डॉ. विकास मानव
_समय अति मूल्यवान है। इस संसार में सब कुछ वापस मिल सकता है, समय और यह जीवन–ये दोनों चीजें ऐसी हैं कि जो कभी वापस नहीं मिल सकतीं।_
सीमा एक प्रकार का बन्धन है। जिन चीजों से हम बंधते हैं–वह आसुरी संपदा है। आसुरी संपदा हमें बांधती है। आसुरी वृत्ति हमें विचारों से बांधती है, भावों से बांधती है, मन से बांधती है, तरह-तरह की सम्पत्तियों से बांधती है। और हम हैं कि बंधते चले जाते हैं, बंधते ही चले जाते हैं।

मुक्ति का कोई उपाय नहीं सूझता। यदि सूझता भी है उससे और भी अधिक बंध जाते हैं।
इसके ठीक विपरीत दैवी संपदा हमें सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त कर देती है।
हम कई प्रकार से बंधे हुए हैं। सबसे बड़ा बन्धन है–शरीर का बन्धन। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाय तो मुख्य रूप से 6 प्रकार के बन्धन हैं–संसार का बन्धन, समाज का बन्धन, परिवार का बन्धन, शरीर का बन्धन, मन का बन्धन और अंत में है आत्मा का बन्धन।
संसार, समाज और परिवार के बंधनों से मुक्ति का उपाय है–सन्यास और शरीर, मन और आत्मा के बन्धनों से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है योग। एक प्रयास है और दूसरा है अभ्यास। सभी प्रकार के बंधनों में शरीर का बन्धन सबसे कठिन है, इसलिए कि शरीर की सीमा बन्धी हई है। आध्यात्मिक भाषा में शरीर को ‘कारागार’ और संसार को ‘महाकारागार’ कहते हैं।
शरीररूपी कारागार में आत्मा बन्द है और शरीर बन्द है संसाररूपी महाकारागार में।
शरीर कभी स्वस्थ है तो कभी अस्वस्थ। कभी बालक है तो कभी वृद्ध। चेतना स्वतन्त्र होते हुए भी शरीर की सीमा से बंधी हुई है। शरीर के भीतर शराब चली जाती है तो चेतना भी शरीर के साथ बेहोश हो जाती है। शरीर से रक्त निकल जाता है तो चेतना दुर्बल हो जाती है। शरीर जीर्ण-शीर्ण और वृद्ध हो जाता है तो चेतना भी हो जाती है जीर्ण-शीर्ण और वृद्ध।
शरीर टूट जाता है तो चेतना भी टूट जाती है। फिर शरीर की सीमा आकर एक दिन खड़ी हो जाती सामने और वह सीमा है–मृत्यु।
मृत्यु सबके सामने थोड़ी दूर पर खड़ी है। सबको मरना होगा, मिटना होगा। शरीर को मिट्टी और राख में बदलना होगा। और उसी के साथ शरीर की सीमा भी समाप्त हो जाएगी। चिता की अग्नि में हमारे शरीर के साथ-साथ हमारा संसार भी जलकर भस्म हो जाएगा।
शरीर की सीमा में और भी कई सीमाएं हैं–क्रोध की, घृणा की, मोह-माया की, राग-द्वेष की, ईर्ष्या-कलह की और न जाने कितनी और। जिस व्यक्ति का मन लोभ से भरा है, उसे हर ओर सीमा ही सीमा दिखलाई देती है। कितनी भी धन-संपदा उसके पास हो, कम ही मालूम पड़ेगी।
लोभी व्यक्ति को कभी ऐसा नहीं लगेगा कि उसके पास धन-संपदा अधिक है। जो लोभी नहीं है, उसे यही लगेगा कि उसके पास जो कुछ है–पर्याप्त है। उसके लोभ की सीमा मिट गई होती है। वह हर स्थिति में अपने को संतुष्ट समझता है। समझ लें कि सीमा जैसा हमारा परम शत्रु और कोई नहीं है और असीम जैसा हमारा कोई परम मित्र नहीं है। एक बन्धन है और एक है मुक्ति।
वास्तव में यदि हम साधक बनना चाहते हैं तो हर पल हम निरीक्षण करते रहें कि कौन-सी वस्तु हमारी सीमा बना रही है। जिसे हम ध्यान कहते हैं, प्रार्थना कहते हैं और कहते हैं साधना, वह और कुछ नहीं, हमें सीमा से अधिक बनाने की चेष्टा है। प्रायः लोगों का प्रश्न रहता है–साधना क्या है ? हम साधना करना चाहते हैं।
यदि हम वास्तव में साधना करना चाहते हैं और बनना चाहते साधक तो सबसे पहले हम अपने शरीर को देखें। शरीर पहला और सबसे बड़ा बन्धन है। सबसे पहले हम अपने शरीर से अपने आपको मुक्त करने का प्रयत्न करें। निरन्तर यह अनुभव करने का प्रयत्न करते रहें–‘क्या मैं शरीर हूँ ? क्या वास्तव में मैं शरीर ही हूँ, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ? क्या मैं शरीर से अलग हूँ ? क्या शरीर का अस्तित्व मेरा अस्तित्व है ?
