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पूर्व पीएम वाजपेयी की साफ छवि पर खतरा बन सकता है HZL डील में सुप्रीम कोर्ट का संदेह?

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नई दिल्ली : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी के राजनीतिक जीवन की मिसाल दी जाती है। हालांकि, उनकी सरकार के कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री को लेकर कुछ ऐसे तथ्य उभरने लगे हैं जो अटल की साफ-सुथरी छवि को बट्टा लगा सकते हैं। हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) और स्टर्लाइट अपॉर्च्युनिटीज एंड वेंचर्स लिमिटेड (SOVL) के बीच हुई डील में भी ऐसी ही गड़बड़ी का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है जहां सरकार ने अपनी जांच एजेंसी सीबीआई को ही ‘झूठा’ बता दिया है।

अटल सरकार में धड़ाधड़ बिकी थीं सरकारी कंपनियां

कोर्ट ने कहा कि इस डील के विभिन्न बिंदुओं की पड़ताल करने के बाद मामले की गहन जांच करवाने की जरूरत समझ में आई है। कोर्ट ने कहा कि डील की एक दो नहीं बल्कि 18 बिदुओं को लेकर संदेह है जिनकी जांच होनी ही चाहिए। ध्यान रहे कि वाजपेयी सरकार में अरुण शौरी विनिवेश मंत्री थे जिनकी देखरेख में सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की धड़ाधड़ बिक्री हुई। अब कुछ बिक्रियों पर सवाल उठ रहे हैं और कहा जा रहा है कि तत्कालीन सरकार ने इन कंपनियों को औने-पौने दामों में निजी कंपनियों को बेच दीं।

तत्कालीन विनिवेश मंत्री शौरी पर हो चुका है केस

इससे पहले, राजस्थान में जोधपुर की विशेष सीबीआई अदालत ने सितंबर 2020 में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी समेत पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया था। तब अदालत के सामने लक्ष्मी विलास होटल को बाजार मूल्य से बहुत कम दाम में बेचने के मामला आया था। कोर्ट ने कहा था कि जिस होटल की कीमत ढाई सौ करोड़ रुपये से भी ज्यादा थी, उन्हें सिर्फ सात करोड़ रुपये के औने-पौने दाम लेकर बेच दिया गया।

2001 को अगल विनिवेश मंत्रालय का हुआ था गठन

वाजपेयी सरकार ने सरकारी कंपनियों को निजी हांथों में सौंपने के मकसद से 10 दिसंबर, 1999 को अलग विनिवेश विभाग का गठन कर दिया था। फिर 6 सितंबर, 2001 को विनिवेश मंत्रालय बना दिया गया जिसकी कमान अरुण शौरी के हाथों सौंप दी गई। प्रधानमंत्री वाजपेयी के भरोसेमंद होने के कारण शौरी ने कई कंपनियों का सौदा कर डाला। यहां तक कि 14 मई 2002 को मारुति उद्योग लि. के विनिवेश को भी मंजूरी दे दी गई। दो चरणों में विनिवेश के बाद 2006 में भारत सरकार का मारुति उद्योग में स्वामित्व पूरी तरह खत्म हो गया।

निजी हाथों में चली गईं बड़ी-बड़ी कंपनियां

इसमें कोई शक नहीं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकारी कंपनी को बेचने को लेकर जनविरोधी छवि बनने की बिल्कुल भी परवाह नहीं की। हिंदुस्तान जिंक लि. और भारत ऐल्युमीनियम (BALCO), उन सरकार कंपनियों में शामिल हैं जो वाजपेयी के शासनकाल में निजी हाथों में चली गईं। तब टाटा ग्रुप ने सीएमसी लि. और विदेश संचार निगम लि. (VSNL) खरीदी थीं। विनिवेश की प्रक्रिया यूं ही धड़ल्ले से चलती गई और सरकारी एफएमसीजी कंपनी मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्प (IPCL), प्रदीप फॉस्पेट्स, जेसॉप ऐंड कंपनी भी प्राइवेट सेक्टर को दे दी गईं।

अपनी एजेंसी को ही झूठा बता रही है सरकार!
बहरहाल, अब हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) की बिक्री के मामले में केंद्र सरकार ने एक बेहद अप्रत्याशित रुख दिखाते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अटल बिहार वाजपेयी सरकार में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) की बिक्री को लेकर सीबीआई ने शीर्ष अदालत को गलत जानकारी दी है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने देश की शीर्ष अदालत में यह बात कही है। उन्होंने कहा, ‘सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में जो मौलिक तथ्य पेश किए थे वो झूठे थे या संभवतः गलत… विनिवेश की निर्णय प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सीबीआई की कही गई एक-एक पंक्ति झूठी थी या गलत।’

