Site icon अग्नि आलोक

देश सेवा में सर्वस्व न्यौछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानी

Share

यह मनुष्य स्वभाव है कि वह हमेशा बंधन से मुक्त रहना
चाहता है, क्योंकि दासता तो दुनिया का सबसे बड़ा
अभिशाप है। भारत ने लंबे समय तक इस दासता के दंश
का सामना किया है। हमें आजादी भी यूं ही नहीं मिली।
इसकी नींव में है उन महान बलिदानियों का संघर्ष,
जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए न्यौछावर कर दिया।
इनमें भी कई ऐसे लोग शामिल हैं, जिनके बलिदान का
जिक्र न तो कहीं सुनाई पड़ता है और न पढ़ने में आता
है। हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाने वाले, गोली और तोप
से उड़ा दिए जाने वाले न जाने कितने ही ऐसे वीरों की
गाथा सिर्फ एक क्षेत्र विशेष तक ही सिमट कर रह गई।

आजादी का अमृत महोत्सव ऐसे ही वीरों को नमन करने
का क्षण है।
भारतीय स्वातंत्र्य वीरों में ऐसा ही प्रमुख स्थान श्यामजी
कृष्ण वर्मा
का भी है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने
उनके संबंध में लिखा है- “श्यामजी कृष्ण वर्मा ने उस
समय अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपना पग उठाया था,
जिस समय लोग अंग्रेजों का नाम लेते हुए भी डरते थे।”
18 फरवरी 1905 को लंदन में इंडियन होम रूल सोसाइटी
की स्थापना करते हुए श्यामजी कृष्ण वर्मा ने कहा था-
“यह सोसायटी भारत में भारतीयों का राज्य स्थापित करने
का प्रयत्न करेगी और भारत की जनता में भारत की
एकता तथा अखंडता के लिए प्रचार करेगी।”
उनका इंडिया हाउस लंदन में भारतीय क्रांतिकारियों का
ठिकाना होता था। ऐसे महान क्रांतिकारी की अस्थियां 55
साल तक विदेश में इंतजार करती रहीं। आखिरकार 22
मई 2003 को गुजरात के तत्कालीन सीएम और मौजूदा

पीएम नरेंद्र मोदी जेनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा और
उनकी पत्नी की अस्थियां लेकर भारत आए।
पढ़िए अाजादी के अमृत महोत्सव की श्रृंखला में ऐसे ही
कुछ महान क्रांतिकारियों की कहानी…

कोल आंदोलन’ के सूत्रधार क्रांतिकारी बुधु भगत
जन्म : 17 फरवरी 1792, मृत्यु : 13 फरवरी 1832
बुधु भगत की संगठन क्षमता को देखकर लोग उन्हें देवता
का अवतार समझते थे।

झा‌रखंड के रांची जिले में सिलागाई गांव के एक उरांव
परिवार में 17 फरवरी 1792 को जन्मे बुधु भगत एक ऐसे
क्रांतिकारी थे जिन्होंने एक कुल्हाड़ी के दम पर ब्रिटिश
सरकार की तोपों, बंदूकों का मुकाबला किया था। इतना ही
नहीं, अपने साहस और नेतृत्व क्षमता के बूते उन्होंने

आदिवासी इलाकों में अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता के
खिलाफ 1832 में कोल आंदोलन का सूत्रपात्र किया था
और हथियारबंद विद्रोह का भी नेतृत्व किया था। कोल
आंदोलन के जननेता बुधु भगत बचपन से ही तलवारबाजी
और धनुर्विद्या का अभ्यास करते थे और उन्होंने अंग्रेजों
के चाटुकार जमींदारों, दलालों के विरुद्ध भूमि, वन की
सुरक्षा के लिए जंग छेड़ी थी। वह हमेशा एक कुल्हाड़ी
अपने साथ रखते थे। बुधु भगत की संगठन क्षमता को
देखकर लोग उन्हें देवता का अवतार समझा करते थे।
उन्होंने सिल्ली, चोरेया, पिठौरिया, लोहरदगा और पलामू में
भी संगठन का काम किया था। कहा जाता है कि बुधू
भगत का छोटानागपुर के रांची और आसपास के इलाके
के लोगों पर जबर्दस्त असर था और लोग उनके एक
इशारे पर अपनी जान तक देने के लिए तैयार रहते थे।
एक कुशल संगठनकर्ता के साथ-साथ उन्होंने आदिवासी
समाज को अन्याय के खिलाफ जन आंदोलन करने की

