शशिकांत गुप्ते
मकर संक्रांति के दिन मराठी भाषी समाज में बुजुर्गों से गुड़ और तिल लेकर उनके चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है।
एक दूसरे को भी तिल और गुड़ से बने लड्डू दे ले कर मराठी भाषा में बोला जाता है। तीळ गुळ घ्या आणी गोड गोड बोला।
अर्थात तिल और गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो।
काश यह मकर संक्रांति का पर्व प्रतिदिन होता तो सम्भवतः आज जो Hate Speech मतलब घृणा से भरे वक्तव्य पर बहस नहीं होती।
इनदिनों सियासी हलकों में एक मुद्दे पर चर्चा हो रही है कि, Hate Speech की कानून में कोई परिभाषा नहीं है।
इस मुद्दे को सार्वजनिक क्षेत्र में एक साज़िश कर जानबूझकर
गरमाया जा रहा है।
खगोल में तो हर माह संक्रांति होती है। सूर्य के राशि परिवतर्न को संक्रांत ही कहतें हैं। सूर्य हर माह राशि परिवर्तन करता है।
काश हर माह की संक्रान्त को महत्वपूर्ण माना जाए तो भाषा में घृणित शब्दों और वैमनस्यता को उकसाने वाले आक्रांत वक्तव्य अपने आप बंद हो जाएंगे।
हमें वाणी की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
प्रख्यात समाजवादी चिंतक,स्वतंत्रता सैनानी डॉ रामनोहर लोहियाजी ने कहा है,वाणी की स्वतंत्रता के साथ कर्म पर नियंत्रण भी होना चाहिए
असहमति लोकतंत्र की बुनियाद है। किसी व्यक्ति के विचारों से यदि कोई असहमत है तो उसे विरोध करने का पूर्ण हक़ है।
लेकिन विरोध करते समय वाणी संयमित होनी चाहिए, विरोध तर्क संगत होना चाहिए। जिस व्यक्ति के विचारों का विरोध करना उस व्यक्ति की आयु को ध्यान में रखना भी अनिवार्य है। सादर विरोध करना चाहिए।
आश्चर्य की बात तो यह है कि, जो लोग बेख़ौफ़ होकर Hate Speech खुलेआम दे रहें हैं।
वे स्वयं को अपनी वेशभूषा और पवित्र रंग के परिधानों से विभूषित करने वाले होतें हैं।
यदि कोई धार्मिक व्यक्ति है तो स्वाभाविक ही उसकी भाषा स्नेह की भाषा होनी चाहिए। आपसी सामंजस्य की भाषा होनी चाहिए।
सौहाद्रपूर्ण भाषा होनी चाहिए।
भड़काऊ भाषा तो दानवी प्रवृत्ति की भाषा है।
इस संदर्भ में शायर माजिद देवबंदी का यह शेर प्रासंगिक है।
जिसके किरदार पे शैतान भी शर्मिंदा है
वो भी आएं यहाँ करने नसीहत हमकों
अंत में शायर निदा फ़ाज़लीजी
यह शेर उक्त संदर्भ में सटीक है।
इतना सच बोल कि होंटो का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा
शशिकांत गुप्ते इंदौर

