-सुसंस्कृति परिहार
मशहूर कवि दिनकर सोनवलकर की कविता ‘गांधी :एक युग मुद्रा’ इस वक्त याद आ रही है जो इस दौर में गांधी को समझने के लिए बार बार पढ़ी जानी चाहिए ।उसकी प्रारंभिक पंक्तियां हैं–
गांधी एक युग की अभिव्यक्ति
जिसे उस युग के हिंसक सपने कैद नहीं कर सके
और इतिहास के आईने में
जिसका सर्वस्व समर्पण का प्रतिविम्ब
देखती रहेंगी आने वाली पीढ़ियां ।

यकीनन गांधी को जितना भुलाने की कोशिश इस दौर में हुई है वह बार बार जनआंदोलनों में सबके बीच आकर खड़े हो जाते हैं और सारी दुनियां तक अवाम की आवाज़ पहुंचा देते हैं । अंग्रेजी हुकूमत को गांधी के सत्य और अहिंसा के साथ सत्याग्रह ने जिस तरह पराभूत किया वह दिलकश हथियार आज सबसे बड़ी ताकत है मजलूमों और वंचितों की ।
पिछले वर्षों एन आर सी के विरोध में जिस तरह महिलाओं ने गांधीवादी तरीके से लंबा आंदोलन चलाया वह सारी दुनियां में एक मिसाल बन गया ।कोरोना संक्रमण से हालांकि आंदोलन समाप्त किया गया यह आंदोलन गांधी की प्रासंगिकता पर मुहर लगा गया । आंदोलन को उग्र बनाने की तमाम कोशिशें नाकाम हुई ।
जब जब मुल्क में आतताई ताकतें बढ़ेंगी उनका जवाब गांधीवादी तरीके से ही दिया जाता रहेगा ।जिस सत्याग्रह को दुनिया ने अनमोल हथियार बताया है उस पर चलना भारतवासियों के लिए और भी चुनौती पूर्ण हो जाता है । भ्रष्टाचार के खिलाफ भी जबरदस्त प्रतिरोध गांधी वादी तरीके से चलाया गया जिसने सरकार बदलने में अहम भूमिका निभाई । लेकिन जैसी सरकार की बात थी वह नहीं मिल पाई आज उस बदली सरकार के विरोध में एक बार फिर माहौल निरंतर गर्माता जा रहा है ।यह जनता को ऊर्जा देने वाले गांधी ही तो हैं ।
हालांकि मज़दूर आन्दोलन ही पृष्ठभूमि में ताकतवर रहे हैं लेकिन जब से भ्रष्टाचार का तेजी से पदार्पण हुआ आंदोलन के नेताओं की धनलोलुपता और समझौतावादी नीतियों के कारण लगभग थम से गये थे ।बंधी मुट्ठियां ,लहराते लाल झंडे और गर्मजोशी से गूंजते नारे जो लोकतांत्रिक देश की जागरूकता का परिचायक थे दिखाई देने बंद हो गए थे ।जब अपना मतलब सिद्ध करना मकसद हो गया था । उसके बाद सरकार की दबिश के बाद संगठन तेजी से बिखर गए ।तब मनमानी का राज कायम होने लगा।जे एन यू के प्रतिरोध को जिस तरह रौंदकर बदनाम किया गया वह देश में बढ़ते फ़ाज़िज्म की ओर इंगित करता है लेकिन जब तरफ चुप्पी थी उसे तोड़ा जामिया की छात्राओं ने फिर जगह जगह शाहीन बाग पैदा हुए ।
किसान आंदोलन ने जिस तरह गांधी का परचम थामा था वह ना केवल ज़मीन की हिफाज़त के लिए है बल्कि अन्न को कारपोरेट के चंगुल से बचाने के लिए भी है ।वह शिद्दत से किया हुआ सकल समाज के दाने को बचाने का भी अभियान है ।या यूं कहें जन-जन की पेट की भूख से जुड़ा आंदोलन था ।यह आंदोलन भी पूर्णतः गांधीवादी शांति पूर्ण आंदोलन था । बहुत बड़ा है लेकिन महत्वपूर्ण और ज़रूरी भी ।अपने अनेकों साथियों को खोने ताप,शीत,वर्षा और सरकार की यातनाओं के बीच किसान अडिग रहे ।ये ताकत अप्रत्यक्ष रुप से गांधी की है ।वे सच्चे गांधी के उपासक थे,उन्हें विश्वास है उनकी ये ताकत परास्त नहीं होगी । गांधी के देश में वे अपनों से हार जाएं ।असंभव है । सर्वस्व समर्पण का अक्स इन किसानों में नज़र आया इसे नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता ।
आज के दौर में जब चारों ओर गांधी के आदर्शों की चारों ओर अवज्ञा की जा रही है तो देशवासियों को इस राष्ट्रपिता के अपमान के विरोध में सक्रियता बरतनी होगी। गांधी एक ऐसा नाम और उनके अभूतपूर्व हथियार सत्याग्रह का नाम सारी दुनियां में आदर से लिया जाता है। वहीं उनके देश में सत्य और अहिंसा की जगह झूठ और हिंसा लेती जा रही है। उनके भाई चारे के सिद्धांत को बुरी तरह रौंदा जा रहा है।समाजवाद की स्थापना का स्वप्न चकनाचूर किया जा रहा है चंद अमीरों को विश्व में स्थापित करने ना केवल गरीबों को और गरीब बनाया जा रहा है बल्कि देश के सभी संसाधन उन पर कुर्बान किए जा रहे हैं।देश में मनुवादी संविधान की स्थापना के पुरजोर प्रयास जारी हैं। हाल ही में यूजीसी के समान दृष्टिकोण वाले कानून को सुको से रद्द करवा कर ये साफ संकेत दिया गया है कि यहां समभाव की कल्पना अब दिशा स्वप्न है।
लेकिन अच्छी बात ये है अपने ग्यारह वर्षीय शासन में वर्तमान गोडसे सरकार ने जिस तरह गांधी के खिलाफ अभियान चलाया मनरेगा जैसे रोजगार योजना से गांधी नाम हटाया। उससे आम जनता में गांधी का कद और बढ़ा है। देश भर इस सरकार के ख़िलाफ़ जन आंदोलन बढ़ रहे हैं।युवा छात्रों और बेराजगारों में भी बेहद आक्रोश है।प्राय:सभी बड़े विश्व विद्यालयों में ढपली के साथ शांतिपूर्ण विरोध जारी है।यह इंगित करता है गांधी की सरकार से लड़ने की सत्याग्रह और शांति आंदोलन की नीति इस एक बार देश में अपनी ही फासिस्ट सरकार से उबारने में कामयाब होगी।
दिनकर सोनवलकर की उपर्युक्त कविता की कुछ और पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करती हूं–
बहुतों ने उसकी तरफ़ देखा कौतुकता से
और मज़ाक भी उड़ाया उसकी सरलता का
वैसी ही हिकारत से
सात समुंदर पर राज करने वाले /
जहाजों का काफिला
उसे रौंदते हुए गुजर गया
पर पूरे विश्व ने देखा आश्चर्य से
कि उस हिमशैल के चेहरे की बाल सुलभ
मुस्कराहट
ज्यों की त्यों कायम थी।