नहीं किए। आज भी किसान MSP की गारंटी के लिए संघर्षरत हैं।

अगर प्रधानमंत्री सचमुच बिहार के किसानों के हितैषी हैं, तो उन्हें राज्य में कृषि मंडियाँ बहाल करनी चाहिए ताकि किसान अपनी फसल उचित मूल्य पर बेच सकें। 2 अक्टूबर को मखाना उद्योग में काम करने वाले महादलित समुदाय के चार बच्चों की ट्रेन से कटकर मौत हो गई।

वे ठेकेदार की प्रताड़ना से तंग आकर रात में भाग रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है क्या मखाना बोर्ड किसानों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाएगा, या सिर्फ चुनावी झुनझुना साबित होगा, और सरकारी रिपोर्टों में “विकास” का नया अध्याय बनेगा?

13 दिसंबर 2020 को राज्यसभा में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्वयं कहा था कि बिहार के किसान देश के सबसे गरीब किसान हैं, जिनकी औसत मासिक आय केवल ₹3,358 है, जबकि पंजाब के किसानों की औसत आय ₹18,059 है।

असली मुद्दे कहाँ हैं?

बिहार आज भी देश का सबसे पिछड़ा राज्य कहलाता है। यहाँ 18 से 35 वर्ष के युवाओं में 35% से अधिक बेरोज़गारी है। जिला अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स, तकनीकी स्टाफ और मशीनों की भारी कमी है। बरसात के मौसम में अस्पतालों तक में पानी भर जाता है। बाढ़ और सूखे के बीच फँसे किसान आज भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए तरस रहे हैं।

राज्य के अधिकांश युवा दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में प्रवासी मजदूर के रूप में भेदभाव झेलते हैं, क्योंकि बिहार में उन्हें रोजगार नहीं मिलता। भ्रष्टाचार यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है — कोई भी सरकारी काम बिना रिश्वत के नहीं होता, और पुल गिरना अब आम खबर बन गई है, जून-जुलाई, 2025 में 17 दिनों में 12 पुल चुके हैं।

अगर जनता इन सवालों को केंद्र में लाएगी, तो राजनीति बदल सकती है। लेकिन अगर वह घुसपैठिया, धर्म और जाति जैसे झूठे मुद्दों में उलझी रही, तो लोकतंत्र सिर्फ एक नाटक बनकर रह जाएगा जिसमें दर्शक भी जनता होगी और शिकार भी वही।

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