–इन प्रश्नों की चोट से आगे चलकर हमें स्वयम् यह अनुभव होने लगेगा कि मैं शरीर नहीं हूं। शरीर अलग है और मैं अलग हूँ। शरीर मुझसे भिन्न है। शरीर तो जड़ है, मैं चेतन रूप हूँ। यह बहुत बड़ी आध्यात्मिक क्रांति है और जब हमारे भीतर यह क्रांति घटित होगी तो उस पल हमेशा के लिए शरीर का बन्धन टूट जाएगा और टूट जाएगी हमेशा के लिए शरीर की सीमा भी।
फिर शरीर के लिए कोई आकर्षण नहीं रह जायेगा। हम शरीर नहीं रह जाएंगे, शरीर के साक्षी बन जाएंगे। जैसे अन्य वस्तुएँ हम अपने से अलग समझते हैं, वैसे ही अपने शरीर को भी हम अपने से अलग समझने लगेंगे। इसी को कहते हैं योग में ‘साक्षीभाव’।
शरीर युवा हो– उसका साक्षी शरीर वृद्ध हो, शरीर निर्बल- उसका साक्षी शरीर रोगी हो, शरीर स्वस्थ हो– उसका साक्षी निरोग हो। किसी का प्रभाव नहीं–बस सबका साक्षीमात्र, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं–इस प्रतीति का जो सुख है–वही वास्तविक सुख है जिसे योगीजन आत्मसुख कहते हैं। हम चाहें कि वह आत्मसुख कुछ ही समय में हमें उपलब्ध हो जाये तो यह हमारा भ्रम है।
इसकी उपलब्धि के लिए लम्बी यात्रा करनी पड़ती है। आत्मसुख आध्यात्मिक मार्ग की पहली और अति महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उसे प्राप्त कर पाना सरल नहीं है।
शरीर के बाद दूसरा बन्धन है–मन। लेकिन मन अत्यधिक शक्तिशाली है, इसलिए मन से अपने को अलग कर पाना अत्यधिक कठिन कार्य है। फिर भी अभ्यास ऐसी चीज है कि कठिन से कठिन और जटिल से जटिल कार्य को सरल और सहज बना देता है।
अब हम अपने आप से पूछें–क्या मैं मन हूँ ? क्या “मैं” और “मेरा मन” दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं ? दोनों का अस्तित्व एक दूसरे से संबंध नहीं रखता ? –ये और ऐसे और प्रश्नों की चोट जब अपनी चरम सीमा पर पहुंचेगी तो हमारे भीतर एक ऐसी क्रांति घटित होगी जिसके परिणामस्वरूप हम अपने आपको “मन” से भिन्न समझने लगेंगे।
मन हमें उसी प्रकार दिखलाई देगा जिस प्रकार अन्य वस्तुएं। पहली अवस्था में हमारा अधिकार मन पर होगा। पहले जैसे मन के कहने पर हम चलते थे, वैसे ही हमारी आज्ञानुसार अब मन चलेगा। फिर एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी कि जब मन और उसमें उठने वाले भावों, विचारों, इच्छाओं, कामनाओं और वासनाओं के द्रष्टा हो जाएंगे हम।
योगीजन कहते हैं कि जो साधक द्रष्टाभाव को उपलब्ध है, वह स्थितप्रज्ञ और अपने आपमें स्थित है। मन से कुछ भी लेना-देना नहीं, मन से सदा के लिए संबंध टूट जाता है अर्थात् मन के बन्धन से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति।
व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त होते ही शरीर उससे नहीं छूट जाएगा। यह शरीर आगे भी रहेगा और संसार भी रहेगा। लेकिन हम रहते हुए भी नहीं रहेंगे। संसार और शरीर दोनों हमारे लिए स्वप्नवत हो जाएंगे। हमको सारा संसार सपने जैसा लगेगा। हम एक लम्बा सपना देख रहे होते हैं। शरीर किस स्थिति में है, वह स्थिति भी हमारे लिए स्वप्नवत हो जाएगी।
