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पराविज्ञान कथा : दृश्य से अदृश्य की ओर..*

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(मेरे साधनाकालीन जीवन से जुडा सच)
~ डॉ. विकास मानव

  _सन 1990 ई०.  पिछले कुछ वर्षों के अन्तराल में प्रच्छन योगी-योगिनियों और तंत्रसाधकों की संगति से जो आध्यात्मिक ज्ञान-लाभ हुआ था और जो अनुभव हुए थे, उन्होंने मेरे मन को अशान्त और आत्मा को कर दिया था उद्वेलित कर दिया था. मैं और अधिक, बहुत अधिक जानना-समझना चाहता था और अनुभव भी करना चाहता था।_
    कब तक रखता मन को अशान्त और कब तक रखता आत्मा को उद्वेलित। सच पूछिए तो उचट गयी थी मेरी आत्मा इस संसार से और एक दिन बिना किसी को कुछ बतलाए निकल पड़ा मैं एक कम्बल और एक झोला लेकर जिसमें था एक लोटा, एक गमछा और एक सूती चादर।
    हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग और फिर भैरवघाटी। हिमालय की गोद में एक शिशु की तरह सोई हुई भैरवघाटी।
    रहस्यमय वातावरण हिमाच्छादित प्रदेश, जान्हवी और भागीरथी का संगम। थोड़ी ही दूर पर भैरवजी का अत्यंत प्राचीन मन्दिर। बगल में एक टूटी-फूटी धर्मशाला।
  एक सज्जन वहां मिल गए विश्राम करते हुए। अर्धवृद्ध थे और बद्रीनाथ का दर्शन करकर लौटे थे। अकेले का साथ और कोई नहीं। दो सप्ताह से पड़े थे जमीन पर कम्बल बिछाकर। नाम था हरिपद सरस्वती।
  पढ़ने के लिए पिता ने डांटा और डांट सुनकर निकल आये भागकर घर से हिमालय की ओर। बीच में सन्यास भी ले लिया महाशय ने और और अपने नाम के साथ जोड़ लिया ',सरस्वती' शब्द।
  सांझ घिरने लगी थी मैं धर्मशाला से बाहर निकल आया था। भैरवघाटी का रहस्यमय अंचल प्राकृतिक दृष्ट से अत्यंत रमणीक मोहक और सुन्दर लगा मुझे। दो महापवित्र नदियों का आपस में मौन मिलन निश्चय ही दिव्य और स्वर्गीय था। सरस्वती महाशय ने बतलाया--दो ढाई मील आगे जाने पर एक जंगल है यानी 'ला दर्रा'।
     वहां से एक पगडण्डी नुमा एक रास्ता तिब्बती पठार की ओर चल गया है। ला दर्रा से थोड़ा आगे बढ़ने पर कई गिरि- गुफाएं हैं जिनमें न जाने कब से योग-तन्त्र साधक रह रहे हैं। किसी को पता नहीं। वे बाहर भी बहुत कम निकलते हैं। अपना जीवन-यापन कैसे करते हैं, वे ही जाने।
      यह सब सुनकर कुछ नहीं बोला मैं। चुपचाप जाकर भागीरथी के किनारे एक पत्थर पर बैठ गया मैं कम्बल बिछा कर। सोचने लगा--आ तो गया मैं आत्मा से प्रेरित होकर, अब कहाँ जाऊँ और क्या करूँ ? तभी याद आयी #कपिला #आनन्द की। कपिला आनन्द कौन थी?
   मन नहीं माना। ध्यान लगाकर कपिला आनन्द का करने लगा स्मरण। फिर न जाने क्यों अपने आप आंख लग गयी। देखा--सामने एक धुन्ध-सी आकृति खड़ी थी।
 फिर आंखें बंद कर लीं और आंखें बन्द करते ही मानस-पटल उभर आया उस योगिनी का प्रांजल धवल रूप।

  पहले से अधिक दीप्त, तेजोमय और लावण्यमय हो गया था उस साधिका का मुखमण्डल। मुस्कराकर बोली--आखिर आ ही गए तुम। मैंने ही प्रेरित किया था तुम्हें यहां आने के लिए। यहां आस-पास कई गुप्त और प्राचीन गुफाएं हैं।
   किसी को उनके अस्तित्व का पता नहीं है। वे सभी गुफाएं रहस्यमयी हैं। उनमें प्राचीनकाल से बड़े-बड़े योगी और तान्त्रिक अपनी-अपनी साधनाओं में लीन हैं। किसी को कुछ पता नहीं है उनके बारे में। उनसे तुम्हें मिलना चाहिए और वे तुम से मिलेंगे भी।
    मैं तुम्हारे पीछे इसलिए पड़ी हूँ कि तुम्हारे माध्यम से संसार, समाज थोड़ा-बहुत सत्य से परिचित हो सके। ( गुप्त और दिव्य आत्माएं योग्य पात्र मनुष्य की आत्माओं से संपर्क कर हमेशा उन्हें सहयोग करती हैं और उन्हें प्रेरित कर उनके माध्यम से रहस्यों का उदघाटन करती हैं।) अच्छा यह तो बतलाओ मुझे क्यों बुलाया तुमने ? तुम तो जानते ही हो कि कितने लोक-लोकान्तरों को पार करते हुए यहां आना पड़ता है मुझे।
    बड़ा कष्ट होता है। जिस लोक का अतिक्रमण करना होता है, उस लोक के शरीर को धारण करना पड़ता है, बड़ी परेशानी होती है। एक शरीर को छोड़ो दूसरे को पकड़ो और फिर उसे छोड़ो तीसरे को पकड़ो। आने-जाने में इसी क्रम का निर्वाह करना पड़ता है।
  क्या आप स्थूल शरीर में सामने नहीं आ सकतीं ?
  बतला तो चुकीं हूँ अभी। पंचभूत तत्वों का मिश्रण करना पड़ेगा, तभी थोड़ी देर के लिए स्थूल शरीर का आकार बन सकेगा। चाहूं तो कर सकती हूँ, लेकिन यदि तत्वों को अलग-अलग न कर सकी तो हमेशा-हमेशा के लिए फंस जाना पड़ेगा इस संसार के मायाजाल में।

अच्छा यह बतलाओ क्यों आवाहन किया था मुझे, तुमने फिर पूछती हूँ तुमसे ?
मन और आत्मा की शान्ति के लिए। इस संसार में तो अपना कोई नहीं है। किसे समझूँ मैं अपना आपको छोड़कर ?

