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 मजदूरों को आधुनिक गुलाम बनाने वाली चार श्रम संहिताएं

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,मुनेश त्यागी 

     कोरोना काल में मोदी सरकार ने मजदूरों के हितों में बने श्रम कानूनों को एक ही झटके में खत्म करके, देश और दुनिया के मालिकान को और पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए चार श्रम सहिताएं बनाने बनाई है। मोदी सरकार ने पूंजीपतियों की मांग पर, उन को खुश करने के लिए, श्रम कानूनों को लचीला बनाने के नाम पर यह सब किया है और संसद में बिना बहस कराये ही इन्हें पास करा लिया है।

     इन नए कानूनों के चलते 74 परसेंट मजदूरों को जब चाहे तब काम से निकाला जा सकता है। अब उन्हें मालिकान के रहमों करम पर ही काम करना पड़ेगा। अब ट्रेड यूनियन बनाना भी लगभग असंभव हो गया है। इन चार कानूनों के लागू होने के बाद अब सेवायोजक किसी भी कार्य को करने के लिए ठेका मजदूर लगा सकता है।

      योगी सरकार पहले ही उत्तर प्रदेश में 38 श्रम कानूनों के में से 35 श्रम कानूनों को अगले तीन साल के लिए स्थगित करके मजदूरों के अधिकारों और सुविधाओं को छीन चुकी है। नए चार श्रम कानून मजदूर वर्ग पर एक भयंकर हमला है। श्रम कानूनों के खत्म होने से मजदूरों को संगठित होने और अपने हकों के लिए आवाज उठाने के अधिकार नहीं रहे हैं। काम के घंटे 8 की जगह 12 कर दिए गए हैं। अब मजदूरों को 4 घंटे आदि काम का कोई डबल टाइम नहीं मिलेगा।अब न्यूनतम वेतन की कोई गारंटी नहीं रह गई है, अब मजदूरों को कोई बोनस नहीं दिया जाएगा। कुल मिलाकर सरकार की नीतियों ने मजदूर को आधुनिक गुलाम बना दिया है और पूरे के पूरे पूंजीपति वर्ग की बल्ले बल्ले हो गई है।

      नये कानून बनने से स्थाई नौकरी खत्म हो गई है। अपना टर्म न बढ़ाने के लिए अब मजदूर श्रम न्यायालय की शरण में भी नहीं जा सकता है। फिक्स टर्म वाला मजदूर, अब यूनियन का सदस्य नहीं बन पाएगा क्योंकि मालिक उसे दोबारा काम पर नहीं रखेगा। अब अपने ऊपर होने वाले निर्मम शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने पर, मालिक उसे काम से निकाल देगा। ऐसी स्थिति में मजदूरों के पास अपनी लड़ाई लड़ने का, कोई कानूनी अधिकार भी नहीं रह गया है।

    सरकार ने पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए मजदूर की परिभाषा बदल दी है। उनके यूनियन बनाने और अपने हकों के लिए आवाज उठाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब ₹18000 मासिक पाने वाले को “मजदूर” और इससे ऊपर वाले को “कर्मचारी” कहा जाएगा। अब ठेकेदार और मैनेजर दोनों को मालिक बना दिया गया है। मजदूरों की एकता तोड़ने के लिए और उनके हकों की लड़ाई को कमजोर करने के लिए, समझौते की परिभाषा को बदल दिया गया है। अब इसे सामूहिक की जगह व्यक्तिगत बना दिया गया है।

    यहां पर एक वाजिब सवाल बनता है कि आखिर मोदी सरकार ने श्रम कानूनों को किसके कहने पर बदला है और किसके कहने पर चार श्रम संहिताएं बनाई हैं? यहां पर हम कहना चाहेंगे इन कानूनों को बनाने के लिए सरकार ने किसी भी ट्रेड यूनियन, यूनियन या केंद्रीय  कर्मचारियों की फैडरेशनों से विचार-विमर्श नहीं किया है। सरकार ने इन कानूनों को बड़े बड़े मालिकान को लाभ पहुंचाने के लिए, सिर्फ और सिर्फ पूंजीपति वर्ग और मालिकान को लाभ पहुंचाने के लिए संशोधित किया है।

     इन कानूनों से मजदूर वर्ग का, पूरे मजदूरों का, कोई लाभ नहीं होने वाला है, कोई भला नहीं होने वाला है। इन चार श्रम संहिताओं के लागू होने पर मजदूर सिर्फ और सिर्फ आधुनिक गुलाम बन कर रह जाएगा। इन चार नए कानूनों ने मजदूरों को अपनी यूनियन बनाने की अधिकार से लगभग वंचित कर दिया है। क्योंकि इन कानूनों के लागू होने के बाद किसी प्रतिष्ठान या करखाने में यूनियन बनाना लगभग असंभव हो गया है।

    इन नए कानूनों के लागू होने के बाद मजदूरों को वहां पहुंचा दिया गया है जहां वे आजादी मिलने से पहले थे, क्योंकि आजादी से पहले मजदूरों को लगभग कोई कानूनी अधिकार नहीं था। इन कानूनों के लागू होने के बाद, मजदूर वर्ग उसी दशा में पहुंच गया जाएगा।

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