योगिगण इसी अवस्था को ‘सन्त की अवस्था’ कहते हैं। हम संतत्व को उपलब्ध हो जाएंगे। सन्त का अर्थ है–संसार और शरीर में रहते हुए भी दोनों से मुक्त। जो संतत्व को उपलब्ध हो जाता है, उसे परमज्ञान और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करने में देर नहीं लगती। जहाँ ये दोनों ज्ञान प्राप्त हुए, फिर संसार में आने का कोई प्रयोजन ही नहीं रह जाता है–जीवन-मरण से सदैव के लिए मुक्त।
आवागमन से हमेशा-हमेशा के लिये मुक्त। यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि उक्त दोनों ज्ञान को उपलब्ध होने पर भी हम शरीर में बने रहेंगे और बने रहेंगे इस संसार में। इसलिए कि ज्ञान चाहे कोई भी हो उससे कर्म का क्षय नहीं होता। पिछले जन्मों के कर्मों को तो भोगना ही पड़ेगा, जब तक उनका पूर्णरूप से क्षय नहीं हो जाता, संसार में रहना ही पड़ेगा।
कर्मफल-भोग से ही कर्म-क्षय हो सकता है। ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो जाने पर भी हम तबतक संसार और शरीर में बने रहेंगे जबतक पूर्वकृत कर्म का क्षय पूर्णरूप से नहीं हो जाता, भले ही इसके लिए हमें सैकड़ों वर्ष जीना पड़े। योगियोँ की सैकड़ों वर्ष की आयु का होना इसी तथ्य की ओर संकेत करता है।
*दीर्घ आयु का रहस्य :*
श्वास की संख्या और आयु की सीमा दोनों जन्म के दो घंटे पूर्व निर्धारित हो जाती है। यदि किसी व्यक्ति की श्वास की संख्या 50 हज़ार निर्धारित हो तो उसके अनुसार आयु का भी निर्धारण हो जाता है। जीव का जन्म उसके हाथ में नहीं है। यह सब अचेतन के हाथ मे है।
जीव के पूर्वजन्म कृत कर्म और उसके अनुसार मिलने वाला फल निर्धारण करते हैं कि उसका जन्म कहाँ हो। जीवन में कितना सुख-दुःख मिलना है–इसका भी उसीके अनुसार निर्धारण होना होता है और फिर वैसे ही ग्रह-नक्षत्र संयोजित हो जाते हैं जन्म की घड़ी में और वे ग्रह-नक्षत्र आजीवन उसके ऊपर अपना प्रभाव डालते रहते हैं।
योग और तंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। एक के अभाव में दूसरे की सिद्धि सम्भव नहीं। इसी प्रकार योग-तांत्रिक साधना भी एक ही जन्म की साधना नहीं है। उसमें पूर्णता लाभ के लिए कई जन्म लग जाते हैं।
चेतना तो एक ही होती है लेकिन उसके स्वभाव दो प्रकार के होते हैं–दैवी स्वभाव और आसुरी स्वभाव। ये दोनों स्वभाव सम्पूर्ण मानव जाति में हैं। देवताओं का दैवी स्वभाव है और असुरों का है आसुरी स्वभाव। लेकिन मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसमें दोनों स्वभाव हैं–दैवी भी और आसुरी भी।
