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*लोक तथ्य : दवा के साथ दारू*

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          ~ पुष्पा गुप्ता

‘दवा-दारू साथ में क्यों कहते हैं गुरुजी?’ शिष्य ने पूछा।

   ‘यह जानने के लिए तुम्हें एक कहानी सुनानी पड़ेगी वत्स।’ गुरुजी बोले।

एक समय की बात है…

    उत्तम प्रदेश नाम का एक राज्य था। वह ‘सोने की चिड़िया’ के नाम से नहीं, ‘साहित्य की चटिया’ नाम से सम्पूर्ण जगत में विख्यात था। वहां दूध की तो नहीं,अपितु साहित्य की धारा बहती थी। जमीन अति उर्वरा थी। जहां लेखक भारी मात्रा में उगते थे।

    इस कारण लेखकों के कई गुट बन गए थे। चूंकि जमीन अति उर्वरा थी,तो तमाम गुट बन जाने के बाद भी बहुतेरे लेखक छुट्टा ही छूट जाया करते थे। कवि भरभराकर कविताएं रचते तो कहानीकार हरहराकर कहानियां। इस तरह एक दिन में ही टनों साहित्य का उत्पादन हो जाया करता था।

     वहां के साहित्यकारों के मुख से प्रायः जनता शब्द से अधिक जुगाड़ शब्द सुनने को मिलता और जनता लेखकों को प्रायः तब जानती, जब उन्हें कोई पुरस्कार मिलता।

अतुलनीय साहित्योपादन के बावजूद भी वहां के लेखक कहते कि रायल्टी किस चिड़िया का नाम है। और एक सेकेंड में तीन किताबों का लोकार्पण होने के बावजूद भी प्रकाशक कहता कि आजकल पाठक तो आकाश कुसुम हो गए हैं। 

      तो ऐसे महान राज्य में अभिजीत और प्रसन्नजीत नामक दो लेखक रहते थे। चूंकि दोनों प्रतिबद्ध और कटिबद्ध लेखक थे, तो पुरस्कार को लेकर दोनों में कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती थी। बहुत दिनों से दोनों एक पुरस्कार पर दृष्टि गड़ाए हुए थे। जिसके अंतर्गत मिलने वाली धनराशि कुछ खास न थी। परंतु साहित्त्योद्धार हेतु उसे हस्तगत करना आवश्यक था।

    पहले उसे कौन हस्तगत करेगा, साहित्य जगत में इस बात की जबरदस्त चर्चा थी। वरिष्ठ साहित्यकार सट्टा लगाकर बैठ गए। कभी प्रसन्नजीत के भाव बढ़ते तो कभी अभिजीत के। इस तरह से उन दिनों साहित्य खूब फल-फूल रहा था।

एक दिन अपने विश्वस्तसूत्र से अभिजीत को पता चला कि प्रसन्नजीत आए-दिन पुरस्कार आयोजक की कुटिया में जाता है। आयोजक का घर बहुत बड़ा और आधुनिक था। परंतु उसने घर के बाहर नामपट्ट पर  ‘साहित्य कुटिया’ लिखवा छोड़ा था।

      विश्वस्त सूत्र ने अपने तई सटीक सूचना दी थी, परंतु प्रसन्नजीत दिन को नहीं रात्रि को भेंट करने आता था। यह ब्रेकिंग न्यूज सुनकर उसका हृदय विदीर्ण हो गया। उसे जोर का धक्का लगा। उस धक्के में इतना जोर था कि वह सीधे साहित्य कुटिया में गिरा।

     उसे देखकर आयोजक मुस्कुराया और आने का कारण जानते हुए भी आने का कारण पूछा। अभिजीत ने भी वही कारण बताया, जो युगों-युगों से अक्षुण्ण चला आ रहा है। 

     उसने कहा,’इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि आपसे मिलता चलूं!। यह सुनते ही आयोजक ने उसका झट विश्वास करने का अविश्वसनीय अभिनय का परिचय दिया। बातचीत के दौरान अभिजीत ने जाना कि आयोजक महोदय प्रसन्नजीत की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। और बातों-बातों में उसे यह भी ज्ञात हुआ कि प्रसन्नजीत आयोजक के लिए मधुमेह की दवाई लाने वाला है।

