~ पुष्पा गुप्ता
राम और उनकी कथा फिर से चर्चा में है। ताजा चकल्लस राम कथा पर आधारित एक फिल्म ‘आदिपुरुष’ को लेकर है। दुनिया के चर्चित धार्मिक नायकों में जितनी रचनात्मक आजादी (क्रिएटिव फ्रीडम) राम की कथा को लेकर रही है, उतनी किसी अन्य की लेकर शायद नहीं रही है। कुछ दिव्यजन राम के बारे में लिखी गयी कई अल्पजीवी और अल्पज्ञात रचनाओं को सामने रखकर कहते हैं कि ये देखो इस किताब में राम के बारे में क्या लिखा है?
जाहिर है कि ऐसे लोग मूलतः रामसनेही नहीं रामद्वेषी होते हैं। सदियों से राम कथा का लिटमस टेस्ट जनता के बीच होता रहा है। बहुमत जनता जिस रामकथा को ठुकरा देती है, वह केवल कालांतर में प्रोफेसरों का पेट पालने के काम आती है।
जिस काशी में तुलसी के सगुण राम के गुणग्राही थे, उसी काशी में कबीर के निर्गुण राम के भी गुणग्राही थे। आदिपुरुष फिल्म पर हो रही चकल्लस में दो तरह के लोग नाराज दिख रहे हैं। एक जिनका अतीत राम भक्ति का रहा है। दूसरे वो जो बचपन में ही “लॉजिकल रिजनिंग और क्रिटिकल थिंकिंग’ के आधार पर ‘राम को काल्पनिक चरित्र’ घोषित करते रहे हैं।
इन दूसरे तरह के लोगों की निंदा में उनका विघ्नसंतोषी स्वभाव खुलकर सामने आ रहा है। ऐसे लोग भूल गये हैं कि यदि आपकी राम में आस्था नहीं है तो राम कथा आपके लिए नहीं है, बशर्ते आप हिन्दू धर्म एवं दर्शन में आस्था हुए बिना ही हिन्दू स्टडी के लाभार्थी बनकर सुखी जीवन न जी रहे हों।
जिनकी राम में आस्था रही है, वो सदियों से कुछ राम कथाओं को स्वीकारते और कुछ को नकारते रहे हैं। आदिपुरुष नकारी जा रही है तो उस ऐतिहासिक चक्र की पुष्टि ही कर रही है।
इंटनेट के आविष्कार के कारण आम जन की प्रतिक्रिया आज लिपिबद्ध हो रही हैं, इतना ही फर्क है। बहरहाल, ताजा प्रसंग के चलते राम पर लिखी अपनी एक पुरानी पोस्ट मामूली सम्पादन के साथ नीचे दे रहा हूँ। उम्मीद है आपको पसन्द आएगी।
अभी कुछ दिन पहले एक मित्र ने फेसबुक पर जिज्ञासा व्यक्त की कि क्या (रामायण वाले) राम से पहले भी यह नाम प्रचलित था? क्या राम अपने नाम के साथ सरनेम भी लगाते थे? मुझे लगा कि उनकी पोस्ट में थोड़ा उपहास वाला भाव भी था। मुझे लगा उनकी तरह बहुत से लोग होंगे जिन्हें इस तरह की जिज्ञासा होगी। यह पोस्ट उन्हीं के लिए है।
भारतीय राम को ईश्वर का अवतार मानते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में राम से ज्यादा व्याप्ति किसी और पूजनीय महापुरुष की नहीं है। सभी को अपने ईश्वर प्यारे होते हैं। समाजविज्ञानी दृष्टि से देखें तो मानना होगा कि राम एक मनुष्य रहे होंगे जिन्हें बाद में उनके अनुयायियों द्वारा ईश्वर का अवतार मान लिया गया। उसी तरह जैसे कुछ मनुष्यों को ईश्वर का पैगम्बर या ईश्वर का बेटा मान लिया जाता है।
लेकिन इस पोस्ट के लिए हम थोड़ी देर के लिए ईश्वरीय तत्व को किनारे रख देते हैं। उस राम की बात करते हैं जिनका जिक्र पुस्तकों और समाज में मिलता है।
रामकथा विशेषज्ञ कामिल बुल्के के अनुसार ऋग्वेद में इक्ष्वाकु, दशरथ और राम का एक-एक बार जिक्र आया है। इन जिक्रों के अनुसार तीनों ही पुराने समय के प्रतापी राजा प्रतीत होते हैं। उसके बाद अन्य वेदों, उपनिषदों, अरण्यकों, ब्राह्मणों, संहिताओं में विभिन्न राम का जिक्र आता है।
बुल्के ने बताया है कि सायण के अनुसार ऋग्वेद में राम के नाम का अर्थ ‘रमणीय पुत्र’ प्रतीत होता है। बाद में राम के नाम की अन्य कई आध्यात्मिक व्याख्याएँ की गयीं। उनपर फिर कभी।