वह डाकू भी बन जाता है और साधू भी, चोर भी बन जाता है और ईमानदार भी, मूर्ख भी बन जाता है और विद्वान् भी। गरीब भी बन जाता है और अमीर भी। प्राणी की हत्या भी करता है और रक्षा भी। दुर्वचन भी निकलते हैं उसके मुख से और आशीर्वचन भी। वह कर्कश वाणी भी बोलता है और मधुर भी। वह घृणा भी करता है और प्रेम भी।
कब कौन-सा स्वभाव मनुष्य के मन को प्रभावित करेगा ?–यह निश्चित नहीं है। योगीजन इसे ‘द्वैत स्वभाव’ कहते हैं। ये द्वैत भाव या द्वैत स्वभाव इस त्रिआयामी जगत् की विशेषता है। इसी द्वैत स्वभाव के कारण मनुष्य पूर्ण रूप से न तो आसुरी वृत्ति का बन पाता है और न तो दैवी वृत्ति का। न पूर्ण भोगी ही बन पाता है और न तो पूर्ण योगी ही।
साधना का उद्देश्य है–इन दोनों स्वभावों से ऊपर उठ जाना और यह तभी सम्भव है जब हम अपने आप को पूर्ण चैतन्य स्वरूप समझने लग जाएंगे।
मैं चेतना हूँ, मैं आत्मा हूँ, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हूँ। इसके लिए जो प्रयास है, वह है– योगतांत्रिक साधना। यदि हम साधक बनना चाहते हैं तो इस दिशा में प्रयास शुरू कर दें। प्रयास यदि हृदय से होगा तो ही हमें सफलता मिलेगी।
जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि यह संसार महाकारागार है। कारागार का अर्थ है–एक निश्चित सीमा में बंधना और अपनी स्वतंत्रता को खो देना। हम-आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसी व्यक्ति को जेल का दण्ड क्यों मिलता है ? इसलिए कि वह सुधरे। अपनी गलतियों पर पश्चाताप करे।
दोबारा फिर उससे संसार-समाज-परिवार के प्रति गलती न हो कि फिर उसे जेल की सजा हो जाये। इन सब बातों पर विचार करें, सोचें, चिन्तन करें और यह समझ लें कि जो मानसिक और शारीरिक कष्ट जेल में मिल रहा है, वह मेरी ही गलती का परिणाम है, प्रायश्चित हैं। मृत्युदंड की भी सजा इसीलिये दी जाती है कि मरते समय उस मरने वाले को जो महान् कष्ट हुआ था, उस कष्ट को यह व्यक्ति भी अनुभव करे और मानसिक रूप से प्रायश्चित करे।
प्रकृति का भी यही सिद्धान्त है। हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे व्यक्तित्व की तीन आवश्यकताएं हैं–शरीर की आवश्यकता, मन की आवश्यकता और आत्मा की आवश्यकता।
शरीर की आवश्यकता भोजन है, मन की आवश्यकता इच्छापूर्ति है और आत्मा की आवश्यकता है–परमज्ञान की प्राप्ति। जिस प्रकार भोजन के अभाव में शरीर अस्वस्थ हो जाता है, जिस प्रकार इच्छा, कामना, वासना आदि की पूर्ति न होने पर मन व्यग्र, दुःखी और अस्वस्थ हो जाता है, उसी प्रकार परमज्ञान उपलब्ध न होने पर आत्मा अस्वस्थ हो जाती है।
कहने का मतलब यह है कि हम–आप अस्वस्थ आत्मा हैं, अर्थात् अस्वस्थ चित्त हैं। इसी कारण संसार में जो लोग भी हैं, वे एक प्रकार से विक्षिप्त हैं।
*तीन प्रकार का ज्ञान :*