CBI को गलत बताने की क्या है सरकार की दलील

सॉलिसिटर जनरल ने अपनी दलील में कहा, ‘किसी एक व्यक्ति ने फैसला नहीं लिया जैसा कि सीबीआई की तरफ से जताया गया है। (यह तथ्यात्मक रूप से गलत है)। यह त्रीस्तरीय सामूहिक फैसला था। अधिकार प्राप्त सचिवों के समूह ने प्रस्ताव की पड़ताल की थी जिनमें विभिन्न विभागों के 10 से 12 सचिव शामिल थे। उनके विचारों की पड़ताल विनिवेश प्रस्तावों पर फैसले के लिए गठित प्रमुख समूह (Core Group of Disinvestment) ने की। आखिर में केंद्रीय कैबिनेट ने सभी के विचारों को जांचा-परखा और तथ्यों एवं विचारों के पूरे पुलिंदे के मद्देनजर पूरी तरह सोच-विचार के बाद फैसला लिया।’ उन्होंने कहा कि सीबीआई ने गलत तथ्य रखे जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने भी गलत निष्कर्ष निकाला। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को सोचना चाहिए कि वह मामले में सीबीआई को एक रेग्युलर केस दर्ज करने के अपने निर्देश को वापस लेकर या उसमें सुधार करके अपनी गलती सुधारने पर विचार करे।

हिंदुस्तान जिंक डील पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि उसने दस्तावेजों और सीबीआई की जांच रिपोर्टों के साथ-साथ उसकी क्लोजर रिपोर्ट का भी गहन अध्ययन किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि मामले की शुरू से जांच की जरूरत है। एसजी ने पीठ का रुख भांपकर कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट से पुनविर्चार का आवेदन वापस ले लेंगे और इसकी जगह एक याचिका दायर करके पिछले साल 18 नवंबर को सीबीआई को दिए निर्देश की समीक्षा की गुहार लगाएंगे। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उन्हें आवेदन वापस लेने की अनुमति दे दी।

नवंबर 2021 के आदेश से खुल सकेंगे राज?
दरअसल, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने 18 नवंबर 2021 के अपने फैसले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने सवाल किया था कि हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) की बिक्री में कई गड़बड़ियां दिख रही हैं, फिर भी सीबीआई किस आधार पर प्राथमिक जांच (PE) को बंद करने का आवेदन दे रहा है? जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट पेश करने से पहले सीएजी रिपोर्ट को भी किनारे कर दिया। इन सारी टिप्पणियों के साथ बेंच ने सीबीआई को मामले में रेग्युलर केस दायर करने का आदेश दिया था।

डील की 18 बिंदुओं पर संदेह

आदेश में कहा गया था कि सीबीआई हिंदुस्तान जिंक लि. और स्टरलाइट के बीच हुई डील में 18 संदिग्ध बिंदुओं की गहराई से जांच करे और समय-समय पर जांच से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी कोर्ट को देते रहे। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तब कहा था, ‘केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2002 में एचजेडएल के 26% विनिवेश को लेकर रेग्युलेर केस दर्ज करने की दृष्टि से पर्याप्त मटीरियल हैं।’ पीठ ने अपने आदेश में एचजेडएल में सरकार की और 29.5% हिस्सेदारी बेचने के फैसले को हरी झंडी दे दी। तत्कालीन यूपीए सरकार ने वर्ष 2012 में हिंदुस्तान जिंक लि. के और 29.5 प्रतिशत शेयर बेचे थे।

वाजपेयी की छवि पर पड़ सकता है असर

अटल बिहारी वाजपेयी उन महान नेताओं में शामिल रहे हैं जिनके निधन के बाद कहा गया कि भारत में लोकतांत्रिक राजनीति के एक युग का अंत हो गया है। उन्होंने केंद्र में पूरे पांच वर्षों का कार्यकाल पूरा करने वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व करने की उपलब्धि हासिल की थी। वाजपेयी सरकार ने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, नदी जोड़ परियोजना समेत देश को जोड़ने की अनेक परियोजनाएं, पोखरण परमाणु परीक्षण, सर्व शिक्षा अभियान जैसे कई क्रांतिकारी योजनाएं बनाईं। इसी कड़ी में वाजपेयी सरकार ने घाटे के सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने के लिए अलग से विनिवेश मंत्रालय बनाया और इसकी जिम्मेदारी अरुण शौरी को दी गई। इस मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की बिक्री की। अब उनके कुछ फैसलों पर विवाद हो रहा है जिनमें हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड की डील भी शामिल है।

जब बेशकीमती कंपनी को बेच दिया गया था महज 749 करोड़ रुपये में!

