विनोद कोचर
शुक्रवार 1 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी पहली और आख़िरी बार माउंटबेटन के आग्रह पर कश्मीर गए ।
इससे पहले 1915 में, जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से वापस आए ही थे, कश्मीर के 20 वर्षीय महाराजा हरिसिंह ने गांधीजी को कश्मीर आने के लिए व्यक्तिगत निमंत्रण दिया था। लेकिन 1947 में तो सारा परिदृश्य नाटकीय तरीके से बदल चुका था। अब इस समय महाराज हरिसिंह और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को गांधीजी का दौरा कतई नहीं चाहिए था।
देश की स्वतंत्रता बस, एक पखवाड़े की दूरी पर थी। लेकिन फिर भी अभी तक कश्मीर ने अपना निर्णय घोषित नहीं किया था। माउंटबेटन चाहते थे कि महाराजा हरिसिंह 15 अगस्त से पहले कश्मीर को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय करें। जब माउंटबेटन यह प्रस्ताव लेकर कश्मीर पहुंचे तो महाराजा ने पेट दर्द का बहाना कर उनसे बात नहीं की। हरिसिंह कमल के फूल की आकृति के सुनहरे छत्र के नीचे हीरों से जड़ी हुई पगड़ी पहने गले में एक दर्जन से अधिक महंगे मोतियों की माला पहने जिसके बीचों बीच उनके राजवंश के पन्ना चमक रहा था स्वतंत्र कश्मीर के सुनहरे सपने देख रहे थे।
गाँधीजी जब श्रीनगर पहुँचे तो जनता ने उनके स्वागत में शहर को ऐसे सजाया कि जैसे दीपावली हो। जब गांधीजी रावलपिंडी मार्ग से श्रीनगर आ रहे थे, उस समय चकलाला में बख्शी गुलाम मोहम्मद और ख्वाजा गुलाम मोहम्मद सादिक, इन दोनों नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं ने उन्हें कोहला पुल तक छोड़ा और वापस लाहौर चले गए।
गांधीजी के साथ उनके सचिव प्यारेलाल और दो भतीजियां थीं। श्रीनगर में प्रवेश के बाद गांधीजी सीधे किशोरीलाल सेठी के घर गए। थोड़ा विश्राम करने के बाद उनके दल को सरोवर पर ले जाया गया।
कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की चौथे नम्बर की महारानी तारा देवी सोने के थाल में दूध का गिलास लिए नंगे पाँव गाँधीजी का स्वागत करने पहुँची और कहा कि जब कोई महान संत हमारे यहाँ आता है तो यह परम्परा है कि हम दूध पिलाकर उसका स्वागत करते हैं । लेकिन गाँधी ने कहा- गाँधी उस राजा का दूध स्वीकार नहीं कर सकता जिसकी प्रजा दुखी हो । उन्होंने महाराजा की जगह नेशनल कॉन्फ्रेंस का आतिथ्य स्वीकार किया और बेग़म अकबर जहाँ को साहस और धीरज रखने के लिए कहा । अकबर जहाँ भी महात्मा गाँधी की प्रार्थना सभा में शामिल हुईं । गाँधी और महाराजा में क्या बातचीत हुई यह ठीक ठीक तो कोई नहीं जानता लेकिन इतना तय है कि उन्होंने राजा से जनता की इच्छा का सम्मान करने और शेख़ अब्दुल्ला को रिहा करने की माँग की ।
गांधीजी जानते थे कि हरिसिंह अपने चाटुकारों से घिरे हुए है और वे कोई निर्णय नहीं कर पाएंगे और कश्मीर को अनिर्णय की स्थिति में धकेल देंगे। इसलिए उन्होंने महाराजा हरिसिंह की मनाही के बाद भी कश्मीर की यात्रा की और वहां की जनता पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ा।
Gandhi Darshan – गांधी दर्शन