आत्मज्ञान, परमज्ञान और ब्रह्मज्ञान–ये तीन प्रकार का ज्ञान है। इन तीनों ज्ञान के उपलब्ध होने का एकमात्र क्षेत्र यह संसार ही है। मनुष्य को ज्ञान के ये तीनों स्तर क्रमशः, अवस्थानुसार प्राप्त होते हैं। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है–विश्वविद्यालय में हम शिक्षा प्राप्त करने जाते हैं और जब शिक्षा पूर्ण हो जाती है तो उसके बाहर आ जाते हैं।
तब विश्वविद्यालय हमारे लिए कोई अर्थ नहीं रखता। हम बीमार पड़ते हैं, अस्पताल में भर्ती होते हैं। स्वस्थ होने पर अस्पताल से बाहर आ जाते हैं। फिर अस्पताल हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखता। इसी प्रकार यह संसार आत्मा के लिए महाविश्वविद्यालय है।
अस्वस्थ चित्त के लिए महा चिकित्सा केंद्र है। इस संसार में बार-बार आत्मा को पुनर्जन्म ग्रहण करने का एकमात्र तात्पर्य यही है कि अभी उसकी आवश्यकता पूरी नहीं हुई। उसे ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। चित्त स्वस्थ नहीं हुआ है। पुनर्जन्म द्वारा उसे शरीर को ग्रहण करने का अर्थ है–संसार में आने का उपाय। यह शरीर आत्मा के वाहन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
शरीर द्वारा ही हम संसार में आते हैं या आ सकते हैं। शरीर नहीं तो हमारे लिए संसार भी नहीं।
*कर्तापन का कुत्तापन छोडें :*
जब तक हमारे भीतर कर्ताभाव है, तब तक हमारे भीतर अहंकार है और जब तक अहंकार है, तब तक चिन्ता है. यही असली चिता है.
इस दिशा मंत्रजप भी सहायक बन सकता है. उसकी आवृत्ति और ध्वनि वास्तविक स्वरूप का भान कराएगी.
तांत्रिक दृष्टि से नामजप और बीजजप दो हैं। दोनों में सिद्धि तभी प्राप्ति होती है जब हृदय में एकांतिक व्याकुलता का उदय और उसका विस्तार होता है। एकांतिक व्याकुलता कभी व्यर्थ नहीं होती।
जब चित्त बाह्य जगत से पूर्णरूप से विमुख होकर इष्ट में एकाग्र होता है और भक्ति संकुचित परिधि का त्याग कर व्यापक प्रेम का रूप धारण कर लेती है और तभी एकांतिक व्याकुलता का संचार होता है। यदि ऐसे समय में इष्ट-नामोच्चारण अथवा बीजोच्चारण साधक करता है तो वह कभी भी असफल नहीं होगा। सफलता निश्चित है। इष्ट स्वयं प्रकट होकर उपस्थित हो जाएगा उस समय और पथ-प्रदर्शन भी करेगा और सहायक भी बन जायेगा।
लोभ और अहंकार–ये चीजें भारी रुकावट उत्पन्न करती हैं साधना-मार्ग में. सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि लोभ और अहंकार ये दो चीजें साधना-मार्ग में भारी रुकावट उत्पन्न करती हैं।
साधना मार्ग में लोभ और अहंकार–दोनों से मुक्त होना चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण एक स्थान पर अर्जुन से कहते हैं–हे अर्जुन ! तू न जीवन की चिंता कर और न तो मृत्यु की। दोनों की चिंताएं मुझ।पर छोड़ दे। जीवन और मृत्यु मैं ही हूँ। तू व्यर्थ बीच में आकर चिंता अपने सिर पर ले रहा है।