नई दिल्लीहिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (विनिवेश का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट में कल ही सरकार ने कहा है कि इस कंपनी को बेचने के मामले में सीबाीआई ने सुप्रीम कोर्ट को गलत सूचना दी थी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कंपनी के 26 फीसदी शेयर 749 करोड़ रुपये में Sterlite Opportunities and Ventures Limited (SOVL) को बेच दिया गया था। वह भी कंपनी के मैनेजमेंट कंट्रोल के साथ। एसओवीएल अनिल अग्रवाल से जुड़ी कंपनी है।

क्या है मामला
तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 2001 में घाटे में चलने वाली सरकारी कंपनियों के विनिवेश का कार्यक्रम (PSU Disinvestment Programme) शुरू किया था। इसी के तहत हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड को बिक्री के लिए रखा गया था। उस पर अप्रैल 2002 में, SOVL ने कंपनी के शेयरों के अधिग्रहण के लिए एक खुली पेशकश की थी। भारत सरकार ने एसओवीएल को हिंदुस्तान जिंक के 26 फीसदी शेयर, मैनेजमेंट कंट्रोल के साथ 749 करोड़ रुपये में सौंप दिया था। बाद में एसओवीएल ने एचजेडएल के 20% अतिरिक्त शेयर पब्लिक से खरीद लिया। अगस्त 2003 में, एसओवीएल ने कॉल ऑप्शन क्लॉज का उपयोग कर भारत सरकार से पेडअप कैपिटल का 18.92 फीसदी अतिरिक्त शेयर खरीद लिया। इसके साथ ही हिंदुस्तान जिंक में SOVL की हिस्सेदारी बढ़कर 64.92% हो गई। बताया जाता है कि इस तरह से 64 फीसदी शेयर खरीदने में एसओवीएल को महज 1500 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ा। जबकि उस समय इसका बाजार मूल्य करीब एक लाख करोड़ रुपये था। इस कंपनी में अभी भारत सरकार की हिस्सेदारी 29.54% है।

अप्रैल 2011 में हो गया विलय
SOVL का अप्रैल 2011 में Sterlite Industries India Ltd में विलय कर दिया गया था। अगस्त 2013 में सेसा स्टरलाइट लिमिटेड बनाने के लिए स्टरलाइट इंडस्ट्रीज का सेसा गोवा लिमिटेड के साथ विलय हो गया। अप्रैल 2015 में सेसा स्टरलाइट का नाम बदलकर वेदांत लिमिटेड कर दिया गया। इस तरह से अब हिंदुस्तान जिंक अब वेदांत लिमिटेड की सहायक कंपनी है।

117 मिलियन टन रिजर्व मिनरल का खुलासा नहीं
मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक जब सरकार ने महज 749 करोड़ रुपये में इस कंपनी का 26 फीसदी शेयर बेच दिया था, उसी समय उसका वैल्यूएशन 39,000 करोड़ रुपये बैठ रहा था। यही नहीं, बताया जाता है कि डील के वक्त कंपनी के पास 117 मिलियन टन खनिज रिजर्व में था। इसका खुलासा सौदे में हुआ ही नहीं था। बाद में, लंदन मैटल एक्सचेंज ने 117 टन खनिज की कीमत 60 हजार करोड़ आंकी थी।

बामनिया कला माइंस व कायड़ प्रोजेक्ट भी छुपाने का आरोप
मीडिया में ऐसी रिपोर्ट आई थी कि 40 हजार करोड़ रुपए की सिंदेसर माइंस की तरह उदयपुर के पास बामनिया कला माइंस और अजमेर के पास कायड़ प्रोजेक्ट भी टेंडर डॉक्युमेंट में नहीं थे। डील से पहले की बैलेंस शीट बताती हैं कि ये दोनों असेट्स भी कंपनी की थी, जिनकी कीमत नहीं लगाई गई। इनमें से कायड़ प्रोजेक्टर में तो 2002 में ड्रिलिंग भी चल रही थी और बामनिया कला माइंस में स्टरलाइट ने बाद में काम शुरू किया। यह मुफ्त में ही एसओवीएल को मिल गया।

और भी थी संपत्ति
राजस्थान, आंध्रप्रदेश और तत्कालीन बिहार बाद में झारखंड, तीन राज्यों में काम करने वाली हिंदुस्तान जिंक के देश भर में ऑफिस, पावर प्लांट और जमीनें भी थीं। करोड़ों रुपए का स्क्रैप भी था। इसका भी वैल्यूएशन कम करने के आरोप लगे हैं। इन सभी की कीमत करीब 20 हजार करोड़ तक आंकी गई है।

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