अग्नि आलोक

*गांधी, आरएसएस और विभाजन के दंगे*

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पुष्यमित्र 

एक बार फिर विभाजन के दंगे चर्चा में हैं और इस चर्चा के बीच फिर से गांधी हैं। ऐसे में चाहें तो यह पोस्ट पढ़ सकते हैं, जब गांधी विभाजन के दंगों के बीच आरएसएस की शाखा में गये थे। 16 सितंबर, 1947 को, आजादी के लगभग एक महीने बाद।

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13 सितम्बर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख एमएस गोलवलकर ने महात्मा गांधी से मुलाकात की। वे उन्हें संघ की शाखा में आमंत्रित करने आए थे। गांधी जी ने गोलवलकर से कहा, “संघ के हाथ भी दंगों की ख़ून से रंगे हैं।” गोलवलकर ने इसे ग़लत बताया और कहा, “संघ किसी का दुश्मन नहीं है। हम बस हिन्दुस्तान की रक्षा करना चाहते हैं। आप हमारी रैली में चलकर अपने विचारों से हमारे कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करें।” 

जवाब में गांधीजी ने कहा, “आपको एक सार्वजनिक वक्तव्य निकालना चाहिए और अपने विरुद्ध लगाए जा रहे आरोपों का खंडन करना चाहिए। साथ ही मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार और उनकी हत्या की निंदा करनी चाहिए।”

तभी पास बैठे एक व्यक्ति ने कहा, “संघ के लोगों ने शरणार्थी शिविरों में अच्छा काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रम का परिचय दिया है।”

इस पर गांधीजी ने कहा, “यह मत भूलिये कि हिटलर के नाजियों और मुसोलनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।”

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बहरहाल गांधी जी ने यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया और 16 सितम्बर को इस रैली में पहुँचे भी। यह रैली वाल्मीकि आश्रम के पास वाले मैदान में हुई थी। इस रैली में संघ के नेता ने उनका परिचय ‘हिन्दू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ के रूप में दिया। जवाब में अपने सम्बोधन में गांधी जी ने कहा- 

“मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है मगर मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न ही बहिष्कारवादी। मेरे हिन्दू धर्म की ख़ासियत यह है कि उसने सभी धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। यदि हिन्दू यह मानते हो कि भारत में ग़ैर-हिन्दुओं के लिए कोई बराबरी की जगह नहीं होनी चाहिए, मुसलमान अगर भारत में रहना चाहें तो उन्हें दोयम दर्जे से सन्तोष करना पड़ेगा। या अगर मुसलमान ऐसा समझते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दू केवल मुसलमानों की मेहरबानी पर गुलाम जाति के रूप में ही रह सकते हैं, तो इसका नतीजा यह होगा कि हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म श्रीहीन हो जाएँगे। इसलिए मुझे आपके इस आश्वासन से ख़ुशी है कि आपकी नीति इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं है। मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि अगर आपके ख़िलाफ़ लगाया जाने वाला यह आरोप सच निकले कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है, तो उसका बुरा परिणाम होगा।

मैं वर्धा में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कैम्प में जा चुका हूँ, तब इसके संस्थापक श्रीहेडगेवार जीवित थे। तब जमनालाल बजाज आपके संगठन में अनुशासन, सरलता और छुआछूत न होने के गुण से प्रभावित थे। किसी भी संगठन में अगर सेवा और आत्म बलिदान की भावना हो तो वह निश्चित तौर पर आगे बढ़ेगा मगर इनके साथ पवित्र उद्देश्य और सच्चा ज्ञान भी ज़रूरी है। नहीं तो वह समाज के लिए खतरनाक हो सकता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत दो हिस्सों में बँट गया है मगर अगर इनमें से एक भाग पागल होकर घृणित कार्य करे, तो क्या दूसरे हिस्से को भी उसका अनुकरण करना चाहिए? बुराई के बदले बुराई करने में कोई फ़ायदा नहीं है। धर्म हमें सिखाता है कि बुराई का बदला अच्छाई से चुकाएँ।