  मेरी बात सुनकर थोड़ी गम्भीर हो गयी कपिला आनन्द और फिर बोली--मैं तुम्हारी मनोव्यथा समझ रही हूँ। मोहाविष्ट होना तो मानव का स्वभाव है। इस स्वभाव पर तो तुमको विजय प्राप्त करनी ही होगी, तभी आगे बढ़ सकोगे, उन्नति कर सकोगे और हो सकोगे परमसत्य को उपलब्ध भी।
  आपने ठीक कहा, लेकिन कैसे समझाऊं अपने मन को, अपने आप तक ही सीमित नहीं मन। पहले जब साधना के लिए हिमालय की यात्रा पर गया तो उस समय किसी प्रकार का मोह-माया और आसक्ति नहीं थी। सब कुछ भुला दिया था। अपने-पराए का भेद भी मिट गया था।
    ऐसा नहीं कि तब माता-पिता नहीं थे। भाई-बन्धु नही थे, लेकिन अब क्यों  माँ की याद आने लगी है। सब की याद आने लगी है। वापस लौटने की इच्छा भी होने लगी है। लेकिन क्यों ? आप ही बतलाइये न। आप तो सब कुछ जानती-समझती हैं।

माँ कोने में चुपचाप बैठी मेरे बारे में जाने क्या सोच रही होगी। कभी-कदा मेरी याद में रोने-सिसकने भी लगती होगी और फिर आँचल से पोंछने लगती होगी सजल आंखें। क्या आप नहीं जानती हैं ?
लगातार कई दिन बीत गए हैं। न अन्न और न जल। लगातार भूख और प्यास से हो गया है शरीर जर्जर। शिथिल हो गया है मन और क्लांत हो गयी आत्मा। उठने-बैठने की भी शक्ति नहीं रह गयी है अब।
पहले तो रोज इधर चार-पांच लोग आ जाया करते थे, लेकिन बर्फ गिरने के कारण उनका आना भी बन्द हो गया है अब। क्या करूँ ? आप ही कुछ बतलाइये।
ओह ! यह बात है–इतना कहकर मानस-पटल से हट गई उस दिव्यात्मा की छवि।

उस समय मैं चुपचाप बैठा था धर्मशाला की टूटी-फूटी सीढ़ियों पर। सवेरा हो चुका था। बर्फ गिरनी बन्द हो चुकी थी। मैं सिर घुमाकर इधर-उधर देख रहा था और तभी मेरी दृष्टि पड़ी सामने से आती हुई एक प्रौढ़वय महिला पर। किसी भले घर की लग रही थी वह। उसके पास एक बड़ा-सा झोला था और दो कम्बल। उसे देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ।
इस बियावान हिमक्षेत्र में यह महिला कैसे ? वह समीप आ गयी थी अब। मेरी ओर देखती हुई मधुर स्वर में बोली– भूखे-प्यासे हो न ? बहुत सारा भोजन लायी हूँ तुम्हारे लिए और कम्बल भी लायी हूँ। रात में खूब आराम से सोना ठंड नहीं लगेगी। तो अब भोजन कर लो। यहाँ जब तक रहोगे, मेरा भोजन बासी या कम न होगा।

  भोजन वास्तव में बहुत स्वादिष्ट था। क्या नहीं था भोजन में, सब कुछ था। भोजन के बाद झपकी लग गयी। एक कम्बल बिछाया और दूसरा ओढ़कर सो गया गहरी नींद में। और जब उठा तो सांझ ढल चुकी थी।
  चारों ओर देखा--वह रहस्यमयी अन्नपूर्णा कहीं नहीं दिखी। आश्चर्य हुआ। कहाँ गयी वह ? उसका परिचय भी तो नहीं पूछा मैनें। मति मेरी गयी थी मेरी भूख से। हे भगवान ! कहाँ मिलेगी अब वह मुझे ?

    एकाएक कुछ कौंध-सा गया मस्तिष्क में। क्या वह कपिला आनंद थी ? हां ! मन में हौले से कहा--वह कपिला आनन्द ही थी। तुम्हारी पीड़ा, व्यथा और कष्ट से भरी वाणी सुनकर रहा न गया उस योगात्मा से और उसने रूप बदलकर स्थूल शरीर धारण कर तुम्हारी समस्या हल कर दी।
     सिर थाम कर सोचने लगा। क्या सचमुच उस योगात्मा की विशेष कृपा है मुझ पर ? हे भगवान ! कैसी अनदेखी लीला है यह ? सब कुछ रहस्यमय लगता है।

  एक दिन काफी दूर निकल गया मैं। काफी ऊंची चढ़ाई चढ़कर नीचे उतरने लगा। सामने एक काफी लम्बी-चौड़ी घाटी थी। चारों ओर प्रकृति की हरीतिमा, नीला स्याह आकाश, छोटे-बड़े सफेद बादलों के टुकड़े धूनी हुई रुई की तरह और उनसे आँख-मिचौली खेलता हुआ रुपहला चाँद, शांत मनोरम वातावरण, निस्तब्ध और 'सायं-सायं' करता हुआ और तभी पहाड़ों से टकराता हुआ उस निस्तब्ध वातावरण में एक मधुर और कोमल स्वर गूंजा।
     स्वर बड़ा ही स्निग्ध और रहस्यमय था। निश्चय ही किसी युवती के कोमल कण्ठ से निकला हुआ स्वर था वह। ध्यान से सुनने लगा। धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया स्वर। समझते देर न लगी। करुण स्वर में कोई नारी संस्कृत के श्लोकों के माध्यम से महामाया का यशोगान कर रही थी।

  कौन थी वह ?
  निश्चय ही वह कोई तन्त्र साधिका थी --इसमें सन्देह नहीं। उसके विगलित स्वर में करुण रस भरा था जिसके वशीभूत होकर उठकर खड़ा हो गया और रहा न गया मुझसे। उस धुंधले अंधेरे में ही स्वर की दिशा में चल पड़ा मैं।
    चलता रहा, चलता रहा। जैसे-जैसे आगे मैं बढ़ता जाता, वैसे-ही-वैसे करुण रस में डूबा हुआ मार्मिक  स्वर भी आगे बढ़ता जाता। हैरान था मैं और आश्चर्यचकित भी। क्या किसी मायाविनी की माया थी ? क्या कोई छल था या कोई अमानवीय धोखा ? लेकिन क्यों और किसलिए ?
     अब तक घाटी की सीमा पर पहुंच गया था और सामने पर्वत शिखर थे। काफी थक चुका था। सोचा--अब क्या करूँ ? रात हो चली थी। चाँद बादलों में छिप गया था। लौटना कठिन लगा मुझे। दूर-दूर तक न कोई झोपड़ी और न कोई आदमी ही उस बियावान में, बस मैं अकेला था।
   बुरी तरह फंस गया मैं। कोई आश्रय नहीं, कहीं रात बिताने की जगह भी नहीं। स्वर अभी बन्द नहीं हुआ था, बराबर सुनाई दे रहा था। सच पूछिए तो मेरी अन्तरात्मा में पूरी तरह प्रविष्ट हो गया था वह। न जाने किस प्रेरणा के वशीभूत होकर मोहाविष्ट-सा फिर आगे बढ़ने लगा मैं।

