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आयुष्मान भारत योजना में 40.81% मामलों में फ्रॉड, CAG की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

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फ़ुरक़ान क़मर

जिस देश में 80 फीसदी से अधिक आबादी किसी भी तरह की सरकारी स्वास्थ्य सेवा से वंचित हो, जहां एक चौथाई आबादी बिना उधार या कर्ज लिए इलाज न करा पाए और जहां सीमित सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते 17 फीसदी लोग अपने बजट का 10 प्रतिशत तक चिकित्सा पर खर्च करने को मजबूर हों, वहां गरीबों को एक हद तक ही सही, पर मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा देने वाली व्यवस्था किसी वरदान से कम नहीं। इसके मद्देनजर, भारत सरकार ने 2008 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) शुरू की थी, जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को सालाना तीस हजार रुपये तक के इलाज के लिए स्वास्थ्य बीमा की सुविधा दी जाती थी।

लाभार्थी अधिक, खर्च कम

समय बदला, समय के साथ अपेक्षाएं बदलीं और RSBY की जगह 2018 में आयुष्मान भारत या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) लागू कर दी गई। इसके तहत, देश के 40 फीसदी अत्यंत गरीब (करीब 12 करोड़) परिवारों को प्रति परिवार पांच लाख रुपये तक की चिकित्सा सुविधा मुहैया कराए जाने का प्रावधान है। इस योजना के तहत, 27 किस्म के रोगों से संबंधित 1,949 तरह की सर्जरी सुविधा दी जाती है। चार राज्यों- दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिमी बंगाल- को छोड़कर यह योजना संपूर्ण भारत में लागू है।

वैसे, इस योजना को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार के स्तर पर कई उपाय किए गए थे।

ऐसे में यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि इस योजना में किसी भी तरह के दुरुपयोग की कोई गुंजाइश होगी। परंतु भारत के महा लेखा नियंत्रक (CAG) ने इस योजना के प्रारंभ से 31 मार्च 2021 तक का Performance Audit करके चौंका देने वाले तथ्य प्रस्तुत किए हैं। कुछ उदाहरण गौर करने लायक हैं।

इस योजना का लाभ उठाने के लिए मरीजों का आधार कार्ड से प्रमाणित किया जाना अनिवार्य है। हालांकि पहली बार वे आधार कार्ड के बिना भी इलाज करा सकते हैं। लेकिन उसके तुरंत बाद आधार कार्ड बनवाना आवश्यक है। ऑडिट के दौरान 56.56 लाख मरीजों के इलाज के लिए 7,322.33 करोड़ रुपयों का भुगतान किया गया, जिनमें से केवल 5.46 लाख मरीज ही आधार द्वारा प्रमाणित पाए गए।

नैशनल ऐंटी फ्रॉड यूनिट (NAFU) ने 33.11 लाख मामले एस्टेट ऐंटी फ्रॉड यूनिट (SAFU) को जांच के लिए भेजे, जिनमें से 40.81% मामलों में फ्रॉड साबित हुआ। कई मामलों में जांच अभी लंबित है।

जल्दबाजी से नुकसान

ध्यान रहे, ये सभी सूचनाएं स्कीम के शुरुआती तीन वर्षों के आंकड़ों पर आधारित हैं। बाद के दो वर्षों में क्या हुआ इसकी जानकारी शायद अगली रिपोर्ट में मिलेगी। इस रिपोर्ट पर संसदीय लेखा समिति की व्याख्या रोचक अवश्य हो सकती है। एक बात साफ है कि लक्ष्यों को जल्द से जल्द हासिल करने के चक्कर में चूक अवश्य होती है। दूसरी बात यह कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और IT ऐप्स से मदद जरूर मिलती है, मगर केवल उनके भरोसे निश्चिंत नहीं बैठा जा सकता।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रफेसर हैं)

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