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गांधी – नेहरू आध्यात्मिक और वैज्ञानिक चेतना का संगम

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राकेश श्रीवास्तव 
यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को आध्यात्मिक बल प्रदान किया।उन्होंने आजादी की लड़ाई को प्रस्ताव और पेटीशन के दायरे से बाहर निकालकर उसे भद्रजन की बजाय आमजन की लड़ाई बनाया।उन्होंने भारत की आम जनता को अपने विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से जोड़ा।।उनकी प्रेरणा से लाखों नौजवानों ने आजादी के आंदोलन मे अपना सर्वस्व झोंक दिया।उन्हें नायक बनाने का यश निसंदेह गांधी को ही है।गांधी जी के आह्वान पर चम्पारण मे डॉ राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, नौमी प्रसाद,मंजरूल हक जैसे लोगों द्वारा ऐश्वर्यशाली जीवन छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने का जो सिलसिला जारी हुआ वह बरास्ते सरदार पटेल,मोतीलाल नेहरू,सीएफ एंड्रयूज,मीरा बेन,पंडित नेहरू,नेताजी सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह,आचार्य कृपलानी,आचार्य नरेंद्र देव,सरोजिनी नायडू,अबुल कलाम आजाद,विनोबा भावे,महादेव देसाई,जयप्रकाश नारायण, डॉ.लोहिया जैसे लोगों के साथ ही आम आदमी के भी आजादी की लड़ाई मे कूद पडऩे से महायज्ञ हो गया। सुख सुविधाओं से भरी जिंदगी का आश्वासन छोड़कर लोग साबरमती के संत के संग चल पड़े। 
इन सभी ने आधुनिक भारत के निर्माण मे अपनी अपनी अमिट भूमिका निभाई।सभी का लक्ष्य ब्रिटिश हुकूमत से आजादी प्राप्त करना तथा उसके पश्चात राष्ट्र निर्माण था।प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अहम भूमिका थी और उन्होंने इसे बखूबी निभाने का प्रयास किया।गांधी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक थे तो नेहरू आधुनिक भारत के निर्माण मे वैज्ञानिक चेतना के प्रतीक।

पंडित नेहरू भी गांधी की राह के पथिक बन गए।संगम की धरती पर जन्मे पंडित नेहरू के दिमाग में आज़ाद भारत के भविष्य की स्पष्ट तस्वीर के साथ ही देश के प्रति समर्पण, जुनून और महानता और दूरदर्शिता का भी संगम था।धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक सोच का संगम था।कांग्रेस के भीतर की समाजवादी सोच तथा भारत के औद्योगिक विकास की दृष्टि का संगम था।उनकी दूरदर्शिता से देश में पंच वर्षीय योजनाएं शूरू हुई,बड़े बड़े उद्योग लगे,पीएसयू अस्तित्व में आईं ,एम्स,आईआईटी जैसे संस्थान बने।औपनिवेशिक दासता से मुक्त विभाजित राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकजुट रहने की थी।पंडित नेहरू ने भाषाई आधार पर विभाजनकारी प्रयासों को दृढ़ता से शांत किया। आजादी के रूप में सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के बाद विभिन्न वर्ग,जाति,सम्प्रदाय,क्षेत्र,संस्कृति,भाषा समूह के लोगों की अलग अलग  प्राथमिकताएं को राष्ट्रहित मे मोड़ने की महत्वपूर्ण चुनौती का सफलतापूर्वक सामना किया।

वास्तव मे वह राजनेता के साथ ही साथ एक युग दृष्टा भी थे।उनके नेतृत्व मे साहित्य,संगीत ,संस्कृति,इतिहास,कृषि,विज्ञान,शिक्षा,तकनीकी शिक्षा,स्वास्थ्य,न्यूक्लियर ऊर्जा,पॉवर प्लांट जैसे अनेक क्षेत्रों में हमारे कदम आगे बढ़ते गये।राजनैतिक रूप से सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने अपने आसपास लेखकों,इतिहासकारों,वैज्ञानिकों,अर्थशास्त्रियों को रखा और उन्हें सदैव प्रोत्साहित करते रहे।सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फ़िराक़ गोरखपुरी, रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकार से लेकर मेघनाद साहा, विक्रम साराभाई, डॉ होमी भाभा, महालनोबिस जैसे वैज्ञानिकों के साथ नेहरू बहुत सहज रहते थे।
आजादी मिलने के बाद देश के आंतरिक मामलों के साथ ही विदेशी नीति के मामले भी बहुत चुनौतीपूर्ण थे।नेहरु अपने देश के लिए विश्व स्तर पर सद्भावना के लिए चार्लीचैप्लिन,आइंस्टीन,स्तालिन,च्यांगकाई शेक,माओत्से दुंग जैसे विश्व की अनेक विभूतियों से सम्पर्क मे रहे।पंडित नेहरू ने अमेरिका तथा सोवियत संघ दोनों ही ब्लॉक से समान दूरी बनाते हुए पंचशील का सिद्धांत दिया।सुकर्णो, नासर,टीटो के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन का मंच दिया जिसने अन्य देशों को भी अपनी स्वतंत्र नीति बनाने का अवसर दिया।पंडित जवाहर लाल नेहरू का योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि आज उनके जाने के सत्तावन वर्ष बाद भी उनकी आलोचना तो की जा सकती है परंतु अधिकारिक रूप से उनकी बनाई नीतियों से बड़ा विचलन नही हो पाया है चाहे वह लोकतंत्र या धर्मनिरपेक्षता हो या फिर विदेश नीति।
नेहरू के अंदर तीव्र बुद्धि के साथ ही व्यावहारिक सामंजस्य स्थापित करने की अद्भुत क्षमता भी थी।गांधीजी ने शायद इसी कारण से उनको चुना कि वह सबको लेकर चलने में सक्षम होंगे।डॉक्टर लोहिया ने गांधी जी से पूछा था कि आप नेहरू को सबसे बेहतर क्यों मानते हैं तो गांधी जी कहा कि मैंने सबसे अच्छा कभी नहीं कहा बल्कि कहा “इनसे ज्यादा अच्छा नहीं”।

शहीदे आजम भगत सिंह नेहरू के व्यापक फलक से बहुत प्रभावित थे।वे मानते थे कि नेहरू का विस्तृत फलक ही देश के नौजवानों को बौद्धिक विकास के मार्ग पर अग्रसर कर सकता है।अपने एक लेख मे भगत सिंह नेहरू के विषय मे लिखते हैं “उन्होंने अपने एक संबोधन में कहा कि प्रत्येक नौजवान को विद्रोह करना चाहिए, राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्र में भी।मुझे ऐसे व्यक्ति की कोई आवश्यकता नहीं है जो आकर कहे कि फलां बात कुरान में लिखी हुई है,कोई बात जो अपनी समझदारी की परख में सही साबित ना हो उसे चाहे वेद कहें या फिर पुराण नहीं माननी चाहिए।यह एक युगांतकारी के विचार हैं।”
आज पंडित नेहरू के जन्मदिन पर स्मरण करते हुए सादर नमन।

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