  अब तक चाँद बादलों के पीछे से निकल आया था। एकाएक मेरे पैर थम गये। देखा--सामने एक गुफा थी। चांदनी में साफ दिखलायी दे रही थी। सोचा--निश्चय ही किसी साधक की होगी यह गुफा और तभी मेरी दृष्टि घूम गयी बायीं ओर।
     देखा--एक सुन्दर नवयुवती खड़ी मुस्करा रही थी वहां मेरी ओर देखकर। लम्बा कद, छरछरी देह, गौर वर्ण, लम्बे घने बाल, बड़ी-बड़ी भौराली आंखें, लाल रंग की रेशमी साडी, गले में रत्नजड़ित कण्ठहार, कलाइयों में लाल चूड़ियाँ और शंख के वलय। ऊंचे चौड़े ललाट पर ध्रुव तारे की तरह चमकती हुई लाल सिन्दूर की छोटी-सी बिंदी।
   हे भगवान ! एक नारी में इतना सारा सौंदर्य ! साक्षात देव कन्या-सी लग रही थी वह रहस्यमयी। अभी तक वह नवयुवती मेरी ओर ही देख रही थी अपलक और फिर होठों पर मुस्कराहट बिखेरती हुई चली गयी गुफा के भीतर।
   न जाने किस अज्ञात प्रेरणा के वशीभूत होकर चला गया मैं भी गुफा के भीतर चला गया। भीतर घोर अंधेरा था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि उस घोर अंधकार में भी बिल्कुल साफ और स्पष्ट दिखलायी दे रहा था मुझे सब कुछ। बाहर के प्राकृतिक वातावरण का प्रभाव बिल्कुल नहीं था उस गुफा के भीतर।
   लगा--किसी अनजाने लोक में प्रवेश कर रहा हूँ मैं। आगे-आगे बढ़ती जा रही थी वह युवती और उसके पीछे-पीछे मैं। काफी देर तक चलता रहा। कितनी दूर चला आया था भीतर उसका सही-सही अनुमान नहीं लगा पा रहा था मैं। अब वह युवती नहीं दिखलायी दे रही थी मुझे। केवल उसकी पायल की कोमल और मधुर ध्वनि ही सुनाई दे रही थी और उसी के सहारे बढ़ रहा मैं आगे।
    थोड़ा चलने पर प्रकाश दिखलायी दिया। वह प्रकाश न तो सूर्य का था और न चाँद का ही। वह कोई दिव्य और अलोकिक प्रकाश था--इसमें कोई संदेह नहीं।

  वह रहस्यमयी गुफा--
  वहां का वातावरण कुछ विचित्र-सा लगा मुझे। गुफा वहां काफी चौड़ी हो गयी थी। वहां मुझे एक छोटा-सा सरोवर भी दिखलायी दिया जिसका पानी बिल्कुल स्वच्छ और निर्मल था और उसमें नीलकमल खिले हुए थे। सरोवर के बगल से गुफा में जाने का रास्ता था जो काफी चौड़ा था।
   अब मुझे उस युवती की पायल की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। कहाँ और किधर चली गयी वह रहस्यमयी समझ में नहीं आ रहा था। थोड़ा और आगे बढ़ने पर गुफा का रास्ता नीचे की ओर जाने लगा। ढलान थी वह और वह ढलान जहां समाप्त हुई, वहां काफी लम्बा-चौड़ा एक प्रांगण था जो दिव्य और अलोकिक प्रकाश से भरा हुआ था।
   लगा--मैं संसार की सीमा से बाहर निकल कर किसी दिव्य और अलोकिक ज्योतिर्मय स्थान में आ गया हूँ।

आश्चर्य हो रहा था मुझे उस समय। चारों ओर देख रहा था मैं सिर घुमा-घुमा कर। तभी सनसनाता हुआ एक भयंकर काला सर्प अपना फन फैलाये खड़ा हो गया मेरे सामने। उसका फन काफी चौड़ा और भयंकर था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें अंगारों की तरह लाल थीं। रोमांचित हो उठा मैं एकबारगी। भय और आतंक से सारा शरीर कांपने लगा।
उस समय मेरी मानसिक स्थिति कैसी हो रही थी–उसे बतलाने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। वह अकल्पनीय भयानक सर्प अपनी सुर्ख आंखों से घूर रहा था मेरी ओर जैसे वह यह जानने-समझने का प्रयास कर रहा था कि मैं कौन हूँ ? मैं क्या चाहता हूं ,और यहां कैसे पहुंच गया ?
सर्पराज की आंखों की मूक भाषा समझते देर न लगी मुझे। आंखें बंद कर हाथ जोड़ लिए मैंने। उसी समय किसी अनिर्वचनीय सुगन्ध से भर उठा वातावरण। न जाने कैसे अपने आप बन्द आंखें खुल गयीं मेरी और आंखें खुलते ही अवाक, स्तब्ध और आश्चर्यचकित हो उठा मैं एकबारगी।
क्या आप विश्वास करेंगे ? संभवतया नहीं करेंगे, लेकिन जो सत्य है, वह सत्य ही है। भले ही आप स्वीकार न करें।

मेरे सामने उस भयंकर सर्प के स्थान पर एक तपस्वी खड़े थे मौन, शान्त और निर्विकार। उनका सारा शरीर कंकालवत था। मांस नाममात्र का था शरीर पर और सिर पर जटाजूट थे। काफी लम्बी दाढ़ी थी लेकिन चेहरे पर साधना का असीम तेज था। आंखें बड़ी और प्रखर थीं अंगारों की तरह जलती हुयीं।
मेरी खोजी दृष्टि ने तत्काल पहचान लिया तपस्वी को। निश्चय ही कालंजयी दीर्घ आयु सम्पन्न महान योगी पुरुष थे वह–इसमें सन्देह नहीं।

  मुझे इस बात का आश्चर्य हो रहा था कि नियति की किस लीला का पात्र बनकर उस महात्मा के निकट पहुंच गया था मैं। क्या उद्देश्य था नियति का ? मेरी समझ में नहीं आ रहा था उस समय कुछ भी। काफी देर तक मेरी ओर अपलक निहारने के बाद वह रहस्यमय साधक मेरी ओर मुड़ा और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
   मैं भी न जाने क्यों करने लगा उनका अनुसरण ? थोड़ा आगे जाने पर एक काफी लम्बा-चौड़ा हॉलनुमा कमरा मिला जिसके फर्श और दीवारें कीमती सफेद संगमरमर की थीं। पूरे कमरे में धवल चांदनी जैसा प्रकाश फैल रहा था चारों ओर। अद्भुत शान्ति थी वहां। लगा--जैसे मैं महान और सिद्ध योगी की समाधि-स्थल पर आ गया हूँ।

  अब मेरी आँखें उस सुन्दरी को खोज रही थीं जो मुझे गुफा के बाहर मिली थी और जिसके पीछे-पीछे मैं गुफा के भीतर चला आया था जिसका कहीं कोई अता-पता नहीं था अब। सहसा मेरी दृष्टि एक ओर घूम गयी जहां चांदी का छोटा-सा दरवाजा था। दरवाजा खुला हुआ था। शायद किसी मन्दिर का दरवाजा था वह।
   दो कदम आगे बढ़कर दरवाजे के भीतर झाँककर देखा उत्सुकतावश। स्तब्ध रह गया मैं। पूरा शरीर किसी अज्ञात भय से रोमांचित हो उठा एकबारगी। मेरी खोज की अभिलाषा साकार प्रतीत हो रही थी। पहली बार समझ में आया कि बिना किसी दैवीय सहयोग के मनुष्य चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। मुझे दैवीय सहयोग अगोचर रूप से बराबर हो रहा था उपलब्ध।
    अब आप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि भीतर कौन-सी चीज थी जिसने चमत्कृत और रोमांचित कर दिया था मुझे। हल्का नीला प्रकाश फैला हुआ था मन्दिर के वातावरण में। तीन सीढ़ी ऊपर एक संगमरमर की चौकोर वेदी थी और उस वेदी पर एक विशालकाय विलक्षण आकृति का पक्षी अपना चौड़ा पंख फैलाये बैठा था। उसके पैर लम्बे थे और उंगलियां भी हद से ज्यादा लम्बी थीं। उंगलियों के नख पीले पड़ गए थे।
    उसकी पूछ तो छोटी थी लेकिन छितराई हुई थी। गिद्ध की तरह गर्दन लम्बी और ऊपर की ओर ऊंची उठी हुई थी। उसकी लम्बी चोंच बतक की तरह चौड़ी थी जो थोड़ी खुली थी और जीभ का अगला भाग साफ दिखलायी दे रहा था। सुपाड़ी की तरह गोल आंखें पीले रंग की थीं जो बिल्कुल सजीब लग रहीं थीं।