एक मजबूत सीख भी दी थी। उन्होंने अपने दस्ते को
गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया था और घने
जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का फायदा उठा कर कई बार
अंग्रेजी सेना को परास्त भी किया था। अंग्रेजों के खिलाफ
लड़ाई में बुधु भगत के बेटों, बहनों के साथ-साथ परिवार
के अन्य सदस्यों ने भी उनका जमकर साथ दिया था।
बुधु भगत का सैनिक अड्डा चोगारी पहाड़ की चोटी पर
घने जंगलों के बीच था और रणनीति बनाने का काम यहीं
पर होता था। एक समय ऐसा भी आया, जब उनकी वीरता
और साहस से तंग आकर अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए
एक हजार रुपये के इनाम की घोषणा की जो उस जमाने
में बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी। बुधु भगत और उनके
साथियों को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने 13 फरवरी 1832
को सिलागाई गांव में घेर लिया और जम कर गोलीबारी
की। इस गोलीबारी में बुधु भगत देश की खातिर लड़ते हुए
शहीद हो गए।

स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान के साथ जो बने
पंचायती राज व्यवस्था के वास्तुकार’

जन्म : 19 फरवरी 1900, मृत्यु : 19 सितंबर 1965

मीठापुर से कच्छ जाने के दौरान पाकिस्तानी वायुसेना के
हमले में बलवंत राय मेहता ने गंवाई थी अपनी जान।

गु‌जरात के दूसरे मुख्यमंत्री रहे बलवंतराय मेहता का पूरा
नाम ‌बलवंतराय गोपालजी मेहता था जिनका जन्म 19
फरवरी 1900 को भावनगर के एक मध्यमवर्गीय परिवार
में हुआ था। वह महज 20 साल की उम्र में ही भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने लगे थे और स्वाधीनता की
लड़ाई में दिलो-जान से जुट गए थे। उन्होंने औपनिवेशिक
दमन का जम कर विरोध किया था। बलवंतराय मेहता ने

कला स्नातक में पढ़ाई पूरी की लेकिन देश प्रेम के चलते
उन्होंने औपनिवेशिक सरकार से डिग्री लेने से इंकार कर
दिया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने के लिए
1921 में गुजरात में भावनगर प्रजा मंडल की स्थापना की
और 1930 से लेकर 1932 तक सविनय अवज्ञा आंदोलन
में भी भाग लिया। इसके साथ ही उन्होंने अन्यायपूर्ण
टैक्स लगाए जाने के खिलाफ इतिहास के प्रसिद्ध 1928
के बारडोली सत्याग्रह में भी सक्रिय भागीदारी की और वह
इस आंदोलन के महत्वपूर्ण सदस्य बन कर उभरे। भारत
छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्हें 3 साल जेल की
सजा सुनाई गई थी और अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान
वह करीब 7 साल तक जेल में बंद रहे। 1957 में उनकी
ही अध्यक्षता में बनी समिति ने देश के लोकतांत्रिक
विकेन्द्रीकरण पर अपनी रिपोर्ट दी जिसे आज हम
पंचायती राज के रूप में जानते हैं। बलवंतराय मेहता
समिति की ही रिपोर्ट की बुनियाद पर भारत में त्रिस्तरीय

पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई। इसी समिति ने स्थानीय
निकायों को नियोजन और प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण देने
की सिफारिश की थी। मेहता का यह काम बेहद शानदार
रहा जिसका फायदा आज समाज के निचले वर्ग तक पहुंच
रहा है। पंचायती राज व्यवस्था को ताकतवर बनाने के
प्रयासों के चलते ही आज बलवंतराय मेहता को ‘पंचायती
राज व्यवस्था के वास्तुकार’ के रूप में जाना जाता है।

आजादी के आंदोलन में जतीन्द्र मोहन सेनगुप्त
ने लगा दिया पूरा जीवन, जेल में ली अंतिम सांस

जन्म : 22 फरवरी 1885, मृत्यु : 23 जुलाई 1933

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना संपूर्ण जीवन
समर्पित कर देने वाले जतीन्द्र मोहन सेनगुप्त का जन्म

