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गांधी मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला जानते थे

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मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला आती कहाँ से है?

धनंजय कुमार

 कहते हैं मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला कला में निहित है. आप गांधी के बचपन को देखिये-गांधी के बालमन पर नाटक सत्य हरिश्चंद्र का बड़ा गहरा असर पडा और उन्होंने व्रत लिया सच बोलने का. और एक सत्य बोलने की आदत ने उन्हें जीवन को समझने की चाभी दे दी.मंजुल भारद्वाज मानते हैं कोई हर व्यक्ति में नेता होने के गुण हैं, लेकिन ज़रुरत होती है उसे संवारने और निखारने की. स्पष्ट दृष्टि, स्पष्ट लक्ष्य और लक्ष्य तक पहुँचने की सात्विक ज़िद ही व्यक्ति को नेता बनाती है. गांधी की ज़िद लक्ष्य को सिर्फ़ हासिल करने की ज़िद नहीं थी, बल्कि वह सात्विक मार्ग से लक्ष्य को हासिल करना चाहते थे. ये सात्विक ज़िद ही गांधी को नेता बनाती है. अन्यथा लक्ष्य तक तो राजा भी पहुँच जाता है,

कोई बदमाश व्यक्ति भी लक्ष्य को पा लेता है. दूसरी महत्वपूर्ण बात गांधी का लक्ष्य प्राप्त करना कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक प्रयोग है. आप उनके बताये रास्ते पर चलिए लक्ष्य चाहे कितना ही दुर्लभ क्यों न हो प्राप्त होगा ही.मंजुल कहते हैं, यह बिना सांस्कृतिक चेतना के जागृत हुए हो ही नहीं सकता. गांधी हमारी सांस्कृतिक चेतना के नायक हैं और मैं उन्हें पहला गुरू मानता हूँ. दुनिया में कई तरह की क्रांतियाँ हुई, लेकिन कोई भी क्रान्ति मनुष्य को मनुष्य नहीं बना सकी. सारी क्रांतियाँ सत्ता पर आकर समाप्त हो गयीं और सत्ता फिर उसी व्यवस्था में बदल गयी, जिस व्यवस्था के विरोध में क्रान्ति की गयी. साम्यवादी क्रान्ति का भी वही हाल क्यों हुआ? आज देखिये कि दोनों बड़े साम्यवादी देश अमेरिका से भी बड़े साम्राज्यवादी बने हैं. तो सवाल उठता है, क्रांतियाँ कहाँ और क्यों भटक जाती हैं?क्रांतियाँ इसलिए राह भटक जाती है क्योंकि उसमें सत्य और निष्ठा नहीं है. उसमें दूसरे को व्यवहार से जीत लेने या कहें अपना बना लेने की कूबत नहीं है. कमज़ोर व्यक्ति की पीड़ा को महसूस करने वाला हृदय नहीं है.

सत्ता बन्दूक की गोली से निकल सकती है, लेकिन मनुष्य कला से ही निकलेगा, सांस्कृतिक चेतना ही मनुष्य को मनुष्य बना सकती है. हमने जिस नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात किया है, वो थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस सांस्कृतिक चेतना का द्वार खोलता है. मेरे लिए थियेटर सिर्फ मनोरंजन के लिए कला का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि थियेटर कला के माध्यम से मनुष्य के भीतर सांस्कृतिक दीप जलाने का माध्यम है. इसीलिये मैंने इसे थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस कहा. जो कलाकार को विषय से न सिर्फ जोड़ता है, बल्कि उसके भीतर परिवर्तन की गंगा बहाता है.मंजुल कहते हैं कला तबतक अधूरी है जबतक वह मनुष्य की ज़िंदगी को न बदले और मनुष्य की ज़िंदगियों को बदलने में राजनीति की अहम भूमिका है, इसलिए मेरा मानना है कि कला और राजनीति का गहरा संबंध है. गांधी राजनीतिज्ञ नहीं थे वह एक संवेदनशील व्यक्ति थे, दूसरों की पीड़ा उन्हें परेशान करती थी, और वह उससे मुक्ति की राह निकालने चल पड़ते थे. जब मुक्ति की राह पर निकलते थे तो सत्ता और शोषणकारी शक्तियों से उनका टकराव होता था. गांधी भले मंच पर अभिनय नहीं करते थे, लेकिन जीवन रूपी मंच के वो बड़े अभिनेता थे. जिन्हें देखकर अंग्रेजों का हृदय भी पिघल जाते थे.तो दुनिया को गांधी जैसे एक नहीं अनेक नेताओं की ज़रुरत है. नेता जो पूरी मानव जाति को मनुष्यता की राह ले चले. और यह सांस्कृतिक क्रान्ति से ही संभव है. जिसकी मशाल लिए थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस चल रहा है. हमारे साथी चल रहे हैं. गांधी का सपना सोती आँखों का सपना नहीं था, जागती आँखों का सपना था और यह सच होकर रहेगा. गांधी का मार्ग ही दुनिया की सही राह है.

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