  अद्भुत विशालकाय पक्षी की चौड़ी पीठ पर एक देवी दोनों पैर लटकाए बैठी हुई थी। देवी का आकार-प्रकार और रूप-रंग भी अपने आप में अद्भुत, अभौतिक और विलक्षण ही था जिसे देखकर भय का संचार होना स्वाभाविक था। देवी के चार हाथ थे। नीचे के दोनों हाथ नाभि के पास थे और उनकी उंगलियां आपस में फंसी हुयीं थीं। ऊपर के दोनों हाथ थोड़े उठे हुए थे।
    बाएं हाथ में नर-मुंड लटक रहा था और दाहिने हाथ में भयंकर आकार का खड्ग। देवी के गले में रत्नजड़ित स्वर्णहार था जो नाभि तक लटक रहा था। मस्तक काफी चौड़ा था जिस पर बड़ा-सा गोल टीका लगा था लाल सिन्दूर का। सिर मुण्डित था और उस मुण्डित सिर पर कुण्डली मारे और फन फैलाये एक सर्प बैठा सामने की ओर देख रहा था।

वह देवी कौन थी--समझ के परे था, लेकिन देवी का रौद्र और भयंकर रूप देखकर यही प्रतीत होता था कि निश्चय ही यह कोई अतिशय तमोगुणी देवी होगी। सामने सीढ़ियों पर धूप और घी का दीपक जल रहा था। एक पात्र में मदिरा और मांस का भोग भी था। दूसरी सीढ़ी पर अगल-बगल नर-मुंड रखे थे जिनपर लाल रंग का टीका लगा हुआ था।
    निश्चय ही वहां पीठसिद्धि के लिए कभी नरबलि दी गयी होगी--इसमें सन्देह नहीं। पीठसिद्धि हुए बिना तन्त्र के अनुसार मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। इस बात से परिचित था मैं। नीचे वाली सीढ़ी पर एक काफी लम्बा और भारी खड्ग लिटा कर रखा हुआ था जिस पर कभी का लगा रक्त सूखकर काला पड़ गया था। बाद में सब कुछ स्पष्ट हो गया।
  उस तपस्वी का नाम था--वज्रेश्वरानंद कापालिक। वज्रेश्वरानंद कापालिक योग सिद्ध तन्त्र साधक थे। कई दुर्लभ योग-तांत्रिक सिद्धियां उन्हें प्राप्त थीं।

उनकी आयु कितनी थी–यह स्वयं नहीं जानते थे महाशय लेकिन पिछले चार सौ वर्षों से इस रहस्यमय गुफा में साधनारत थे वह।
उन्होंने अपने धीमे कमजोर स्वर में बतलाया कि यह गुफा अति प्राचीन है। महाभारत काल में भी इसका अस्तित्व था। आदि शंकराचार्य से विक्षुब्ध होकर अपने समय के अत्यंत दुर्धर्ष कापालिक कपाल कुण्डलेश्वरानंद ने इस गुफा की खोज की थी और इसे अपने और अपने शिष्यों के लिए साधना योग्य बनाया और पंचमुंडी आसन का निर्माण कर शक्ति-पीठ की स्थापना की और पांच नर-बलि देकर उस पीठासन पर अपनी इष्टदेवी कपालेश्वरी देवी की स्थापना की और पांच नर-रक्त से उनका अभिषेक किया।
नर-रक्त से स्नान करते ही देवी की प्रतिमा में तत्काल दैवीय शक्ति का आविर्भाव हो गया और मूर्ति सजीव हो उठी। कापालिक कपाल कुण्डलेश्वरानंद ने मां की ओर देखकर जोर से अट्टहास किया और फिर साष्टांग दण्डवत होकर उनको प्रणाम किया, फिर पांच काले बकरों की बलि दी गयी और उनके मांस का भोग लगाया औऱ महाशक्ति को मदिरा अर्पित की गई।
मन्दिर का वातावरण तमोगुणी साधना की गन्ध से भर उठा एकबरगी उस समय।

  इस रहस्यमय स्थान पर जिससे भौतिक जगत अपरिचित है, भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता की कैसे पूर्ति होती है ?
  मेरे इस प्रश्न के उत्तर में वज्रेश्वर कापालिक ने सिर घुमाकर एक ओर देखा जहाँ दो व्यक्ति चादर ओढ़कर सो रहे थे। आश्चर्य हुआ मुझे। अभी तक मेरी नज़र उन पर क्यों नहीं पड़ी थी ? तभी वज्रेश्वर कापालिक ने उनकी ओर देखते हुए ताली बजायी और ताली बजते ही दोनों सोए हुए व्यक्ति तुरन्त उठ खड़े हो गए जैसे वे ताली की आवाज का ही इंतज़ार कर रहे हों। वे दोनों युवक थे।
     शक्ल-सूरत, आकार-प्रकार, रंग--सभी में बिल्कुल समान थे। शरीर का रंग काला था। सिर मुड़े हुए थे। शरीर में मोटे ताजे थे। पेट बाहर की ओर निकला हुआ था और छाती काफी चौड़ी थी जिस पर घास की तरह बाल बिखरे हुए थे। कुल मिलाकर वे दोनों राक्षस जैसे प्रतीत होते थे। लगता था जैसे इस लोक के प्राणी नहीं हैं दोनों।
  उनकी आंखें अर्धखुली थीं, उनके वीभत्स चेहरे पर किसी प्रकार का भाव नहीं था। 'फिस-फिस' की आवाज से दोनों बोले--आज्ञा...।
  उचित व्यवस्था करो
  वज्रेश्वर कापालिक ने कहा
  यह सुनते ही दोनों एक साथ बाहर निकल गए तीव्र गति से और थोड़ी देर बाद जब लौटे तो उनके हाथों में पूजन के सामान के अतिरिक्त भोजन भी था बिल्कुल ताजा पका पकाया।
  आश्चर्य और कौतूहल के भाव से भर गया मैं। यह सब कैसे सम्भव हुआ ?
  वे दोनों व्यक्ति सभी अपना-अपना सामान रखकर अपने स्थान पर चले गए और पूर्ववत सो गए चादर ओढ़कर।
  हे भगवान ! कौन-सी और कैसी लीला है यह ? मृतात्माओं की लीला--वज्रेश्वरानंद कापालिक की आवाज़ सुनाई दी।
  कपाल कुण्डलेश्वरानंद की शिष्य-परम्परा में थे कापालिक वज्रेश्वरानंद और उसी परम्परा में थे कभी वे दोनों व्यक्ति भी। उन्होंने बतलाया--ये दोनों कब से यहां इस स्थान पर हैं ? यह ठीक-ठीक से नहीं बतलाया जा सकता है।