22 फरवरी 1885 को तत्कालीन भारत के चटगांव
(वर्तमान में बांग्लादेश) के एक जमींदार परिवार में हुआ
था। उनके पिता जात्रा मोहन सेनगुप्ता एक वकील और
बंगाल विधान परिषद के सदस्य थे। कोलकाता के
प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई के बाद वह आगे की पढ़ाई
करने के लिए 1904 में इंग्लैंड गए। हालांकि, उनके मन में
देश सेवा की लौ जल रही थी और ऐसे में जब महात्मा
गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो जतीन्द्र मोहन
भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं रहे। ऐसे में वकालत का
काम छोड़ वह भी आंदोलन की राह पर चल पड़े।
‘देशप्रिय’ उपनाम से विख्यात सेनगुप्त की छवि जल्दी ही
मजदूर हित समर्थक की बन गई और उन्होंने सविनय
अवज्ञा आंदोलन में भी भाग लिया। कहा जाता है कि
क्रांतिकारियों के बचाव के लिए उन्होंने कई बार अदालत
में पैरवी की। वह 1931 में गोलमेज सम्मेलन में भाग
लेने के लिए इंग्लैंड भी गए। जतीन्द्र मोहन ने एक अंग्रेज

महिला से शादी की थी जिनका जन्म 12 जनवरी 1886
को कैंब्रिज में हुआ था। उनकी पत्नी का वास्तविक नाम
एडिथ एलेन ग्रे था जिन्होंने विवाह के बाद अपना नाम
बदल कर नेली सेनगुप्त कर लिया था। नेली सेनगुप्त उन
प्रमुख अंग्रेज महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने विदेशी
होते हुए भी भारत को आजाद कराने के लिए अपना
जीवन समर्पित कर दिया था। कहा जाता है कि आजादी
की लड़ाई के दौरान नेली ने घर-घर जाकर खादी बेचा था
और भारत की स्वतंत्रता को ही अपना लक्ष्य बना लिया
था। नेली को कांग्रेस का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया
था। रांची जेल में 48 वर्ष की अल्पायु में 23 जुलाई 1933
को जतीन्द्र मोहन की मृत्यु हो गई।

अपनी नेतृत्व क्षमता के कारण बापू के अनन्य सहयोगियों
में शामिल रहे सेनगुप्त

मणिराम दीवान: असम टी कंपनी के दीवान की नौकरी
छोड़ आजादी के आंदोलन में कूद पड़े


जन्म : 17 अप्रैल 1806, शहीदी दिवस : 26 फरवरी 1858
असम के राजा के साथ अंग्रेजों से लोहा लेने वाले दीवान
को जोरहाट जेल में फांसी दी गई।

मणिराम दीवान असम के उन महान स्वतंत्रता सेनानियों
में से एक थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने
प्राण न्यौछावर कर दिए और आजादी की लड़ाई में कई
लोगों के प्ररेणास्रोत बनकर उभरे। 17 अप्रैल 1806 को
जन्मे मणिराम दत्त को मनीराम दीवान के नाम से जाना
जाता है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी के साथ-
साथ बड़े कारोबारी भी थे। उन्होंने ही असम में सबसे
पहले चाय के बागान लगवाए थे और 1839 में अंग्रेजों ने
उन्हें असम टी कंपनी का दीवान नियुक्त किया था
लेकिन 1840 में अंग्रेज अधिकारियों से मतभेद के कारण

उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी। हालांकि, उन्होंने इस अवधि
के दौरान चाय की खेती में दक्षता हासिल कर ली और
अपना चाय का बगान खोल लिया। उस वक्त देश में
अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनने लगा था और बगावत की
शुरुआत होने लगी थी। इसी दौरान 1850 के दशक में
मणिराम अंग्रेजों के खिलाफ हो गए और 10 मई 1857
को अंग्रेजों के खिलाफ जब भारतीय जवानों ने विद्रोह का
बिगुल बजाया तो उन्होंने इसे असम के पुराने राजवंश
अहोम को पुनः स्थापित करने का सुनहरा अवसर समझा।
ऐसे में उन्होंने तुरंत वहां के राजा को डिब्रूगढ़ और
गोलाघाट के सिपाहियों की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ
विद्रोह करने का आग्रह किया। राजा कन्दपेश्वर सिंह ने
अपने स्वामिभक्त लोगों के साथ एक योजना बनाई और
हथियारों का जखीरा भी इकट्ठा कर लिया लेकिन अंग्रेजों
को इस अभियान की भनक लग गई। ऐसे में राजा,
मणिराम और अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया गया

