डॉ. प्रिया
_चार पुरूषार्थ हैं : धर्म, अर्थ, काम और ‘मोक्ष’। यानी काम भी एक पुरूषार्थ है जीवन साधना का।_
जहां-तहां, जब-तब, जिस-तिस से, जैसे-तैसे सैक्स कर लेना काम नहीं है। यह निरी पशुता है। यांत्रिकता है। जड़ता है।
_विशुद्ध ‘प्रेम’ आधारित घंटे-डेढ़ घंटे के मिक्स-अप के बजाए, चंद मिनट में स्खलित होकर ढीला हो जाना भी काम नहीं है। यह शीघ्र-पतन है। नपुंसकता है।_
यहां प्रस्तुत है ‘सुदीर्घ’ कालीन आर्गॉज्मिक तृप्ति से, अद्वैत यानी परम-तृप्ति की अनुभूति कराने वाली संभोग-क्रिया की एक विधि।
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*सूत्र :*
_काम-क्रियाओं के दौरान उसकी ‘आरंभिक अग्नि’ पर ध्यान दें, और ऐसा करते हुए ‘अंत में उसके अंगारे’ से बचें।‘_
काम- कृत्य गहन परि-तृप्ति बन सकता है। वह आपकी अखंडता पर, स्वाभाविक और प्रामाणिक जीवन पर परमानंद के रूप- में वापस पहुंचा सकता है।
काम कृत्य समग्र कृत्य है। इसमें अपने मन से बिलकुल अलग हो जाते हो। छूट जाते हो। पर इसके लिए ‘सुदीर्घ’ प्रक्रिया अहम होती है, जो अमूमन परवान ‘नहीं’ चढ़ती। यही कारण है कि चेतन/नेक इंसान को कामवासना से इतना डर लगता है।
*आपका तादात्म्य मन के साथ है और काम ‘अ-मन’ का, ‘मन-न’ का कृत्य है। उस कृत्य में उतरते ही बुद्धि-विहीन हो जाते हो। उसमे बुद्धि काम नहीं करती।*
उसमे तर्क की जगह नहीं है। कोई मानसिक प्रक्रिया नहीं है। अगर मानसिक प्रक्रिया चलती है तो काम कृत्य सच्चा और प्रामाणिक नहीं हो सकता। तब आर्गाज्म संभव नहीं है। गहन परितृप्ति संभव नहीं है।
तब काम-कृत्य उथला हो जाता है। संभोग मानसिक/यांत्रिक/पाशविक कृत्य हो जाता है। ऐसा ही हो गया है।
सारी दुनिया में कामवासना की इतनी दौड़ है, काम की इतनी खोज है, उसका कारण यह नहीं है कि दुनिया ज्यादा कामुक हो गई है।
कारण इतना ही है कि *आप काम-कृत्य को उसकी समग्रता में नहीं भोग पाते हो।* यह दौड़ बताती है कि सच्चा काम खो गया है। उसकी जगह नकली काम हावी हो गया है।
सारा आधुनिक चित कामुक हो गया है, क्योंकि काम कृत्य ही खो गया है। काम कृत्य भी मानसिक/यांत्रिक कृत्य बन गया है। काम मन में चलता रहता है और आप उसके संबंध में सोचते रहते हो।
लोग काम के संबंध में सोच-विचार करते हैं, पढ़ते हैं, अश्लील चित्र देखते हैं, पोर्न देखते हैं, चंद मिनट का अंदर-बाहर – बस। वही उनका कामानंद है, सेक्स का शिखर अनुभव है।
जब काम का असली क्षण आता है तो उन्हें अचानक पता चलता है कि उसमे उनकी रूचि नहीं है। वे उसमे अपने को नपुंसक अनुभव करते हैं।
सोच-विचार के क्षण में ही उन्हें काम- उर्जा का एहसास होता है। लेकिन जब वे कृत्य में उतरना चाहते हैं तो उन्हें पता चलता है कि उसके लिए उनके पास ऊर्जा नहीं है। तब उन्हें कामवासना का भी पता नहीं चलता है। उन्हें लगता है कि उनका शरीर मुर्दा हो गया है।
उन्हें क्या हो गया है?