जब मैं आया तब से इसी मुद्रा में देखा मैंने इन दोनों को। बाद में ज्ञात हुआ कि ये दोनों शिष्य उच्च कोटि के साधक थे। मन, प्राण और आत्मा पर उनका तो अधिकार था लेकिन शरीर पर नहीं। उनके अधिकार की सीमा के बाहर था उनका शरीर, इसलिए यथासमय शरीर का साथ छोड़ दिया यानी दोनों की मृत्यु हो गयी। दोनों माँ के परम भक्त और योग-तन्त्र के उच्चकोटि साधक थे।
इसलिए माँ की सेवा करते रहना चाहते थे। लेकिन शरीर के अभाव में यह सम्भव नहीं था और शरीर था कि वह आत्मा से अलग हो चुका था। दोनों सिद्ध योगी तो थे ही, अपने योगबल से अपने अपने शरीर को काल के प्रभाव से वंचित कर लिया दोनों ने। मृत्यु से पूर्व जीवित अवस्था में जैसा शरीर था, वैसा ही आज अभी तक बना हुआ है।
रही इन दोनों की आत्मा की बात तो वह इच्छानुसार यक्ष लोक या किसी अन्य लोक-लोकांतर में विचरण करती रहती है। इस प्रकार जब कभी इनका आवाहन किया जाता है तो दोनों की आत्माएं अपने-अपने शरीर में प्रविष्ट होकर जीवित हो उठती हैं और पूरी रात पूजा-अर्चना-आराधना करती रहती हैं और स्वयं अपने हाथों से माँ को बलि प्रदान करती हैं। उनका सारा काम उस रात विलक्षण ढंग से होता है। मैं केवल मूक दर्शक बनकर देखता रहता हूँ।

  वैसे सारी बातें तो अपने आप में अविश्वसनीय थीं, लेकिन आत्मपरक दृष्टि से विश्वास करना ही पड़ा मुझे। फिर प्रत्यक्ष भी तो देखा उन दोनों आत्माओं को जीवित होकर काम करते हुए।
    लेकिन यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि सारी वस्तुएं वे आत्माएं लाईं कहाँ से  और कैसे ?

वे मृतात्माएँ उन सारी वस्तुओं को लायीं कहाँ से और कैसे ? इसका समाधान सम्भव न हो सका। कापालिक वज्रेश्वरानंद इस सम्बन्ध में मौन रह गए।
क्या मृत शरीर काम कर सकते हैं ?
यह प्रश्न बड़ा ही अविश्वसनीय और अजीबोगरीब है। परन्तु तांत्रिक इस काम को अन्जाम देते रहे हैं। विज्ञान भी इस विषय में अभी अनुसंधानरत है और अब उसमें आशा की एक किरण जागी है। वह क्लोनिंग के माध्यम से इस विषय की व्याख्या करने की आशा करता है।
तांत्रिक एवं गुह्यविद्याओं का दावा है कि ऐसा संभव है। तांत्रिक मृतक के भी शरीर का प्रयोग करते हैं तथा उसकी जीवात्मा का भी। वे उसकी जीवात्मा को वश में करके उससे अपनी इच्छानुसार कार्य कराना अधिक सरल और सहज महसूस करते हैं।

  शरीर व जीवात्मा के बीच प्राण की डोरी बंधी रहती है। उस प्राण की डोरी का होना शरीर का जीवित होना कहलाता है तथा प्राण का निकल जाना मृत माना जाता है। गुह्यविज्ञान उस स्थिति को मुरदा कहता है जिसमें मानवीय आशा, विश्वास, उमंग, उत्साह--सभी तिरोहित हो जाते हैं। इस मृत शरीर में कोई प्राण का संचार कर दे तो वह पुनः जीवित हो जाता है, हालांकि यह दुष्कर कार्य है, क्योंकि मृत व्यक्ति का शरीर तथा उसका रक्तस्रावी संस्थान निष्क्रिय होकर सुप्त पड़ जाता है।
  इन संस्थानों में फिर से प्राण डालकर चैतन्य करना सम्भव है परन्तु इससे भीषण व मर्मान्तक कष्ट होता है।
  एक अघोरी तांत्रिक ऐसी ही क्रिया को सम्पन्न किया करता है। ऐसा कहा जाता है कि उसके गुरु की उम्र 1000 वर्ष की थी। अपने गुरु से अभिशाप पाने के बाद वह भटकता रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों से मुलाकात के दौरान वह अपनी उम्र 700 साल बतलाता था जिसमें वह बार-बार अपने शरीर को बदलता रहता था।
    वर्तमान शरीर जर्जर होने के बाद वह किसी युवा मृत शरीर का इंतज़ार करता था जिसे या तो दफनाया जाता था या किसी नदी में प्रवाहित कर  दिया जाता था। वह अघोरी अपनी विशिष्ट साधना के द्वारा अपने प्राणों का संचार कर उस मृत शरीर में अपनी जीवात्मा को स्थापित कर लेता था। अफ्रीकी देश हैती की आर्टिबोनाइट घाटी में मृत शरीर को जीवित करके चलाने की घटना प्रचलित थी।
    वहां के तांत्रिक कब्र से मृत व्यक्ति की निकाली गई गुलाम आत्माओं को प्रवेश करा कर उनसे तरह-तरह के काम लेते थे। वे मुरदे इन तांत्रिकों के वश में होते थे और उनकी आज्ञानुसार काम करते थे। वे अक्सर शारीरिक कार्य यंत्रवत करते थे। वहां इन चलते-फिरते मुरदों को #जाम्बी कहा जाता है।

हैती एक छोटा-सा देश है जिसकी खोज कोलम्बस ने सन 1492 में की थी। उन दिनों वहां स्पेनी तथा पुर्तगालियों का वर्चस्व था। दो शताब्दियों तक इन जातियों ने वहां भीषण और लोमहर्षक अत्याचार किये। इसके पश्चात सन 1697 में फ्रांस ने इस पर अधिकार कर लिया और फिर वही यातना गुलामों पर शुरू हो गयी।
इन गुलामों को मैसने कहते थे। ये गुलाम अपनी जान बचाने के लिए जंगल में भाग जाते थे। इन भगोड़े गुलामों में एक मैकेण्डल नामक गुलाम था जिसे प्रेतविद्या की जानकारी थी। वह अपनी इस प्रेतविद्या से मुरदों की प्रेतात्माओं को वशीभूत कर लेता था और इन मुरदों से अपनी सुरक्षा कराता था तथा अत्याचारियों से बदला लेता था।
वह मृत फ्रांसीसी सैनिकों को कब्रिस्तान से चुरा लेता था। इस कारण लगभग 100 वर्ष तक मृत फ्रांसीसी सैनिक घूमते-फिरते नज़र आते थे। जाम्बी यंत्रवत होते थे। इनके शरीर में कोई उमंग उत्साह नहीं होता था परन्तु इंसानों के जैसे ही व्यवहार करते थे। इनकी आंखें मृत व्यक्ति की तरह निस्तब्ध होती थीं, लेकिन वे बलशाली बहुत होते थे।

