कभी यात्रा शब्द से
याद आते थे तीर्थस्थल
आस्था से लबालब उत्साही बूढ़े
या कोई दुर्गम चढ़ाई चढ़ते
दुस्साहसी युवा
यात्रा शब्द से बरबस
याद आते थे राहुल सांकृत्यायन
अब तो रथ के बिना
अपूर्ण लगता है यात्रा शब्द
आस्था, अस्मिता, न्याय, गौरव जैसे
भव्य लक्ष्य बाणों के साथ
महान योद्धा करते हैं रथ यात्राएँ
उनके रथ काठ के नहीं होते
और उनके रथों को घोड़े नहीं खींचते
उनके रमणीय रथों में
उपलब्ध होती हैं सारी सुविधाएँ
रथ की छत फाड़कर
प्रकट होता है सिंहासन
सिंहासनारूढ़ योद्धा
प्रजा को प्रणाम करते हैं
ओजस्वी वाणी में वे
प्रजा को युद्धमंत्र सुनाते हैं
और खोलते हैं ज्ञान नेत्र
ज्ञान नेत्र खुलने के बाद
प्रजा प्राप्त करती है दिव्य ज्ञान
कि असल में वही हैं उनके शत्रु
जो सदियों से उनके मित्र हैं
और आस्तीनों में
रहते आए हैं साँप की तरह
रथों के पहियों की धड़धड़ से
पुल काँपते हैं
सूख जाता है नदियों का पानी
सिसकते हैं पौधे
माताओं के गर्भ गिर जाते हैं
हवा में धूल भर जाती है
धूल में घुल जाते हैं रक्तकण
पक्षी नीड़ छोड़ भागते हैं
उनके क्रंदन से पट जाता है आकाश
नदी, पौधे, रक्त, पक्षी, क्रंदन
किसी से विचलित नहीं होते
युद्ध पिपासु योद्धा
इसलिए निर्बाध जारी रहती हैं
उनकी रथयात्राएँ।
- हरभगवान चावला,सिरसा,हरियाणा
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

