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निःशुल्क शारीरिक व्यायाम?

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शशिकांत गुप्ते

मनुष्य को अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा सचेत रहना चाहिए। शारीरिक व्यायाम, कसरत करना,योग करना,पैदल चलना इसे सरल भाषा मे Walk करना कहतें है। यह सभी व्यायाम हम स्वयं कर सकतें हैं।
बाजारवाद के प्रचलन ने शारीरिक व्यायाम के लिए Gym जिम की दुकाने खुल गई है। जिम में विभिन्न प्रकार की मशीनों के माध्यम से सशुल्क कसरत करवाई जाती है।
योग का प्रचार प्रसार बाजारवाद के तर्ज पर होने से योग भी विपणन मतलब Marketing
की गिरफ्त में आ गया है। योग का व्यापक उद्योग स्थापित हो गया है।
उक्त सभी तरह के व्यायाम करने का लाभ वे लोग ही, उठा पातें हैं, जो विज्ञापन देखतें,पढतें और सुनते हैं।
जो लोग विज्ञापन देखने सुनने और पढ़ने से वंचित होतें हैं,उन लोगों के लिए प्राकृतिक रूप से सभी तरह के व्यायाम करने की सुविधा उपलब्ध है।
हमारी शासकीय व्यवस्था आमजन के लिए व्यायाम के स्रोत सिर्फ मुहैया नहीं करवाती बल्कि व्यायाम करने के लिए बाध्य कर देती है।
सड़कों पर गड्ढों के कारण वाहनों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए वाहन चालकों को जो मशक्कत करनी पड़ती है।
यह भी कसरत से कम नहीं है।
कमरतोड़ महंगाई से जूझते आमजन की कमरतोड़ने में खस्ताहाल सड़के भी सहयोगी होतीं हैं।
पैदल चलने वाले सड़को के गड्ढे से बचने के लिए कूदफांद कर मतलब छलांग लगाकर सड़कों पर चलतें हैं। यह भी कसरत करने का तरीका ही तो है। आश्चर्य तब होता है,जब देश के लोगों को सड़कों पर कूदने फांदने का इतना अभ्यास होने पर भी खेल प्रतियोगिताओं देश के प्रतियोगी High jump और long jump में असफल क्यों होतें हैं?
नोट बंदी के निर्णय के बाद देशवासियों को स्वयं के पैसे बदलने के लिए याचक बनकर घण्टो कतार में खड़े होने का अभ्यास हो गया।
सड़कों पर गड्ढों से बचने के लिए नज़र भी बहुत पैनी रखनी पड़ती है।आँखे फाड़ फाड़ कर देखना पड़ता है। इससे आँखों की रोशनी तेज हो जाती है। यह भी व्यायाम ही तो है।
प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़, तूफान,सुनामी,अतिवृष्टि अल्पवृष्टि,आदि तरह की अपदावों से बचने के लिए जो मशक्कत करनी पड़ती वह भी कसरत से कम नहीं होती है। प्राकृतिक आपदा के कारण पैदा होने वाली दहशत के कारण लोगों को अपनी साँसों को थाम कर रखना पड़ता है। यह प्राणायाम काअभ्यास ही तो है। यह अभ्यास दहशत के कारण लोगों को स्वस्फूर्त करना पड़ता है।
हाल ही में महामारी के दौरान हमने देखा मजबूर, मजदूरों ने लंबी दूरी तक पदयात्र की। रास्ते जो भी खाद्य पदार्थ उपलब्ध हो पाया वह खाकर उदर की तृष्णा शांत की। इस दौरान बहुत से लोगों को भूखें रहने का अभ्यास होगया। इसतरह का अभ्यास करना मतलब यह सहिष्णुता रखने की पराकाष्ठा है।
पिछले आठ वर्षों में देश की भावुक जनता को विज्ञापनों पर निर्भर रहने का अभ्यास हो गया है। युवाओं को बेरोजगार रहने का अच्छाखासा अभ्यास हो गया है।
पिछले आठ वर्षों में देश के नागरिकों को शारीरिक और मानसिक कसरत के लिए बहुत से स्रोत खुल गए हैं।
आठ वर्ष पूर्व भी उपर्युक्त स्रोत विद्यमान थे। फर्क इतना ही है कि,पूर्व की व्यवस्था विज्ञापनों पर पूर्ण तया अवलंबित नहीं थी।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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