भगवान के इन वाक्यों को पर विचार करना चाहिए। प्रायः लोग कहते हैं कि हम चिन्ता छोड़ना चाहते हैं लेकिन ऐसे बहुत ही कम लोग मिलेंगे जो वास्तव में चिन्ता-मुक्त होना चाहते हों। सच तो यह है कि वे कहते इसलिए हैं कि यह कहकर एक और चिन्ता अपने लिए उत्पन्न कर लेते हैं कि मैं चिन्ता छोड़ना चाहता हूं। बस और कुछ नही करते, एक नई चिन्ता, एक नई धार्मिक चिंता, एक नई समस्या, एक नई चिंता कि मुझे “शान्ति चाहिए” उत्पन्न कर लेते हैं। सच पूछा जाय तो कोई चिंता छोड़ना नहीं चाहता।
गहरे में चिन्ता से मुक्त होना अति कठिन है क्योंकि चिन्ता को छोड़ने का अर्थ अहंकार को छोड़ने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। हम स्थूल अहंकार को भी नहीं छोड़ना चाहते क्योंकि चिन्ता के सारे फूल-पत्ते अहंकार में ही लगते हैं।
यदि कोई पूर्णरूप से चिन्ता का त्याग कर दे तो अहंकार को तत्काल छोड़ना पड़ेगा। अहंकार को कोई तत्काल छोड़ना पड़ेगा। अहंकार के अतिरिक्ति और कोई चिन्ता इस संसार में नहीं है। चिन्ता को सभी छोड़ना चाहते हैं, लेकिन अहंकार को नहीं। इसलिए और एक चिन्ता सिर पर सवार हो जाती है कि चिन्ता कैसे छोड़ें ?
जब तक हमारे भीतर कर्ताभाव है, तब तक हमारे भीतर अहंकार है और जहां अहंकार है, वहां चिन्ता है।
कर्ताभाव हटते ही महामाया सब कुछ अपने ऊपर ले लेती है, फिर सारी समस्या खत्म, हम उसी के अंश हो जाते हैं.
चिन्ता का जन्म उसी क्षण होता है जिस क्षण हम अपने को कर्ता समझते हैं। जहां कर्ताभाव हटा, फिर कहाँ चिंता ? कर्ताभाव हटाकर देखिए, दूसरे ही क्षण देखिए–,अहंकार नष्ट हो जाएगा और उसी के साथ एक और चमत्कार घटित होगा और वह यह कि आप उसी समय चिन्तामुक्त भी हो जाएंगे सदैव के लिए और तब उस समय हम महाशक्ति के प्रवाह के एक अंश हो जाते हैं और ‘करने का सारा भार’ महाशक्ति स्वीकार कर लेती है।
हम मुक्त हो जाते हैं उस भार से तब भला क्या, बुरा क्या– सब उसी के हो जाते हैं। जीवन है तो उसका है, मृत्यु आये तो उसकी है। बीमारी हो, स्वास्थ्य हो, सुख हो, दुःख हो–जो भी है सब उसका है। हम तो मात्र उसके एक अंश हैं। फिर चिन्ता करने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता जीवन में।
कर्ताभाव हटते ही सारी समस्या खत्म। सारी समस्याएं माँ महामाया अपने ऊपर ले लेती है। हमारे पास अपना कुछ रह नहीं जाता। हम उस विराट के एक अंश बन जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– मैं यक्षों में कुबेर हूँ। कुबेर का अर्थ यह हुआ कि इस अस्तित्व में जो सबसे धनी है, जो सबसे श्रेष्ठ है, वह मैं हूँ। कहने का मतलब यह है कि वह ही सब कुछ है, उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। बस अपने अभिमान को, अहंकार को, कर्ताभाव को हटाना होगा। फिर तो सब कुछ उसी का है, उसे व्यष्टि से विराट होते एक क्षण भी नहीं लगता है।
गरीब व्यक्ति कभी धन की आकांक्षा से मुक्त नहीं हो पाता, वह हो भी नहीं सकता क्योंकि जो उसके पास है ही नहीं, उसके भाव से वह कैसे मुक्त हो सकता है। हम-आप बराबर उसी ( धन )की चाह में, उसी के प्राप्ति के चिंतन में लगे रहेंगे जीवनपर्यंत। उससे मुक्त नहीं रह सकते।
