अग्नि आलोक

गाँधीजी की अहिंसा का सिद्धांत और आज के समय में उसकी प्रासंगिकता

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निर्मल कुमार शर्मा

आज यह सर्वमान्य तथ्य है कि इस दुनिया से हिंसा की समाप्ति हिंसात्मक तरीका अपनाकर नहीं किया जा सकता । गाँधीजी अपने अहिंसा के सिद्धांत को बहुत सोच-विचारकर ,गहन अध्ययन-मनन करके प्रतिपादित किए थे । जिस महान आत्मा को जिसे आज दुनियाभर में लगभग सभी देशों में जहाँ आतंकवाद , सामाजिक,धार्मिक,वैचारिक और व्यापारिक स्वार्थ की वजह से खून की नदियाँ बह रहीं हैं और उन अनवरत सामूहिक हत्याओं का सिलसिला रूकने का नाम नहीं ले रहा है,वहाँ अन्ततः उन खून-खराबे को रोकने के लिए गाँधीजी और उनकी अहिंसा के सिद्धांत को बड़े ही आदर, शिद्दत और एकमात्र विकल्प के रूप में याद किया जा रहा है,कितने क्षोभ,आत्मग्लानि और राष्ट्रीय शर्म की बात है कि ऐसे ‘अहिंसा के पुजारी ‘महान व्यक्ति की उन्हीं के देश में कुछ ‘तुच्छ मानसिकता के एक छोटे समूह ‘द्वारा एक अत्यंत महत्वहीन छोटे से वैचारिक मतभेद के कारण निर्मम और जघन्यतम् हत्या कर दी गई !


आज अमेरिका जैसा अपने को महाबली मानने की भ्रांति पाले देश भी,विश्व से आतंकवाद रूपी विषबेल को अपनी अपराजेय टैंकों,तोपों, अतिउन्नतिशील किस्म के लड़ाकू विमानों, परमाणु बमों,हाइड्रोजन बमों और नाइट्रोजन बमों,अंतर्महाद्विपीय बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रयोग करके भी नेस्तनाबूद नहीं कर पा रहा है,सीरिया,अफगानिस्तान आदि इसके ताजा-तरीन उदाहरण हैं,ठीक इसके उलट वैश्विक स्तर पर आतंकवाद अपना पैर कैंसर कोशिकाओं जैसे अत्यंत तीव्र गति से फैलाता जा रहा है ! इसका सबसे ज्वलंतशील उदाहरण कभी अफगानिस्तान में उपस्थित सोवियत सेना को गोरिल्ला युद्ध से परेशान करने हेतु उसी के द्वारा बीजारोपित तालिबान आतंकवाद है,जो अफगानिस्तान से सोवियत सेना के लौटने के बाद उसी अमेरिका को तालिबान आतंकवाद के दत्तक पुत्र आईएसआईएस नामक भष्मासुर ने उसी के हवाई जहाजों से,उसी के पाइलटों की मदद से,यात्रियों समेत उसके हृदय स्थल दो व्यापारिक टॉवरों और दुनिया के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी रक्षा मंत्रालय,पेंटागन जैसे अतिसुरक्षित और अभेद्य माने जाने वाले भवन पर भी अतिगोपनीय तरीके से एक साथ चार यात्री हवाई जहाजों से हमलाकर उसे टॉवरों को तो नेस्तनाबूद कर के रख दिया,पेंटागन को भी अच्छा-खासा नुकसान पहुँचाया,जिसके प्रतिशोध में अमेरिका जैसे युद्धपिपासु देश ने इराक पर रासायनिक हथियार रखने का मिथ्यारोपण करके उस समूचे राष्ट्र,उसकी अस्मिता,उसकी समृद्ध संस्कृति,यहाँ तक की उसकी पुरातात्वविक धरोहर प्रसिद्ध बेबीलोन सभ्यता की निशानी संजोकर रखे उसकी राजधानी बगदाद के संग्रहालयों तक को लूटपाटकर तहस-नहस करके रख दिया !
आज इसका कुफल यह रहा कि आईएसआईएस के बिषबीज न्यूजीलैंड,फ्रांस, नीदरलैंड और श्रीलंका तक में अपने आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देकर प्रबुध्द लोगों, सम्पादकों,कार्टूनिस्टों और निरपराध लोगों की सामूहिक नृशंस हत्याएं कर रहे हैं ! अमेरिका को आतंकवाद से परेशान देश अफगानिस्तान से आतंवादियों से डरकर अपने मय लाव-लश्कर के साथ अपने देश लौटना पड़ा है । इसलिए ये जातीय,धार्मिक वैमनस्यता की संकीर्ण सोच से बाहर निकलना ही होगा । ये हिन्दू ,ये मुस्लिम,ये सिक्ख,ये यहूदी,ये ईसाई आदि धर्म सब व्यर्थ की धार्मिक व्यापारियों की दुकानदारी है इनसे मुक्त होना ही होगा,मनुष्यप्रजाति की वास्तविक जाति सिर्फ मनुष्य है और उसका सबसे बड़ा धर्म मनुष्यता और इंसानियत है । आखिर प्रतिशोध, वैमनस्यता,हत्या,बलात्कार आदि अमानवीय अवगुणों से बाहर आकर गाँधीजी के बताए अहिंसा के रास्ते पर चलकर ही इस उथल-पुथल और दुःख से भरी दुनिया के सभी लोगों को सुख ,समृद्धि ,शांति और सूकून की जिन्दगी मिलेगी । यथार्थ यह है कि गाँधीजी की प्रासंगिकता न कभी खतम हुई है,न कभी होगी । कुछ सिरफिरों और पागलों द्वारा भले ही उनकी निर्मम हत्याकर उनके शरीर को नष्ट कर देने मात्र से उस महामानव द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का सिद्धांत को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता ! अपितु वह मानवीय सिद्धांत हमेशा ही अजर-अमर रहेगा ! जब-जब मनुष्यता हिंसा से दग्ध होगी तब-तब गाँधीजी व उनका अहिंसा का सिद्धांत ही मानव कल्याण के लिए सबसे पहले याद किया जायेगा ।

-निर्मल कुमार शर्मा,गाजियाबाद,उप्र.संपर्क-9910629632

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