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चौथा स्तम्भ?.. पारदर्शिता?…पक्षपात?

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शशिकांत गुप्ते

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ इनदिनों कमजोर क्यों दिखाई दे रहा है?किसी भी ईमारत को सुदृढ़ बनाएं रखने के लिए चारो स्तम्भ (खम्बे) समान रूप से मजबूत होने चाहिए।स्तम्भ का शाब्दिक अर्थ वास्तुकला अभियंत्रिकी (Architecture Engineering) में इसप्रकार बताया है।स्तम्भ मतलब,जो स्वयं संपीडित होकर अपने उपर जो भी छत आदि होता है,उसका भार वहन करता है।स्तम्भ का उपयोग प्रायः सपोर्ट के लिए किया जाता है।


लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ इसी तरह मजबूत होना चाहिए,और इस स्तम्भ पर जनता की समस्याओं को उजागर करने का जो भार है,उसे अपना कर्तव्य समझकर पूरा करना चाहिए।
स्तम्भ की लोकतंत्र अहम भूमिका होती है।
सतयुग की एक कथा में स्तम्भ का महत्व वर्णित है।सतयुग में खम्भे के अंदर से ही नरसिंह रूप में भगवान ने प्रकट होकर क्रूर दैत्य हिरण्यकश्यप का वध किया था।
लोकतंत्र में समाचार माध्यमों ने स्वयं के दायित्व को समझकर सत्य,निष्पक्ष,निर्भीकता और साहस को नरसिंह रूप में धारण कर अन्याय,अत्याचार,अनीति रूपी मायावी दैत्य का पर्दापाश करना चाहिए।समाचार माध्यमों में कार्यरत कर्मी सजगपरहरी कहलाते है।स्वतंत्रता संग्राम में सजगप्रहरियों की भूमिका का स्मरण कर प्रेरणा लेनी चाहिए।
वर्तमान में चौथे स्तम्भ की भूमिका संदेह जनक हो गई है?सजगप्रहरियों को सत्यता ही प्रकट करना चाहिए।बनावटी खबरों से बचना चाहिए।लोकतंत्र में किसी भी दल की सत्ता स्थाई नहीं रहती है।लोकतंत्र को सशक्त रखने के लिए किसी भी दल की सत्ता स्थाई होनी भी नहीं चाहिए।प्रख्यात समजवादी चिंतक विचारक डॉ राममनोहर लोहियाजी ने कहा है कि जिस तरह रोटी चूल्हे पर उलट पलट कर बनाई जाती तब रोटी पूर्ण रुप से पकती है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए चौथे स्तम्भ को स्वयं में धारा के विपरीत चलने का साहस पैदा करना चाहिए,धारा के साथ तो तिनका भी बह जाता है।
इनदिनों कुछ समाचार माध्यमों पर सत्ता की गोद में बैठने का आरोप लग रहा है यह शर्म की बात है।चौकीदार को नैतिकता के आधार पर चौकीदार ही रहना चाहिए।यदि चौकीदार ही भ्रष्ट्र हो जाए तो समाज में एक दूसरें पर विश्वास ही समाप्त हो जाएगा?
सामंती युग में राजाओं के जो भांड होतें थे जो सिर्फ और सिर्फ राजाओं की स्तुति करते रहते थे।यह भांड सहवैतनिक होतें थे।
सामंती युग समाप्त हो गया है।समाचार माध्यमों को याद रखना चाहिए कि अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।लोकतंत्र में तानाशाही प्रवृत्ति की स्तुति करना मतलब लोकतंत्र को कमजोर करने साज़िश में सहयोग करने जैसा है।
उपर्युक्त मुद्दों पर गम्भीरता से व्यापक बहस होनी चाहिए।
वर्तमान में कुछ समाचार माध्यमों ने पारदर्शिता को त्याग कर पक्षपातपूर्ण रवैय्या अपनाया है।यह प्रवृत्ति चाटुकारिता की द्योतक है।
एक बात सभी ने गांठ बांधकर रखनी चाहिए कि,भारत के लोकतंत्र को कोई भी कमजोर कर नही सकता है।इतिहास साक्षी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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