  अमेरिका के गुह्यविद्याओं के जानकार अल्फ्रेड में ट्राक्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक एक्सार्सिस्ट में एक घटना का उल्लेख किया है। मारविन मोनरो नामक एक इंजीनियर एक कार से न्यूयार्क जा रहा था। रास्ते में उसकी कार में कुछ खराबी आ गयी।
   जनशून्य उस क्षेत्र में उसकी एक वृद्ध से मुलाकात हुई। वह उसे अपने मकान में ले गया। मोनरो मृतात्माओं की गुलामी के बारे में विश्वास नहीं करता था। परन्तु वह अपने एक मित्र की मृत्यु से व्यथित था। उस वृद्ध ने उसकी व्यथा को समझा और हाथ को लहरा दिया। हाथ के लहराते ही उसके मित्र की अशरीरी जीवात्मा वहां प्रकट हो गयी। मोनरो ने अपने मित्र की जीवात्मा से बातें कीं। तब कहीं जाकर उसे इस गुह्यविद्या पर विश्वास हुआ।

वह अज्ञात और रहस्यमयी युवती कौन थी ?
मेरे इस प्रश्न के उत्तर में कुछ समय तक मौन रहे कापालिक वज्रेश्वरानंद। फिर शून्य में देखते हुए धीमे स्वर में बोले–उस नारी का नाम रोहिणी था। वह राजनर्तकी थी। वह अति सुन्दर थी। गहन और नृत्यकला में पारंगत थी। महाराज विश्वसेन उस देवकन्या जैसी सुन्दरी पर मुग्ध थे। राजनर्तकी से विवाह तो नहीं कर सकते थे लेकिन अंकशायिनी बनाने के लिए अति व्याकुल थे।
कापालिकों का युग था। उनके प्रभाव से साधारण लोग क्या बड़े-बड़े राजा महाराज भयभीत रहते थे। कपाल कुण्डलेश्वरानंद राजतांत्रिक थे। जब कभी राजनर्तकी रोगिणी का राज्यसभा में नृत्य-आयोजन होता था तो राजतांत्रिक कपाल कुण्डलेश्वरानंद का राज्यसभा में उपस्थित होना स्वाभाविक था और जब नृत्य होने लगता तो वे और कुछ नहीं बस एकटक रोहिणी की चाँद जैसी मुखाकृति की ओर ही निहारते रहते थे।
उस समय उनकी भयंकर आंखों में साधना का तेज तो कम वासना की चमक अधिक होती थी। रोहिणी को महाभैरवी के रूप में स्वीकार करने की लालसा और तीव्र हो उठती उनके हृदय में। अवसर की खोज में थे और संयोग से एक दिन अवसर उपलब्ध भी हो गया।
महाराज विश्वसेन की अवस्था यौवन की सीमा पार कर रही थी लेकिन पुत्र का मुख अभी तक देख न सके थे। इसके लिए एक दिन उस तांत्रिक से परामर्श किया–पुत्रोत्पत्ति के लिए कोई तांत्रिक अनुष्ठान हो तो बतलाएं।
पुत्र प्राप्ति के लिए सब कुछ करने को तैयार हूं मैं और तभी मन की अभिलाषा पूर्ण होती दिख पड़ी कापालिक को। अपनी लम्बी स्याह दाढ़ी पर हाथ फेरते हए गम्भीर स्वर में कापालिक महाशय बोले–आपकी मनोकामना शीघ्र और अवश्य पूर्ण होगी लेकिन उसकी दक्षिणा क्या देंगे आप मुझे ?
यह सुनकर महाशय बिना समझे-बुझे हठात बोल पड़े–आपकी जो भी इच्छा होगी उसे अवश्य पूर्ण किया जाएगा। आप कुछ कहें तो।
कापालिक का वीभत्स चेहरा खिल उठा एकबारगी। बोला–आप देंगे दक्षिणा ?
हाँ प्रभु ! निश्चित रूप से दूंगा।
मुझे आपकी राजनर्तकी रोहिणी चाहिए।
यह सुनकर महाराज विश्वसेन की आंखों की चमक बुझ गयी। चेहरा थोड़ा म्लान हो गया। सिर झुकाकर कुछ सोचने लगे वे। उनकी कामना-लालसा और अभिलाषा धूल में मिलती नज़र आने लगी। सपनों का दीप बुझता हुआ नजर आने लगा। लेकिन अब तो वे विवश थे। रोहिणी को तो देना ही पड़ेगा दक्षिणा के रूप में कापालिक को।
महाराज को जहां सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुई वहीं उस महान दुर्धर्ष कापालिक को उपलब्ध हुई राजनर्तकी रोहिणी। निश्चय ही रोहिणी के मन में महाराज की कोई मधुर छवि रही होगी जो कांच की तरह से ‘छन्न’ से टूट कर बिखर गयी होगी क्योंकि उस दिन से कमल की तरह से हमेशा खिला रहने वाला और हंसता-मुस्कराता चाँद-सा चेहरा म्लान रहने लगा जैसे राहु ने ग्रस लिया हो उसे।
जिस दिन राजपुत्र का नामकरण संस्कार सम्पन्न हुआ, उसी दिन उस महातांत्रिक ने रोहिणी को महाभैरवी की दीक्षा दी। अब वह महाभैरवी बन गयी थी उस तांत्रिक की। गुप्त साधना-मार्ग की गोपनीय और रहस्यमयी तांत्रिक विधि द्वारा समस्त क्रियाओं के संपन्न होने के पश्चात महाभैरवी को मदिरा अर्पित की गई और उसके बाद किया गया महाशक्ति का आवाहन।
आवाहन का कार्य सम्पन्न होते ही महाभैरवी का मुखमण्डल दैवीय तेज से दमक उठा एकबारगी। प्रखर हो उठे नेत्र और रक्ताभ गालों पर बिखर गए लावण्य के कण। रोहिणी अब साधारण राजनर्तकी नहीं रह गयी थी। उसके शरीर में महामाया महाशक्ति का हो चुका था आविर्भाव।

