अग्नि आलोक

*अधिकारों से योजनाओं तक, और योजनाओं से कृपा तक*

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 (मनरेगा, किसान और श्रम कानूनों के जरिये बदलता भारत)

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          मनरेगा को पहले नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (NREGA) कहा जाता था, जिसे बाद में महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA) में बदल दिया गया था। भाजपा सरकार पहले “ पूज्य  बाबा” और फिर बदलकर  ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)’ विधेयक, 2025′ कर दिया।
          गौरतलब है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को निरस्त कर ग्रामीण रोजगार के लिए नया कानून लाने संबंधी एक विधेयक की प्रतियां लोकसभा के सदस्यों को बांटी गई हैं. विधेयक की प्रति के अनुसार इसका मकसद ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)’ विधेयक, 2025′ संसद में लाने और 2005 के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को निरस्त करने का प्रस्ताव है.

बिल में क्या-क्या :

          इसमें कहा गया है कि विधेयक का उद्देश्य ‘विकसित भारत 2047′ के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप ‘‘ग्रामीण विकास ढांचा स्थापित करना है, जिसके तहत अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए स्वेच्छा से आगे आने वाले प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को हर वित्त वर्ष में 125 दिनों के मजदूरी आधारित रोजगार की संवैधानिक गारंटी दी जाएगी. इसका लक्ष्य सशक्तीकरण एवं विकास को बढ़ावा देकर समृद्ध और सक्षम ग्रामीण भारत का निर्माण करना है.https://ndtv.in/india/mgnrega-new-name-g-ram-g-by-modi-government-9811078बिल में कई नए प्रस्ताव

          प्रस्तावित विधेयक के तहत अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वर्ष में 125 दिनों के मजदूरी रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाएगी. मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक या कार्य पूरा होने के 15 दिनों के भीतर किया जाएगा. यदि आवेदन के 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया गया तो बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान भी किया गया है. विधेयक के अनुसार कार्यों की योजना विकसित ग्राम पंचायत योजना से शुरू होकर ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर समेकित की जाएगी और इन्हें विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक से जोड़ा जाएगा. कार्यों को चार प्रमुख क्षेत्रों, जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़ी अवसंरचना और आपदा-रोधी ढांचे में विभाजित किया गया है.

          खेती बाड़ी के समय में (अधिकतम 60 दिन प्रतिवर्ष) इस योजना के तहत कार्य नहीं कराए जाएंगे, हालांकि प्राकृतिक आपदा या असाधारण परिस्थितियों में इसमें छूट दी जा सकेगी. पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जियो-टैगिंग, डिजिटल एमआईएस डैशबोर्ड, साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासे और सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य किया गया है। शिकायत निवारण के लिए बहु-स्तरीय व्यवस्था और जिला स्तर पर लोकपाल की नियुक्ति का भी प्रावधान है. यह एक केंद्र प्रायोजित योजना होगी. उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10, अन्य राज्यों के लिए 60:40 और बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता का प्रावधान किया गया है. योजना पर अनुमानित वार्षिक व्यय ₹1.51 लाख करोड़ बताया गया है, जिसमें केंद्र का हिस्सा लगभग ₹95,692 करोड़ होगा.

          संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान केंद्र सरकार लोकसभा में एक नया अहम विधेयक पेश करने जा रही है, जो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की जगह लेगा। इस नए विधेयक का नाम विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” (VB-G RAM G) है। इस बदले हुए नाम से ये भान होता है कि ये एक मिशन और यहां रोजगार की कोई गारंटी नहीं है, जबकि मनरेगा में रोजगार की गारंटी थी।

          सरकार का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका से जुड़ी व्यवस्था को नए ढांचे में लागू करना है। इस विधेयक को लेकर बीजेपी ने अपने सांसदों को 15 से 19 दिसंबर के बीच संसद की कार्यवाही में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया है। विधेयक में मनरेगा की जगह नए प्रावधानों और बदलावों का प्रस्ताव है, जिनका उद्देश्य रोजगार गारंटी की प्रणाली को पुनर्गठित करना है।

बिल की प्रति मुहैया कराई गई:

          यह विधेयक लोकसभा सदस्यों को मुहैया कराया जा चुका है और इसके सदन में पेश किए जाने की संभावना है. संसद का शीतकालीन सत्र एक दिसंबर से शुरू हुआ था, जो 19 दिसंबर को समाप्त होगा।  टीवी शो द न्यूज़ लॉन्चर में आशीष चित्रांसिया और हेमंत अत्री के बीच हुई लंबी बातचीत हाल के वर्षों की भारतीय राजनीति पर एक तीखा और विवादास्पद दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। चर्चा का केंद्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक 136 सेकंड का पुराना वीडियो, पिछले ग्यारह वर्षों में सरकार द्वारा योजनाओं के नाम बदले जाने की प्रवृत्ति, और इसे लेकर उठाए गए वैचारिक व नैतिक सवाल हैं। यह लेख उसी बातचीत को परिष्कृत, क्रमबद्ध और विश्लेषणात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।

 136 सेकंड का वीडियो: प्रतीक और संदेश:

          कार्यक्रम में दिखाए गए 136 सेकंड के वीडियो को वक्ताओं ने प्रतीकात्मक रूप से ‘राजनीतिक सोच का दस्तावेज़’ बताया। वीडियो में मनरेगा, गड्ढों की खुदाई, मंत्रों के जाप और पिछली सरकारों पर आरोपों का उल्लेख है। आलोचकों के अनुसार यह वीडियो उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें नीतिगत निरंतरता से अधिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और प्रतीकात्मक आलोचना को महत्व दिया गया। यह तर्क दिया गया कि जिन योजनाओं को कभी असफल बताया गया, वही योजनाएँ बाद में संशोधित रूप में जारी रखी गईं—कभी अवधि बढ़ाकर, कभी नाम बदलकर। इससे यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या आलोचना वास्तविक थी या केवल राजनीतिक वक्तव्य।

          भारत के लोकतंत्र की असली पहचान चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों को मिले अधिकारों से बनती है। आज़ादी के बाद जब संविधान लागू हुआ, तो उसका मूल उद्देश्य यह था कि यह देश किसी शासक, किसी धर्म या किसी वर्ग का नहीं, बल्कि यहां रहने वाले हर नागरिक का हो। संविधान ने राज्य को ताकतवर बनाया, लेकिन उससे भी ज़्यादा ताकत नागरिक को दी—ताकि वह सवाल कर सके, अपने हक की माँग कर सके और सम्मान के साथ जीवन जी सके।

          इसी सोच के तहत आजादी के बाद की सरकारों ने धीरे-धीरे ऐसे कानून बनाए, जो आम आदमी के जीवन को सुरक्षित कर सकें। रोजगार, शिक्षा, भूमि, श्रम और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्र केवल नीतियों के भरोसे नहीं छोड़े गए, बल्कि उन्हें अधिकारों के रूप में स्थापित किया गया। मनरेगा, भूमि अधिग्रहण कानून, श्रम कानून और सार्वजनिक वितरण प्रणाली इसी प्रक्रिया की कड़ियाँ थीं। इनका मक़सद यह था कि गरीब और कमजोर वर्ग सरकार के सामने हाथ फैलाने को मजबूर न हों, बल्कि अपने अधिकार के बल पर खड़े हो सकें।

          लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शासन की दिशा में एक बुनियादी बदलाव दिखाई देता है। अब अधिकारों की भाषा कम और योजनाओं की भाषा ज्यादा सुनाई देती है। योजनाएं भी इस तरह पेश की जाती हैं मानो सरकार कोई उपकार कर रही हो। जो चीज़ें पहले क़ानून की गारंटी थीं, वे अब बजट, आदेश और राजनीतिक इच्छा पर निर्भर होती जा रही हैं। यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैचारिक है—जहाँ नागरिक को अधिकारधारी नहीं, बल्कि लाभार्थी माना जाने लगा है।

          इसी पृष्ठभूमि में यह लेख सरकार की कथनी और करनी के बीच के अंतर को समझने की कोशिश करता है। यह दिखाने का प्रयास करता है कि कैसे विकास और राष्ट्रवाद की भाषा के पीछे, धीरे-धीरे आम आदमी के वे अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं, जिनके लिए लंबे संघर्ष हुए थे। मनरेगा से लेकर शिक्षा, किसान से लेकर मजदूर और महिला से लेकर छात्र तक—हर क्षेत्र में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या हम अधिकारों के युग से वापस कृपा के युग में लौट रहे हैं?