और उन्हें जोरहट जेल में रखा गया। इस मामले में
अंग्रेजों ने मणिराम को षड्यंत्र का दोषी माना और उन्हें,
एक अन्य स्वतंत्रता सेनानी प्याली बरुआ के साथ 26
फरवरी, 1858 को जोरहट जेल में फांसी दे दी। 1963 में
मणिराम पर बनी फिल्म में डॉ. भूपेन हजारिका ने ‘बुकू
हूम-हूम करे’ गीत गाया था। वे एक ऐसे सच्चे देशभक्त
थे जिनका नाम इतिहास में हमेशा स्वर्णिम अक्षरों से
लिखा जाएगा और आने वाले हर पीढ़ि उन्हें हमेशा याद
करेगी।

रविशंकर महाराज ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर समाज
सुधार तक के लिए किया अथक काम

जन्म : 25 फरवरी 1884, मृत्यु : 1 जुलाई 1984
कहा जाता है कि रविशंकर महाराज ने पूरे जीवन सिर्फ
एक समय ही खाना खाया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले रविशंकर
महाराज एक ऐसे व्यक्ति थे जो न सिर्फ आजादी की
लड़ाई में शामिल रहे बल्कि सामाजिक सुधार के लिए भी
जीवन भर प्रयास करते रहे। रविशंकर व्यास के नाम से
भी जाने जाने वाले रविशंकर महाराज ने भारत को
आजाद कराने के लिए महात्मा गांधी और सरदार वल्लभ
भाई पटेल के साथ मिल कर काम किया था और अपना
जीवन देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। माना
जाता है कि रविशंकर महाराज, महात्मा गांधी और सरदार
वल्लभ भाई पटेल के पहले और करीबी सहयोगियों में से
एक थे और उनका जन्म 25 फरवरी 1884 को गुजरात के
खेड़ा जिले के एक गांव में हुआ था। उन्होंने कृषि कार्य में
अपने पिता की मदद करने के लिए छठी के बाद पढ़ाई
छोड़ दी थी और 1915 में उनकी भेंट महात्मा गांधी से
हुई थी। इसके बाद आजादी और सामाजिक सुधार के
कार्यों में उनकी रूचि बढ़ती गई और वह इससे जुड़े कार्यों

में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। स्वतंत्रता संग्राम में भाग
लेने के दौरान उनको जेल भी जाना पड़ा लेकिन देश की
खातिर वह तकलीफ उठाते रहे। उन्होंने बारडोली सत्याग्रह
में भी भाग लिया था और भारत छोड़ो आंदोलन में भी
सक्रिय रहे थे जिसके कारण अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें फिर
से जेल में बंद कर दिया था। 15 अगस्त 1947 को जब
भारत आजाद हो गया तो महात्मा गांधी के पद चिन्हों
पर चलते हुए रविशंकर महाराज सामाजिक कार्यों की ओर
उन्मुख हो गए। वह गुजरात के लोगों के कल्याण के लिए
रचनात्मक काम में लग गए और उन्होंने पिछड़े वर्ग के
लोगों और दलितों के उज्ज्वल जीवन के लिए कई काम
किये। वह संत विनोबा भावे के नेतृत्व में चलाए जा रहे
भूदान आंदोलन से भी जुड़े रहे और कई किलोमीटर की
यात्रा भी की। इतना ही नहीं, उन्होंने लोगों के जीवन को
सुधारने और डाकुओं को मुख्यधारा में लाने का भी प्रयास
किया। वह उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने 1975 में देश

में लगाए गए आपातकाल का विरोध किया था। वह एक
ऐसे व्यक्ति थे जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने
पूरी जिंदगी एक दिन में एक समय ही खाना खाया। उन्हें
करोड़ों रुपए और जमीन दान में मिली थी लेकिन उन्होंने
अपने लिए कुछ नहीं रखा इसलिए उनको ‘करोड़पति
भिखारी’ भी कहा जाता है। 1 जुलाई 1984 को गुजरात में
उनकी 100 साल की उम्र में मृत्यु हो गई। अपना सारा
जीवन देश की सेवा में व्यतीत करने वाले रविशंकर
महाराज के सम्मान में भारत सरकार ने 1984 में एक
डाक टिकट जारी किया था।

…………….