     अभिजीत ने इस मौके को अविलंब लपका। और दुनिया का सबसे सगा बनते हुए बोला,’दवाई के मामले में कतई लापरवाही नहीं करनी चाहिए!’ दवाई का नाम पूछकर वह कालीदास का मेघदूत बनकर उड़ गया। और कुछ समय उपरांत ही आयोजक के हाथ में दवा झम से बरसा दी।

    अब अभिजीत नियम से तीसरे-चौथे दिन दवाई लेकर प्रकट हो जाता। परंतु वह दवाई का आधा पत्ता ही लाता। उद्देश्य स्पष्ट था कि आयोजक महोदय से भेंट करने की अवधि में अल्पविराम हो।

     उसे अटूट विश्वास था कि यह दवाई का आधा पत्ता ही एक दिन ट्रंप का पत्ता सिद्ध होगा और प्रसन्नजीत का पत्ता अवश्य काट देगा।

चूंकि अभिजीत साहित्य के आधुनिक संस्कारों से परिचित हो रहा था, तो वह मात्र दवाई ही नहीं उसके साथ कभी कोई पत्ती, कोई टहनी, चूर्ण लेकर प्रकट हो जाता। और उत्साह से कहता,’इसको ट्राई करें! मेरे दादा ने गांव से विशेष आपके लिए भेजा है!’ वह दवाई के साथ जो भी जड़ी-बूटी या झाड़ी-झंकाड़ लाता, उसको रामबाण कहकर ही उन्हें थमाता।

     इधर अभिजीत की साधना चलती रही और उधर साहित्यजगत में सट्टे को लेकर जमकर बहस होती रही। अंततोगत्वा वह दिन भी आया जिसकी सभी को प्रतिक्षा थी। पुरस्कार की घोषणा हुई। प्रसन्नजीत ने बाजी मार ली।

    अभिजीत उदास हो गया। होना ही था। आधुनिक भाषा में यदि कहा जाए तो उसका मूड झण्ड हो गया। उसे सीने पर कुछ रेंगता हुआ लगा। उसने एक-दो बार सीने को सहलाया,मगर वहां उसे कुछ न मिला।

     अचानक उसे अपनी उंगलियों में हरकत महसूस हुई। खासतौर से अंगूठे में। उसने तत्काल फेसबुक पर एक टिप्पणी जड़ दी। 

‘मेरे प्रिय मित्र प्रसन्नजीत को पुरस्कार मिलने की लख-लख बधाई! पुरस्कार से उसकी झोली भरी और खुशियों से मेरा दामन! लव यू दोस्त! यूं ही खूब तरक्की करो!’

     टिप्पणी पोस्ट करने के बाद उसने मन ही मन सोचा कि आखिर मेरी तपस्या में कमी कहां रह गई! वह अपनी लिखी हुई कहानियों के पात्रों में परकाया प्रवेश कर सकता था,परंतु आयोजक और प्रसन्नजीत की काया के अंदर कैसे इंट्री मारे! तभी उसे अपने विश्वस्त सूत्र का विचार कौंधा।

     उसने दूरभाष पर उससे संपर्क किया। पर्दे के पीछे हुए खेल के विषय में पूछा। परंतु विश्वस्त सूत्र कोई सूत्र दे न सका। उसने बस सपाट बयानी की जैसे, साहित्य का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। निर्णायक साले गधे थे। उन्हें हलुवा और गोबर का फर्क नहीं पता! वगैरह-वगैरह। जिसका अब कोई मतलब नहीं था।

      प्रसन्नजीत ने आयोजक को एक गाली दी (भद्दी या गंदी कहना अनिवार्य नहीं है) और स्वयं से बोला,’बुढ़ऊ को साहित्य की समझ नहीं थी, तो कम से कम मानवता की समझ तो होनी चाहिए थी! एक बरस तक रेगुलर मैंने दवाई पहुंचाई !’ 