जितने भी अवतार हुए, सब राजपुरुषों के यहाँ हुए। राम, कृष्ण, बुद्ध–सब राजकुमार थे जिनके पास धन, दौलत, सुख, सुविधा की कोई कमी नहीं थी। वे सब अपने धन-त्याग, सुख-सुविधा के त्याग से मुक्त हो गए क्योंकि वह सब उनके पास था, यदि उनके पास वे चीजें न होती तो क्या वे उनसे मुक्त हो पाते।
*लोभ से मुक्ति के दो उपाय :*
1- आप इतने सजग हो जाएं, इतने प्रज्ञावान बन जाएं कि लोभ आपको व्यर्थ प्रतीत हो। 2- दूसरा उपाय यह है कि आपको लोभ से अंततः तृप्ति मिल जाये। लोभ जितना मांगता है, उससे अधिक आपको मिल जाये। पूर्ति की भी पूर्ति हो जाये, कुबेर की स्थिति उत्पन्न हो जाये, तो आप लोभ से मुक्त हो सकते हैं।
फिर सारा आकर्षण ही समाप्त हो जाएगा क्योंकि आपके भीतर जो भी लोभ है, जो भी आकर्षण है, उसका अन्तर्मन में जो बीज है, वही नष्ट हो जाएगा।
एक फकीर था– कई दिनों की भूख-प्यास से निर्बल। उसके पास धन के नाम से मात्र एक रुपया था। एक व्यक्ति फल की टोकरी लेकर जा रहा था। उसने एक रुपये में वे टोकरी के सारे फल उस फकीर को बेच दिए। फकीर फल खाने लगा। वे कोई फल नहीं थे, लाल मिर्च थी। फकीर ने लाल मिर्च कभी देखी नहीं थी।
उसने तो उन्हें फल ही समझ कर खरीदा था। मिर्च खाते ही जलन होने लगी, आंख लाल हो गयी। फिर भी वह खाता ही गया, खाता ही गया। एक व्यक्ति खडा यह सब देख रहा था, बोला– बाबा ! यह आप क्या कर रहे हैं ? मर जायेंगे। एक-दो मिर्च बहुत थी, यह टोकरी भर…
फकीर मुस्कराया, फिर बोला–मिर्च खा ही कौन रहा है, मैं तो अपना रुपया खा रहा हूँ। मिर्च का खाना तो पहली मिर्च के खाने के साथ ही समाप्त हो गया। अब तो मैं अपने शेष पैसे खा रहा हूँ। आप धनिकों को देखें, अमीरों को देखें, व्यापारियों को देखें, उनकी आंखों में आंसू मिलेंगे। वे कलपते हुए मिलेंगे, वे गिड़गिड़ाते हुए मिलेंगे।
आप जानते हैं–इन सबका एकमात्र कारण है पैसा खाना। पैसे को चबाने में लगे हैं वे। हर समय चबा रहे हैं वे सोते-जागते, खाते-पीते यहां तक कि सपनों में भी। आज मनुष्य के जीवन में पल भर के लिए चैन नहीं। जो इतनी पीड़ा है, कष्ट है, हाय-हाय है, उन सबका कारण बस यही है। जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनके पास पैसे न होने की कठिनाई है, लेकिन वह कठिनाई बड़ी नहीं है।
बड़ी कठिनाई तो पैसे वाले महापुरुषों के पास है। उनकी कठिनाई का कोई अन्त नहीं।
यह यात्रा दो प्रकार से रुक सकती है। एक है–पैसा खाने की यात्रा और दूसरी है–आपके पास इतनी प्रज्ञा हो, इतना ज्ञान हो, इतना विवेक हो कि आप पैसे खाने से बच सकें।
जपयज्ञ को स्वीकार करने वाले साधकों के लिए यह अति मूल्यवान बात है तभी वह सफल हो सकता है। लोभ से मुक्ति, फिर अहंकार से मुक्ति, फिर अन्त में चिन्ता