 

प्रस्तावना : विकास के शोर में दबते अधिकार:

          भारत की अर्थव्यवस्था का असली आधार न शेयर बाजार है, न बड़े उद्योग—बल्कि गाँव का मजदूर, खेत का किसान और शहर की निर्माण साइट पर काम करता श्रमिक है। आज़ादी के बाद यह समझ बनी कि अगर इन वर्गों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो लोकतंत्र केवल काग़ज़ी रह जाएगा। इसी समझ से मनरेगा जैसे कानून बने, किसानों के लिए भूमि सुरक्षा आई और मजदूरों के अधिकार तय किए गए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन तीनों स्तंभों पर एक साथ दबाव बढ़ा है। रोजगार की गारंटी कमजोर हुई है, किसान की जमीन फिर असुरक्षित हुई है और मजदूर की नौकरी अस्थिर। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि नीतिगत फैसलों के ज़रिये धीरे-धीरे किया गया है।

मनरेगा : रोज़गार की गारंटी से अनिश्चित योजना तक:

          मनरेगा को समझे बिना ग्रामीण भारत को नहीं समझा जा सकता। यह कानून इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि पहली बार सरकार ने यह स्वीकार किया कि रोज़गार देना उसकी जिम्मेदारी है। ग्रामीण नागरिक को यह अधिकार मिला कि वह काम माँग सकता है और सरकार को जवाब देना होगा। शुरुआती वर्षों में मनरेगा ने —

·         गाँवों में पलायन रोका

·         मजदूरों की न्यूनतम दर तय की

·         और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी पहुँचाई

          लेकिन 2014 के बाद इसकी दिशा बदलती गई। बजट में वास्तविक वृद्धि नहीं हुई, भुगतान में महीनों की देरी होने लगी और कई जगह काम माँगने पर काम ही नहीं मिला। सबसे अहम बात यह रही कि सरकार ने इसे अधिकार की तरह स्वीकार करने के बजाय “कल्याणकारी   योजना” की भाषा में पेश करना शुरू कर दिया। जब कोई अधिकार योजना बन जाता है, तो उसे रोकना, बदलना या सीमित करना आसान हो जाता है। मनरेगा के साथ यही हुआ। अब यह ग्रामीण गरीब की सुरक्षा नहीं, बल्कि सरकार की इच्छा पर चलने वाला कार्यक्रम बनता जा रहा है।

किसान : जमीन, कानून और बाजार के बीच पिसता हुआ वर्ग:

          किसान की स्थिति हमेशा से विरोधाभासी रही है। वह देश को भोजन देता है, लेकिन खुद सबसे असुरक्षित रहता है। 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून किसानों के संघर्षों का परिणाम था। इस कानून ने पहली बार यह तय किया कि किसान की सहमति के बिना उसकी जमीन नहीं ली जा सकती। लेकिन सत्ता बदलते ही इस कानून को “विकास विरोधी” बताया जाने लगा। अध्यादेशों और नियमों के ज़रिये इसे कमजोर करने की कोशिश की गई। तर्क दिया गया कि उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जमीन चाहिए। सवाल यह है कि विकास का बोझ हमेशा किसान ही क्यों उठाए? इसके साथ ही, कृषि को धीरे-धीरे बाजार के हवाले करने की नीति अपनाई गई। न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी नहीं दी गई, लागत बढ़ती गई और आमदनी स्थिर रही। किसान आंदोलनों ने यह साफ़ कर दिया कि यह वर्ग अब केवल सब्र करने को तैयार नहीं है।

श्रम कानून : सुरक्षा से ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ तक

मज़दूर कानूनों का मूल उद्देश्य था कि काम करने वाला व्यक्ति पूरी तरह मालिक की दया पर न रहे। नौकरी की स्थिरता, यूनियन बनाने का अधिकार और न्यूनतम वेतन इसी सोच से आए थे।