  फिर क्या हुआ ?
  होगा क्या ? महाभैरवी के सहयोग से कुण्डलेश्वरानंद ने दिव्य अलोकिक तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त कीं और उसी के बल पर पूरे तीन सौ अस्सी वर्ष स्थूल शरीर में रहे और अन्त में माँ महामाया की आज्ञा से जीवित समाधि ले ली उस महातांत्रिक ने।
  कहाँ ली समाधि ?
  इसी स्थान पर।
  महाभैरवी का क्या हुआ ? 
  उसने भी जीवित समाधि ले ली महासाधक के साथ। लेकिन दीपावली की महानिशा में अपने योगबल से सशरीर  प्रकट होकर महामाया कापलेश्वरी की पूजा-अर्चना करते हैं और अपने हाथ से बलि भी प्रदान करते हैं दोनों।
  बलि किसकी होती है ?
  पशुबलि और कभी- कभी आवश्यकता पड़ने पर नरबलि भी प्रदान की जाती है माँ को।
  क्या नरबलि भी....?
  सारा शरीर रोमांचित हो उठा मेरा। भय और संशय के मिले-जुले भाव से भर गया मेरा मन। अगले महीने ही तो दीपावली है। कहीं मेरी ही बलि देने का उपक्रम तो नहीं चल रहा है ? अगर यह सच है तो यहां से तुरन्त चले जाना चाहिए, लेकिन तब तक भय और आतंक की छाया और अधिक घनीभूत हो चुकी थी मेरे मस्तिष्क में।
    उसी के साथ अपने आप में जड़ता का भी अनुभब करने लगा था मैं। उठना चाहा लेकिन उठ न सका। निश्चय ही दिग्भ्रमित-सी हो गयी थी मेरी आत्मा उस समय। न जाने कौन-सी अदृश्य सम्मोहन शक्ति के वशीभूत हो गया था मैं। इच्छा होते हुए भी वहां से हटा नहीं जा रहा था मुझसे।
  मेरी मानसिक स्थिति से संभवतः अवगत हो गए थे कापालिक वज्रेश्वरानंद। उनकी तीक्ष्ण दृष्टि मुझ पर स्थिर थी। मैंने उनकी ओर सिर घुमा कर देखा। उनके सूखे और पपड़ी जमे होठों पर एक विचित्र-सी मुस्कान तैर गयी और फिर न जाने कैसा भाव उभर आया उनके नरकंकाल जैसे चेहरे पर।
  उसी अवस्था में धीमे स्वर में बोले कापालिक वज्रेश्वरानंद--इस गुफा के और गुफा के भीतर के स्थान से अभीतक कोई परिचित नहीं है। दीर्घकाल के पश्चात किसी प्राणी का यहां प्रवेश हुआ है तो वह एकमात्र तुम हो। सम्भव है किसी समय और किसी काल में यहां की परंपरा से तुम्हारा सम्बन्ध जुड़ा रहा हो--मैं कह नहीं सकता। मानव जीवन की एक निर्धारित सीमा है। उस सीमा को प्राप्त कर लेने के पश्चात जो सिद्धावस्था को उपलब्ध नहीं है, ऐसे योगी को शरीर में रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि शरीर की भी अपनी मर्यादा है।
   ऐसी अवस्था में जब तक मुक्ति लाभ नहीं होता, तब तक योगी अथवा साधकगण विशेष योनि यानी सर्प योनि को स्वीकार कर कालक्ष्य करते हैं। यह विशिष्ट योनि 84 लाख योनियों से भिन्न है और यही कारण है कि मैं सर्पयोनि में यहां कालक्षय कर रहा हूँ।

  यह सुनकर अवाक रह गया मैं। कभी सपने में भी नहीं सोचा था यह सब। हे भगवान ! ,क्या होने वाला है मेरे साथ ? कौन-सी घटना घटने वाली है मेरे साथ ? अपने आप मेरा हाथ गर्दन पर चला गया और सहलाने लगा-- कहीं मेरी गर्दन....कैसा योगायोग है और कैसा है संयोग मेरे जीवन में...? नियति क्या चाहती मुझसे ? अपना कौन सा प्रयोजन पूर्ण करना चाहती है वह ?--मन-ही-मन सोचने लगा।

तभी वहां एक प्रौढ़ महिला प्रकट हुयी। वह कहां और किधर से आई समझ में नहीं आया और जब उन पर मेरी दृष्टि पड़ी तो एकबारगी अवाक रह गया मैं। कभी सपने में भी नहीं सोचा था यह सब। यह तो वही महिला है जो धर्मशाला में भोजन लेकर आई थी मेरे लिए।
कैसी-कैसी चमत्कारपूर्ण, आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय घटनाएं घट रही थीं उस समय मेरे जीवन में। क्या कोई इसे समझेगा और करेगा विश्वास ? उस महिला का नाम था रामेश्वरी माँ। मेरी ओर देखकर मन्द-मन्द मुस्करा रही थीं वह। बाद में सब कुछ स्प्ष्ट हो गया।
कपिला आनंद रामेश्वरी माँ को जानती थीं, उन्होंने ही प्रेरित कर रामेश्वरी माँ द्वारा भोजन और कम्बल भिजवाया था। रामेश्वरी माँ की आयु अत्यधिक थी। लेकिन 45 से अधिक की प्रतीत नहीं होती थी वे। शाक्तकुल में दीक्षा ली थी उन्होंने। उनके गुरु थे शाक्त साधक मुण्डरेश्वरानंद।
जब रामेश्वरी माँ को ज्ञात हुआ कि योग और तन्त्र के वास्तविक स्वरूप और उसके गुह्य रहस्य से परिचित होना चाहता हूँ तो गदगद हो उठीं यह सुनकर। रामेश्वरी माँ बोलीं– तन्त्र के कई सम्प्रदाय हैं जिनमें एक शाक्त सम्प्रदाय भी है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी शाक्त कहलाते हैं जो केवल एकमात्र शक्ति की पूजा-अर्चना, साधना-उपासना आदि करते हैं।
उनके लिए सम्पूर्ण जगत ही शक्तिमय है। स्थूल विग्रह के रूप में वह शक्ति महाकाली है। महाकाली के विग्रह में गतिशक्ति, स्थिरशक्ति और क्रियाशक्ति–तीनों हैं, इसलिए शाक्त तन्त्र साधना-भूमि में महाकाली का अतिशय महत्व है।
रामेश्वरी माँ बोलीं–
समय-समय पर भारत के सभी धर्मों ने शाक्त साधना पर प्रहार किया है लेकिन उन कठोर प्रहारों के बावजूद भी आज शाक्त साधना धर्म और संप्रदाय प्रच्छन( गोपनीय ) रूप से अपने मूल स्वरूप में अवस्थित है। निःसंदेह प्रचलित सभी धर्मों की आंतरिक भूमि में शाक्त धर्म विद्यमान है।
वास्तव में शाक्त साधना ज्ञान और कर्म पर प्रतिष्ठित है और उसकी प्रतिष्ठा के मूल में महाशक्ति विद्यमान है। मूल शक्ति महाशक्ति ही है। इच्छाशक्ति का पूर्ण भाव से विकास उस महाशक्ति से सम्बन्ध बनाये रखना ही वास्तव में योग है। इसी को अखंड महायोग कहते हैं जो कठिन है और सहज भी है।
लेकिन करता कौन है ? सब लोग साधना की बात करते हैं, सभी नदी की गहराई की बात पूछते हैं, उतरता कौन है ?
इच्छाशक्ति ही सब कुछ है। इच्छा तो सभी के पास है, लेकिन शक्ति नहीं है। बस यही असली बात है। एक साधारण इच्छा को पूर्ण करने में न जाने कितने कर्म करने पड़ते हैं जिनमें बहुत सारी मानसिक और शारीरिक शक्ति का ह्रास हो जाता है। उसे बचाना चाहिए। यह तभी सम्भव है जब हम कम से कम इच्छाओं को मन में उदय होने दें।
साधारण इच्छाओं को महत्व ही न दें। जो आवश्यक हैं, महत्वपूर्ण हैं और शभ इच्छाएं ही हों, उन पर ध्यान दें। उनमें से पहले एक को लेकर लक्ष्य लें और कम से कम 1 से लेकर 3 घण्टे तक उस इच्छा पर मन को केंद्रित कर एकान्त में ध्यानस्थ हो बैठें। इच्छा, ज्ञान और क्रिया–इन तीनों का समन्वित और साकार रूप महाकाली है।
एक ही विग्रह में तीनों शक्तियां। महाकाली के रूप में इच्छाशक्ति ही हमारे सामने है यह भाव रहना चाहिए। परिणाम होगा कि हमारी इच्छा केवल इच्छा ही नहीं रह जायेगी, एक प्रबल शक्ति बन जाएगी। सब उलट-पलट हो जाएगा हमारे अन्तर में। जब भी कोई इच्छा उत्पन्न होगी, वह अपने आप ही पूरी हो जाएगी।। थोड़ा समय भले लगे, पूरी होगी अवश्य। यही एक योगी का खेल है और है खेल योगमाया का।
रामेश्वरी माँ आगे बोली–
परन्तु एक बात को अवश्य याद रखना होगा और वह यह कि इच्छाशक्ति का पूर्ण विकास ‘ज्ञान’ के अभाव में संभव नहीं। ज्ञान होना आवश्यक है। बिना ज्ञान के पूजा-पाठ, जप-ध्यान आदि सभी कुछ व्यर्थ है। अगर कुछ व्यर्थ नहीं है तो वह है मीरा और रामकृष्ण परमहंस की तरह सच्ची समर्पण की भावना।
ज्ञान और कर्म दोनों को नियोजित किये बिना महाशक्ति का अनुग्रह प्राप्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य में ज्ञान कुछ है और कर्म कुछ है। यही मानव क्लेश का कारण है। ऐसी अवस्था में मनुष्य न भौतिक सफलता प्राप्त कर सकता है और न तो कर सकता है प्राप्त आध्यात्मिक सफलता ही। आज के समय में ज्ञान और कर्म का सामंजस्य दुर्लभ है और सारे क्लेश, दुःख और सारी समस्याओं का कारण यही है।
जहाँ ज्ञान का अस्तित्व है, वहां कर्म का दर्शन दुर्लभ है और जहां कर्म है वहां ज्ञान का प्रकाश नहीं है। ज्ञान के शुभ प्रकाश में होने वाले कर्म का परिणाम हमें विशिष्ट ज्ञान का बोध कराता है। ज्ञान और कर्म को एक साथ नियोजित होने पर जो परम उपलब्धि होती है वह ‘प्रकृष्ट विज्ञान’ है जिसका उदय ‘चिदाकाश’ में होता है जिसका प्रकाश आत्मा का प्रकाश है। दूसरे शब्दों में वह महाशक्ति का प्रकाश है। यही स्थायी रूप से महाशक्ति का नित्य योग है यानी ‘सातत्य योग’। सातत्य योग को उपलब्ध योगी प्रत्यक्ष में तो साधारण है, लेकिन उसके भीतर माँ महामाया का सतत उज्ज्वल प्रकाश है। अन्त में उसी प्रकाश में सदैव के लिए लीन हो जाना शाक्त साधना का मुख्य उद्देश्य है।
परा अवस्था तंत्र-योग की परम अवस्था। महाशक्ति से नित्ययोग होने पर महासत्ता का सम्पूर्ण ज्ञान स्वयमेव हो जाता है। महाशक्ति और महासत्ता में कोई भिन्नता नहीं है, दोनों अभिन्न हैं केवल संज्ञा-भेद है।
चिदाकाश की सत्ता में दोनों के अभिन्न रूप की अनुभूति करना ही परम अवस्था है। तन्त्र में उसी को चितशक्ति अथवा चितिशक्ति कहते हैं.

