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लोकसंस्कृति : यूपी का कुतिया मंदिर

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 नीलम ज्योति 

     _भारत देश अपनी विभिन्न सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है. यह आस्था का देश है, जहां लाखों की संख्या में मंदिर हैं. यहां पूजा पद्धति भी अलग-अलग है. कोई पेड़-पौधों की पूजा करता है तो किसी की आस्था पशुओं में है. यूपी के झांसी में तो एक मंदिर ऐसा है जिसमें कुतिया की मूर्ति स्थापित है._

     इस मंदिर पर लिखा हुआ है ‘जय कुतिया महारानी मां’. इस मंदिर पर लोग जाते हैं और मत्था टेकते हैं. 

      मऊरानीपुर के गांव रेवन और ककवारा की सीमा पर कुतिया महारानी का ये मंदिर है. ये सड़क किनारे बना है. इसमें काले रंग की कुतिया की मूर्ति स्थापित की गई है. 

मंदिर का ये नाम क्यों पड़ा इसके पीछे भी एक विचित्र आख्यान है. यहां के लोगों का कहना है कि एक कुतिया इन दोनों गांवों में रहती थी, जो किसी भी आयोजन में खाने पहुंच जाती थी.

     एक बार रेवन गांव में भोजन का कार्यक्रम था. रमतूला की आवाज सुनते ही कुतिया खाना खाने के लिए रेवन गांव में पहुंच गई. लेकिन, वहां खाना खत्म हो चुका था.

    इसके बाद वह ककवारा गांव पहुंची, वहां भी खाना नहीं मिला और इस तरह वह भूख से मर गई.

     इलाके के ही रहने वाले इतिहास के जानकार हरगोविंद कुशवाहा का कहना है कि कुतिया की मौत से दोनों गांव के लोगों को बहुत दुख हुआ था, जिसके बाद उन्होंने कुतिया को दोनों गांव की सीमा पर गाड़ दिया और कुछ वक्त बाद वहां एक मंदिर बना दिया.

      अब परंपरा ये है कि अगर आसपास के गांव में कोई आयोजन होता है तो लोग इस मंदिर पर जाकर भोजन चढ़ाते हैं.

     इन लोगों का मानना है की इससे घर में अन्नपूर्णा का वास होता है. भुखमरी की नौबत नहीं अति. जीवन धन धान्य से भरा रहता है.

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