इसमें शायद ही किसी को सन्देह हो कि भारत में भगवान भले ही कई हों साहित्यिक रचनाओं के नायक के रूप में राम से ज्यादा लोकप्रिय कोई दूसरा नहीं है।
इस मामले में किसी राम से किसी अन्य की तुलना भी सम्भव नहीं है। हमारे प्रिय कवि मैथलीशरण गुप्त ने ऐसी ही भावना के वशीभूत होकर लिखा है कि – राम, तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।
राम का चरित्र इतना उदात्त है कि जिस भाषा में उसे लिखा गया है वह उस भाषा की प्रधान रचना के रूप में सुशोभित है। ए के रामानुजन का प्रसिद्ध लेख है जिसका शीर्षक है- “तीन सौ रामायण…” राम नाम का इतना प्रताप रहा कि जिसने राम पर सबसे विवादित आलोचनात्मक किताब लिखी उसका नाम ईवी रामास्वामी और किताब का नाम ‘सच्ची रामायण’ है।
राम के चरित्र पर लिखी गयी जो सबसे प्राचीन रचना आज हमारे बीच मौजूद है वह वाल्मीकि रचित रामायण है।
इसका यह अर्थ कतई न लगाएँ कि राम कथा सबसे पहले वाल्मीकि ने लिखी थी। वाल्मीकि रामायण से पता चलता है कि उनकी रामायण से पहले भी राम कथा थी। महाभारत में जिक्र है कि अन्य राम कथाएँ भी मौजूद थीं। फर्क यह है कि सभी राम कथाओं में वाल्मीकि की रामायण काल का ग्रास बनने से बच गयी।
कामिल बुल्के के अनुसार वाल्मीकि रामायण के भी तीन संस्करण मिलते हैं जिनमें परस्पर कुछ भिन्नता है। खैर यह अलग विषय है। राम नाम पर आते हैं।
तीन राम तो परवर्ती काल तक लोकप्रिय रहे- राम, परशुराम और बलराम। इसी से जाहिर है कि राम नाम बहुतों के थे लेकिन राम नाम लेने से जो एक बिम्ब उभरता है वो एक ही राम थे। वही जो वाल्मीकि समेत तमाम रचनाकारों के नायक राम हैं। जिस राम की वाल्मीकि ने कथा कही है उनका मूल नाम महाभारत और रामायण में राम दाशरथि और रामचंद्र मिलता है।
बुल्के के अनुसार राम के साथ जुड़ने वाला चंद्र नाम का अंश नहीं बल्कि उपमा प्रतीत होती है। वाल्मीकि ने कई जगहों पर राम के सौंदर्य एवं गुणों की तारीफ करने के लिए उनकी तुलना चंद्रमा से की है। राम चंद्र यानी वह राम जो चंद्रमा की तरह सुन्दर, शीतल और सुखदायी है। राम दाशरथि और राम चंद्र ही बाद में संक्षिप्त होकर जनमानस में राम हो गया।
अतः राम के पहले भी राम थे, राम के बाद भी करोड़ों ने नाम राम रखे लेकिन अन्य कोई राम जनमानस को इतने सुन्दर नहीं लगे कि उन्हें राम चंद्र कहें।
उत्तर भारत में मध्यकाल में दो राम चर्चित हुए। एक तुलसी के सगुण राम। दूसरे कबीर के निर्गुण राम। कबीर तो यहाँ तक कह गये – मैं तो कूता राम का मोतिया मेरा नाम! दक्षिणभारत में भी राम की लोकप्रियता नामों में देखी जा सकती है।
ऊपर भी जिन दो लेखकों का नाम लिया दोनों के नाम में राम है- रामास्वामी और रामानुजन। बाबासाहब भीमराव रामजी आम्बेडकर के अनुसार शिवाजी ने महाराष्ट्र में अभिवादन के लिए राम राम कहने की परम्परा शुरू की। इस राम चर्चा को आधुनिक समय तक लाना हो तो गांधी के राम और लोहिया के राम की चर्चा की जा सकती है।
राम नाम की पहुँच को लिखते जाएँ तो एक नई किताब तैयार हो जाएगी। फिर आपको लगेगा मैथिलीशरण गुप्त जी सही ही कहे गये हैं। ऐसा नहीं है कि केवल हिन्दू राम का महत्व मानते हैं। एशिया के एक बड़े हिस्से में राम की अलग-अलग तरीके से व्याप्ति है। बौद्धों ने दशरथ जातक लिखी। जैनियों ने पउमचरित लिखी। सिख धर्म में राम परमात्मा या आत्मा है।
सिखों के राम निर्गुण राम हैं। गुरुबानी को ‘राजा राम की कहानी’ भी कहते हैं। टीपू सुल्तान राम नाम की अंगूठी पहनते थे। उर्दू शायर इकबाल ने राम के महत्व को समझते हुए उन्हें ‘इमाम ए हिन्द’ कहा था।

