-हर्ष आनंद
महात्मा गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था, वह केवल अंग्रेज़ों से आज़ादी तक सीमित नहीं था। उनका मानना था कि असली आज़ादी तब होगी जब हर भारतीय आत्मनिर्भर बनेगा, समानता का भाव रखेगा, सहजता से जीएगा और दूसरों के लिए प्रेम और करुणा रखेगा। गांधी का भारत केवल राजनीति का नहीं बल्कि जीवन मूल्यों का भारत था। आज़ादी को 77 साल से ज़्यादा हो चुके हैं, लेकिन जब हम वर्तमान भारत की ओर देखते हैं तो लगता है कि गांधी जी का सपना अभी अधूरा है।

गांधी जी ने “स्वराज” यानी आत्मनिर्भरता की बात की थी। वे चाहते थे कि भारत का हर गाँव अपने लिए अनाज, कपड़ा और रोज़गार पैदा करे। लेकिन आज भारत का गाँव शहर पर और शहर महानगरों पर निर्भर है। मोबाइल से लेकर दवाई और खिलौनों तक, बहुत-सी ज़रूरतें हम दूसरे देशों से पूरी करते हैं। क्या यही स्वराज है? गांधी जी का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश था – सादगी। वे खुद एक साधारण धोती में रहते थे और कहते थे कि असली ताकत सादगी और सच में है। लेकिन आज का समाज दिखावे की दौड़ में उलझा है। सोशल मीडिया पर लोग लाइक और फॉलोवर के लिए झूठा जीवन जीते हैं, उधार लेकर शादी और पार्टियों में शान दिखाते हैं। जबकि गांधी कहते थे जितना सरल जीवन, उतना शांत मन।
गांधी स्वदेशी और हस्तशिल्प के पक्षधर थे। वे चरखा चलाते थे और लोगों से कहते थे कि विदेशी कपड़ों की जगह अपने देश का खादी पहनें। इससे गाँवों को रोज़गार मिलेगा और देश आत्मनिर्भर होगा। लेकिन आज हालत यह है कि हमारे बाज़ार विदेशी ब्रांड और मशीनों से भरे पड़े हैं। गाँव के कारीगर और हस्तशिल्प धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं।
प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भी गांधी जी का दृष्टिकोण साफ़ था। वे मानते थे कि धरती सबकी ज़रूरतें पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं। लेकिन आज नदियाँ प्रदूषण से त्रस्त हैं, भूजल घट रहा है और जंगल काटे जा रहे हैं। प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता लालच का बन गया है, देखभाल का नहीं।
गांधी जी समानता में विश्वास रखते थे। वे कहते थे कि जाति, धर्म, लिंग या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। लेकिन आज़ाद भारत में जातिवाद और क्षेत्रवाद दोनों बढ़ते जा रहे हैं। लोग भाषा और धर्म को लेकर झगड़ रहे हैं। महिलाएँ शिक्षा और नौकरी में आगे तो बढ़ रही हैं, लेकिन उनके साथ हिंसा और असमानता की घटनाएँ अभी भी कम नहीं हुईं। गांधी का सपना था कि भारत में महिला और पुरुष दोनों कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों, लेकिन आज भी यह सपना अधूरा है।
शिक्षा को गांधी ने बहुत महत्व दिया था। उनका कहना था कि शिक्षा से ही इंसान का असली विकास होता है। लेकिन आज हमारे देश में शिक्षा और रोजगार की हालत चिंताजनक है। सरकारी परीक्षाओं में गड़बड़ियों और देरी के कारण छात्र सड़कों पर उतरते हैं। हाल ही में SSC और अन्य परीक्षाओं को लेकर बड़े विरोध हुए, जिनमें छात्रों को आवाज़ उठाने पर जेल तक भेज दिया गया। पत्रकारों और कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबाई जा रही है।
गांधीजी ने हमेशा संगठन, सहकारिता और जनता की भागीदारी पर ज़ोर दिया। उनका विश्वास था कि समाज को जोड़ने का कार्य राजनीति का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए, न कि उसे बाँटने का। लेकिन आज स्थिति कुछ अलग है। राजनीतिक विमर्श अब तर्क और नैतिक मूल्यों पर नहीं, बल्कि पुराने दोषों के आधार पर वर्तमान को सही ठहराने की कोशिशों पर आधारित होता जा रहा है। यह सोच खतरनाक है कि यदि अतीत में कुछ ग़लत हुआ था, तो आज भी उसी प्रकार की ग़लती को अनदेखा किया जा सकता है। सच तो यह है कि जो ग़लत है, वह ग़लत ही रहेगा , चाहे वह किसी भी काल में हुआ हो, और चाहे उसे कोई भी करे। जनता की आवाज़ दबाना सर्वथा ग़लत है। नैतिकता का मूल्य समय और सत्ता के हिसाब से नहीं बदलता। समाज को चाहिए कि वह इतिहास से सबक लेकर आज के समय में भी न्याय, स्वतंत्रता और सह-अस्तित्व की रक्षा करे। विचारधारा चाहे जो भी हो, गलती को गलती कहना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।
गांधी का सबसे बड़ा संदेश था – अहिंसा और सत्य लेकिन आज हम देख रहे हैं कि धर्म और राजनीति के नाम पर नफ़रत फैल रही है। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और झूठा प्रचार आम बात हो गई है। गांधी आध्यात्मिक जीवन की बात करते थे, लेकिन आज “आध्यात्म” भी एक बाज़ार बन गया है।
स्वच्छता और नैतिकता गांधी के जीवन का हिस्सा थे। वे खुद सफाई करते थे और लोगों को संदेश देते थे कि सफाई केवल सड़कों की नहीं, मन और समाज की भी ज़रूरी है। लेकिन आज हाल यह है कि हम सड़कों को गंदा करते हैं। नैतिकता की हालत तो और भी खराब है, नेता और अफसर रिश्वत में डूबे हैं और समाज झूठ–सच का फर्क भूल चुका है।
गांधी का भारत सादगी, समानता, स्वदेशी, स्वराज और सत्य पर आधारित था। आज का भारत तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन दिशा वही है या नहीं – यह बड़ा सवाल है। अगर आज गांधी होते तो शायद कहते – “देश को बनाने के लिए केवल GDP और विकास दर काफी नहीं है, इंसानियत, समानता और सत्य भी उतने ही ज़रूरी हैं।”
इसलिए ज़रूरत है कि हम गांधी जी को केवल किताबों में न पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें। क्योंकि देश पार्टी या नेता से बड़ा है, और भारत तभी मजबूत होगा जब हर भारतीय मजबूत और जागरूक होगा।
लेखक: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्नातक के छात्र हैं।
| ReplyReply to allForwardAdd reaction |