चंद्रशेखर आजाद

जो जीते जी
‘आजाद’ ही रहे…

आजाद… यह शब्द ध्यान आते ही, आपके मन में मूंछों
को ताव देते एक नौजवान की वह तस्वीर आती है, जिसे
पूरी दुनिया चंद्रशेखर आजाद के नाम से जानती है। ऐसी
शक्तिशाली सरकार जिसका कभी सूर्य अस्त नहीं होता
था, वह भी उन्हें जीवित रहते जंजीरों में जकड़ नहीं पाई।
27 फरवरी, 1931 को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में शहीद
होने के पहले तक पुलिस आजाद को छू भी नहीं पाई।
चंद्रशेखर आजाद अपनी आखिरी सांस तक आजाद ही
रहे……

जन्म : 23 जुलाई, 1906, मृत्यु : 27 फरवरी, 1931

म ध्यप्रदेश के भाबरा गांव में 23 जुलाई, 1906 को
सीताराम तिवारी के घर चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ
था। कहा जाता है कि उनका परिवार उत्तर प्रदेश के
उन्नाव जिले के बदरका गांव से था, लेकिन पिता सीताराम
तिवारी को अकाल के कारण अपने पैतृक गांव को छोड़कर
मध्यप्रदेश के भाबरा का रुख करना पड़ा। मन बचपन से
ही विद्रोही स्वभाव का था, सो उनका मन पढ़ाई से ज्यादा
खेल गतिविधियों में रमा। ‘आजाद’ उपनाम के पीछे भी
एक रोचक कहानी है। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने
बालक चंद्रशेखर के मन को झकझोर कर रख दिया। जिस
बेटे को मां संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, वह देश
को आजाद कराने की राह पर चल पड़ा। 1921 का दौर
असहयोग आंदोलन था। कहा जाता है कि एक धरने पर
बैठे हुए 15 साल के चंद्रशेखर को पुलिस ने गिरफ्तार कर
लिया। कोर्ट में पेशी हुई। मजिस्ट्रेट ने जब नाम, पता, और
पिता का नाम पूछा तो चंद्रशेखर ने जवाब में कहा- ‘मेरा

नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्र और पता जेल है।
इस जवाब पर सजा मिलनी थी, सो मिली भी पर
चंद्रशेखर के नाम के साथ ‘आजाद’ हमेशा के लिए जुड़
गया। असहयोग आंदोलन चौरी-चौरा कांड के बाद बीच में
वापस हुआ तो आजाद को लगा कि सिर्फ शांतिपूर्ण तरीके
से आजादी नहीं मिलने वाली तो बनारस का रुख किया।
बनारस उन दिनों भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों का
केंद्र हुआ करता था। इसके बाद अक्टूबर 1924 में कानपुर
में स्थापना हुई हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की,
बाद में यही हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
बना। संगठन में राम प्रसाद बिस्मिल, जोगेश चटर्जी,
चंद्रशेखर आजाद, योगेंद्र शुक्ला, शचींद्रनाथ सान्याल,
अशफाकउल्लाह खान, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, भगत
सिंह, भगवती चरण वोहरा और सुखदेव जैसे महान
क्रांतिकारी शामिल हुए। अगले दशक तक इन नामों ने
राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचा और ब्रिटिश हुकूमत के

मन में खौफ पैदा कर दिया। 1925 में काकोरी ट्रेन कांड
के बाद संगठन के कई सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए पर
आजाद और कुंदन लाल पुलिस के हाथ नहीं चढ़े। कहा
जाता है कि 17 दिसंबर, 1927 को अंग्रेज डीएसपी जॉन
सॉन्डर्स को मारने के बाद जब भगत सिंह और राजगुरु
डीएवी कॉलेज के हॉस्टल की ओर भाग रहे थे, तो एक
पुलिस हवलदार चानन सिंह उनके पीछे दौड़ रहा था।
भागते हुए चानन सिंह की बाहें भगत सिंह को बस
पकड़ने ही वाली थीं, लेकिन इससे पहले कि चानन सिंह
ऐसा कर पाते एक गोली उनकी जांघ के पार निकल गई।
यह गोली चंद्रशेखर आजाद ने ही चलाई थी। 1929 में
केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट के बाद भगत सिंह,
बटुकेश्वर दत्त और संगठन के अधिकतर सदस्य गिरफ्तार
कर लिए गए, लेकिन भेष बदलने में माहिर माने जाने
वाले चंद्रशेखर आजाद इस बार भी अंग्रेजों के हाथ नहीं
आए।

आजाद की जन्मस्थली भाबरा जाने वाले नरेंद्र मोदी देश
के पहले प्रधानमंत्री हैं। 2016 में यहीं से ‘जरा याद करो
कुर्बानी’ कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की
थी। n

Exit mobile version