मार्क्स की अंतिम यात्रा में
कुल बारह लोग शामिल थे
मुक्तिबोध की मृत्यु के वक्त आठ
“कोई मास्टर मर गया है”
प्रेमचंद के बारे में कहते सुने गए
गुमनामी में निराला गए
और इमरोज की शवयात्रा में
कुल जमा 10 लोग थे
कुछ लोग
अलग मयार के लोग थे
जो मृत्यु बाद समझ आये
कुछ लोग देह में तो आये
लेकिन अपनी ही देह के नही हुए
झूठ साबित हुई ये बात
कि “शवयात्रा बताती है
आदमी कितना बड़ा था”
कुछ लोग जो
मृत्यु से पहले देह से मुक्त हो गए
जिन्होंने देह की आसक्तियां नही खेलीं
जिन्होंने देह की लम्पटता के ग्रन्थ नही रचे
जो देह में किसी मिशन के लिये आये थे
वे हमेशा जिंदा रहे
दरअसल
मृत्य के बाद समझ आये लोग
हमारे मयार से बडे लोग थे
वे हमारी समझ के मोहताज नही थे
वे मोहताज नही थे
कि उनका जीना और जाना भव्य हो
वे हमें
किसी उपहार में मिले रत्न थे
जिनकी कीमत हमने
खो जाने के बाद जानी।
वीरेंदर भाटिया।
[#देवता ]