कुछ दिन अभिजीत सबकी नजरों से बचता रहा। उसकी हालत उस विवाहिता की तरह हो गई, जिसका विवाह तो हो गया हो,परंतु गौना न हुआ हो। और मिलन की कल्पना में बैठे-बैठे अधेड़पना आ धमका हो। वह तरह-तरह से स्वयं को समझाता। किताबें इधर-इधर पलटता।

     शून्य में देखते हुए कहता,’असली पुरस्कार तो पाठकों का प्रेम होता है!’ यह कहते हुए उसके नेत्र बरबस सजल हो जाते। उसे समझ ही न आता आखिर ऐसा क्योंकर हो रहा है!

जैसा कि विद्वानों ने कहा है :

    शब्दम शब्दम योगम वाक्य पूर्ण आस्ति त्वेम पहरम पहरम योगम दिवसम परिणतिम अर्थात जिस प्रकार शब्द-शब्द मिलकर वाक्य बनता है ,उसी प्रकार पहर-पहर मिलकर दिन बनता है।

      तो इसी प्रकार से कई दिन बीत गए। और वह दिन भी आया, जब प्रसन्नजीत  अभिजीत के घर प्रसन्न और विजयी भाव से आया। इधर-उधर की बातों के उपरांत दोनों के बीच सुरा की बोतल खुल गई। जिसे प्रसन्नजीत सहर्ष अपने साथ लाया था। लक्ष्य था पुरस्कार मिलने की खुशी में सुरापन करना और करवाना।

     खुजलाने का असली मजा तब आता है, जब एकांत हो। उसी प्रकार पुरस्कार पाने का मजा तभी है,जब प्रतिद्वंदी समक्ष हो! 

    लेखक के लेखन में रस हो न हो,परंतु सुरा में अवश्य होता है। उसका परिणाम यह हुआ कि दोनों शीघ्र ही झूमने लगे। 

‘साहित्य साधना तो संगत में ही होती है!’प्रसन्नजीत लहराया।  सांप की तरह हृदय के किसी कोने में कुंडली मारे बात सहसा मुख से निकली,’यार सच- सच बता तूने पुरस्कार कैसे हथियाया!’

     और कोई समय होता तो प्रसन्नजीत हथियार न डालता, वह तो सुरा उसके सिर पर चढ़ कर बोल रही थी, तो इस समय गुरुर की जगह सुरूर ने लिया था। वह झूमते हुए बोला,’मैं जानता हूं,तू बुढ़ऊ को दवाई देने जाता था! तू साहित्य का कच्चा खिलाड़ी निकला बे!’ यह सुनते ही अभिजीत का मुंह खुला का खुला रह गया।

      इस स्थिति में भी उसने सोचा कि साहित्य में जब मेरा विश्वस्त सूत्र हो सकता है तो उसका क्यों नहीं! यह विचार आते ही उसका मुंह बंद हो गया।

     ‘जानता है, तेरे जाने के बाद वहां मैं आता था!’ यह कहकर प्रसन्नजीत कुछ क्षण को रुका। फिर बोला,’तेरे दवाई का अधपत्ता देने के बाद बूढ़ऊ को मैं दारू की पूरी एक बोतल देता था…पूरी एक बोतल !’ यह कहकर प्रसन्नजीत कोने में लुढ़क गया। उस समय अभिजीत समझ नहीं पा रहा था कि बुढऊ जोकि  लुढ़कने वाले हैं,जाकर उसको लुढ़का दे या सामने प्रसन्नजीत जो लुढ़का पड़ा है कि उसे लुढ़का दे! इसी कशमकश में थोड़ी देर बाद ही वह खुद लुढ़क गया।

इस ऐतिहासिक बैठक के बाद दोनों के विश्वस्त सूत्रों ने यह कहानी साहित्य जगत में नहीं, अपितु संपूर्ण उत्तम प्रदेश में गा-गाकर बतायी।  तभी से दवा के साथ दारू का प्रचलन प्रारंभ हो गया।

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