महाशक्ति के अनुग्रह की प्राप्ति का कोई सरल और बोधगम्य उपाय है ?
— मैंने प्रश्न किया ?
मेरा प्रश्न सुनकर हंसी रामेश्वरी माँ। निश्चय ही मेरा प्रश्न मूर्खतापूर्ण रहा होगा तभी तो हंसी होंगी।
बोलीं–पहले तो तुम प्राप्ति के अर्थ पर विचार करो। प्राप्ति शब्द का अर्थ क्या है ? जो वस्तु दुर्लभ और अप्राप्य हो उसे प्राप्त कर लेना वस्तुतः प्राप्ति है। जगत में सबसे दुर्लभ वस्तु आत्मप्राप्ति है। उसे प्राप्त कर लेना ही भगवत प्राप्ति है। महाशक्ति का अनुग्रह और उसके मूल में स्थित करुणा तो हम सबको किसी-न-किसी रूप में नित्य प्राप्त ही है। दुःख तो यह है कि माया-मोह और अज्ञानता के कारण हम सब उसे समझ नहीं पाते। शास्त्र या उसे पढ़ाने वाला गुरु या और कोई उसे समझा नहीं सकता। भौतिक विज्ञान के नियम और सिद्धांत परिवर्तनीय हैं लेकिन जिस प्रकृष्ट विज्ञान की चर्चा मैंने पहले की उसके नियम और सिद्धांत अकाट्य और अपरिवर्तनीय हैं।
चितशक्ति या चितिशक्ति के अनुग्रह की उपलब्धि होते ही साधक ‘माया’ से निवृत्त हो जाता है। यह माया ही साधक के लिए ज्ञान के मार्ग में बाधक है। माया का जो दूसरा रूप है, वह है अहंकार। अहंकार सर्वत्र व्याप्त है। उसका विकास चैतन्य के विकास के साथ ही होता है। यह सर्वमान्य है कि निरालम्बन रूप से शक्ति का आकर्षण नहीं होता है। महाशक्ति का प्रथम रूप माया है जो अहंकार का आलम्बन लेकर मानव शरीर में प्रकट होती है।
यही जीवभाव है। इस जीवभाव में महाशक्ति का मयारूप अपनी करुणा और अनुग्रह से केवल स्थूल जगत का ज्ञान कराए रखने में समर्थ होता है किन्तु जब अहंकार तिरोहित होता है तो मायारूपी आवरण जीवात्मा पर से स्वयं हट जाता है।
माया का आधार अहंकार और महामाया का आधार आत्मा। माया और महामाया एक ही महाशक्ति के दो रूप हैं।

  जीवभाव संकुचित और माया के आश्रित है, मगर आत्मभाव व्यापक, विशाल और महामाया के आश्रित है। तंत्रभूमि में महाशक्ति आत्मरूपा है और महासत्ता परमात्मा है। दोनों का जो उपासना रूप है, वह है परमेश्वर और परमेश्वरी।
  तन्त्र के साधना मार्ग में इसी को कुण्डलिनी साधना की संज्ञा दी गयी है। इस मार्ग में कुण्डलिनी का जागरण, फिर उत्थान, फिर षट्चक्र भेदन, फिर ब्रह्मरन्ध्र भेदन और सबसे अन्त में सहस्त्रार चक्र में स्थित शिव के साथ कुण्डलिनी रूपा शिवा का सामरस्य मिलन--यह तन्त्र का आंतरिक साधना-क्रम है जो अपने आप में अति गूढ़ है। हज़ारों-लाखों में कोई एक व्यक्ति इस रहस्यमय साधना-मार्ग पर अग्रसर होता है। 
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