नए श्रम संहिताओं में इस संतुलन को बदल दिया गया।

·         ठेका प्रथा को सामान्य बनाया गया;

·         बड़ी कंपनियों को छंटनी की छूट मिली;

·         और मजदूरों के सामूहिक विरोध को कमजोर किया गया।

          सरकार इसे व्यापार के लिए अनुकूल माहौल बताती है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि मजदूर की जिंदगी और भी अनिश्चित हो गई है। महामारी के दौरान पैदल घर लौटते मजदूर इसी नीति की सबसे कड़वी तस्वीर थे।

तीनों का साझा संकट : अधिकारों का क्षरण:

          मनरेगा, किसान और मज़दूर—तीनों के संकट को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। इनका साझा सूत्र है अधिकारों का धीरे-धीरे कमजोर किया जाना। जहाँ पहले राज्य जिम्मेदारी लेता था, अब वह सुविधा देता है। जहाँ पहले कानून बोलता था, अब आदेश और योजना बोलती है। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे नागरिक सवाल करने की स्थिति खो देता है।

उपसंहार : लोकतंत्र का भविष्य अधिकारों से तय होगा, दान से नहीं

          इस पूरे विमर्श का सार यही है कि आज देश में संकट योजनाओं की कमी का नहीं, बल्कि अधिकारों के क्षरण का है। सरकारें अगर गरीबों को अनाज दे रही हैं, कुछ पैसे दे रही हैं या कुछ सुविधाएँ दे रही हैं, तो यह अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब इन सुविधाओं को अधिकार की जगह उपकार के रूप में पेश किया जाता है और बदले में नागरिक से चुप्पी की उम्मीद की जाती है।

          लोकतंत्र में सरकार का काम नागरिकों पर एहसान करना नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा करना होता है। जब रोजगार की गारंटी एक “मिशन” बन जाती है, जब किसान की जमीन उसकी सहमति के बिना ली जा सकती है, जब मजदूर को नौकरी की सुरक्षा नहीं मिलती, जब छात्र सवाल पूछने से डरने लगते हैं और जब गरीब का घर बिना प्रक्रिया के गिरा दिया जाता है—तो यह केवल नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षय है।

          अधिकार और दान के बीच का फर्क समझना आज सबसे जरूरी हो गया है। दान आदमी को निर्भर बनाता है, जबकि अधिकार उसे आत्मसम्मान देता है। दान सत्ता को मजबूत करता है, अधिकार नागरिक को। यही वजह है कि अधिकार आधारित सोच हमेशा सत्ता के लिए असहज रही है—चाहे वह गांधी का विचार हो या संविधान की आत्मा।

          अगर समाज यह फर्क नहीं समझ पाया, तो धीरे-धीरे नागरिक केवल चुनाव के समय याद किए जाने वाले आंकड़े बनकर रह जाएंगे। लोकतंत्र तब केवल मतदान तक सीमित हो जाएगा, और रोजमर्रा का जीवन आदेश, कृपा और भय के अधीन हो जाएगा। इसलिए यह ज़रूरी है कि आम आदमी खुद को लाभार्थी नहीं, बल्कि अधिकार और नागरिक के रूप में देखे। आखिरकार, भारत का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि सरकार ने कितना दिया, बल्कि इस बात से तय होगा कि उसने नागरिकों से क्या-क्या छीना—और नागरिकों ने उसे वापस माँगने का साहस किया या नहीं।

निष्कर्ष : बिना श्रम सुरक्षा के विकास एक भ्रम

          अगर मनरेगा कमजोर होगा, तो गांव खाली होंगे। अगर किसान असुरक्षित होगा, तो खेती टिकाऊ नहीं रहेगी। अगर मजदूर डरा हुआ होगा, तो अर्थव्यवस्था खोखली होगी। विकास का असली अर्थ ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि सुरक्षित जीवन है। मनरेगा, किसान अधिकार और श्रम सुरक्षा—ये तीनों लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं, कोई दया या उपकार नहीं। आज सवाल यह नहीं है कि सरकार कितनी योजनाएं चला रही है, सवाल यह है कि क्या नागरिक अब भी अपने अधिकारों पर खड़े होने की स्थिति में हैं। अगर नहीं, तो यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संकट है।

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