अगर भारत की नैया भंवर में है। अभी सरकार में जो नेतृत्व है, वह सबसे बेहतर विकल्प है। कुछ लोग उनसे असन्तुष्ट हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि आप अच्छा नेता पैदा करें, जो इस पुराने नेतृत्व को हटाकर कमान अपने हाथ में ले। आख़िरकार सरदार पटेल बूढ़े हो चुके हैं, नेहरू बूढ़े न भी हुए हो मगर इस दबाव की वजह से बुजुर्ग ही दिखते हैं। वे दोनों अपनी क्षमता के हिसाब से बेहतरीन काम कर रहे हैं, पर अगर हिन्दुओं का बड़ा हिस्सा ग़लत दिशा में बढ़ने को आतुर है, तो कई उसे कैसे रोक सकता है। लेकिन एक अकेले व्यक्ति को भी इसका विरोध करने का अधिकार है, इसलिए गांधी ऐसा कर रहा है।

मुझे कहा जाता है कि मैं मुसलमानों का दोस्त हूँ और हिन्दुओं-सिखों का दुश्मन। यह सच है कि मैं मुसलमानों और पारसियों का दोस्त हूँ और आज से नहीं बल्कि 12 साल की उम्र से उनका दोस्त हूँ। लेकिन जिन्हें लगता है कि मैं हिन्दुओं-सिखों का दुश्मन हूँ, वे मुझे नहीं जानते। मैं किसी का दुश्मन नहीं हो सकता।

अगर पाकिस्तान ग़लतियाँ करता रहा तो नतीजा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के तौर पर होगा। लेकिन समाधान युद्ध में नहीं, बातचीत में है। पाकिस्तान को हिन्दुओं और सिखों को अपने देश में सुरक्षित माहौल देना चाहिए, ताकि वे पलायन के लिए मजबूर न हो। ऐसा ही भारत सरकार को भी मुसलमानों के साथ करना चाहिए। लेकिन आज दोनों पक्ष पगला गए हैं, इसलिए नतीजा विध्वंस और तबाही के तौर पर दिख रहा है।

संघ के बारे में मेरी जानकारी यह है कि यह एक सु-व्यवस्थित और अनुशासित संस्था है। इसकी इस क्षमता का इस्तेमाल भारत के हित में होना चाहिए, अहित में नहीं। मैं नहीं जानता कि संघ के ख़िलाफ़ जो आरोप लगाए जाते हैं, वे कितने सच हैं। यह संघ को सोचना चाहिए कि वह अपने व्यवहार से साबित करे कि उसके ख़िलाफ़ लगाए जाने वाले आरोप झूठे हैं।”

उनके इस वक्तव्य के बाद सवाल जवाब हुए। एक सवाल पूछा गया-

“क्या हिन्दू धर्म आततायियों को मारने की अनुमति नहीं देता? यदि नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश दिया है, उसके बारे में आपका क्या कहना है?”

जवाब में गांधी जी बोले—

“पहले प्रश्न का उत्तर हाँ और ना दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने से पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने आप में पैदा करें कि आतताई कौन है। दूसरे शब्दों में हमें ऐसा अधिकार तभी मिल सकता है, जब हम पूरी तरह से निर्दोष हो। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने अथवा फाँसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है?

रही बात दूसरे प्रश्न की, यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी क़ानून द्वारा उचित रूप से स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद दोनों एक साथ बन जाएँ, तो सरदार और नेहरू दोनों लाचार हो जाएँगे। वे राष्ट्र के परखे हुए सेवक हैं। उन्हें सेवा करने का अवसर दीजिए। क़ानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।”

तसवीर- आरएसएस कार्यकर्ताओं के साथ गांधी की है. हालांकि यह 1947 की नहीं बल्कि 1944 की है. बस सांकेतिक इस्तेमाल के लिए।

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