यही हो रहा है कि उनका काम-कृत्य भी मानसिक/यांत्रिक हो गया है। वे इसके बारे में सिर्फ सोच विचार कर सकते हैं। वे कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि कृत्य में तो पूरे का पूरा जाना पड़ता है। और जब भी पूरे होकर कृत्य में संलग्न होने की बात उठती है तब मन बेचैन हो जाता है। क्योंकि तब मन मालिक नहीं रह सकता, तब मन नियंत्रण नहीं कर सकता।
*आध्यात्मिक काम-कृत्य आपको अखंड बनाने के लिए उपयोग में लाता है। इसमे बहुत ध्यानपूर्वक उतरना होगा। तब काम के संबंध में वह सब भूल जाना होगा जो सुना है, पढ़ा है, जो समाज ने, संगठित धर्मों ने, धर्म गुरूओं ने सिखाया है।*
सब कुछ भूल जाओ। समग्रता से इसमे उतरो। भूल जाओ कि नियंत्रण करना है। नियंत्रण ही बाधा है। उचित है कि उस पर नियंत्रण करने की बजाय अपने को उसके हाथों में छोड़ दो। खुद उसके बस में हो जाओ। संभोग में पागल की तरह जाओ।
अ-मन की अवस्था पागलपन जैसी मालूम पड़ती है। शरीर ही बन जाओ। एक जान- एक जिस्म बन जाओ।
जैसा आम आधुनिक मनुष्य है, उसे पूर्ण बनाने की सबसे सरल संभावना केवल काम में है। सेक्स में है, क्योंकि *काम हमारे भीतर गहन जैविक केंद्र है। आप उससे ही उत्पन्न हुए हो। आपकी प्रत्येक कोशिका काम-कोशिका है। समस्त शरीर काम-उर्जा की घटना है।*
अमूमन आपके लिए काम-कृत्य, संभोग महज राहत का, अपने को तनाव-मुक्त करने का उपाय होता है। इसलिए जब संभोग में उतरते हो तो बहुत जल्दी रहती है। किसी तरह छुटकारा चाहते हो। छुटकारा यह कि जो ऊर्जा का अतिरेक आपको पीडित किए है, वह निकल जाए और आप चैन का अनुभव करो। *लेकिन -*
यह चैन एक तरह की दुर्बलता है। ऊर्जा की अधिकता तनाव पैदा करती है। उतैजना पैदा करती है। और लगता है कि उसे फेंकना जरूरी है। जब वह ऊर्जा बह जाती है तो कमजोरी अनुभव करते हो। और उसी कमजोरी को विश्राम मान लेते हो। क्योंकि ऊर्जा की बाढ़ समाप्त हो गई उत्तैजना जाती रही, इसलिए विश्राम मालूम पड़ता है।
लेकिन यह क्षणिक विश्राम नकारात्मक/पलायनवादी/कायरतापूर्ण विश्राम है। अगर सिर्फ ऊर्जा को बाहर फेंककर विश्राम प्राप्त करते हो तो यह विश्राम बहुत महंगा है। यह सिर्फ शारीरिक विश्राम होगा। वह गहरा नहीं होगा। वह आध्यात्मिक नहीं होगा।
जल्दबाजी मत करो। अंत के लिए उतावले मत बनो। आरंभ में बने रहो।
*काम-कृत्य के दो भाग है:*
आरंभ और अंत।
आरंभ के साथ रहो। आरंभ का भाग ज्यादा विश्राम पूर्ण है। ज्यादा उष्ण है। अंत पर पहुंचने की जल्दी मत करो। अंत को बिलकुल भूल जाओ।
तीन संभावनाएं हैं:
दो प्रेमी प्रेम में तीन आकार, ज्यामितिक आकार निर्मित कर सकते है। शायद आपने इसके बारे में पढ़ा भी होगा। या कोई पुरानी कीमिया, की तस्वीर भी देखो : जिसमें एक स्त्री और एक पुरूष तीन ज्यामितिक आकारों में नग्न खड़े हैं।
एक आकार चतुर्भुज है, दूसरा त्रिभुज है, और तीसरा वर्तुल है। यक अल्केमी और तंत्र की भाषा में काम क्रोध का बहुत पुराना विश्लेषण है।
*इसे क्रमश: समझें-*
(१)-
जब संभोग में होते हो तो वहां दो नहीं, चार व्यक्ति होते हैं। वही है चतुर्भुज। उसमे चार कोने हैं, क्योंकि आप दो हिस्सों में बंटे हो। एक हिस्सा विचार करने वाला है और दूसरा हिस्सा भावुक हिस्सा है। वैसे ही आपका साथी भी दो हिस्सों में बंटा है। यहां चार व्यक्ति हो दो नहीं। चार व्यक्ति प्रेम कर रहे हैं। यह एक भीड़ है, और इसमें वस्तुत: प्रगाढ़ मिलन की संभावना नहीं है।
इस मिलन के चार कोने हैं और मिलन झूठा है। वह मिलन जैसा मालूम होता है, लेकिन मिलन है नहीं। इसमें प्रगाढ़ मिलन की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि- आपका गहन भाग दबा पडा है। केवल दो सिर, दो विचार की प्रक्रियाएं मिल रही हैं। भाव की प्रक्रियाएं अनुपस्थित हैं।
(२)-
दूसरी कोटि काम मिलन त्रिभुज जैसा होगा। तुम दो हो, आधार के कोने और किसी क्षण अचानक तुम दोनों एक हो जाते हो—त्रिभुज के तीसरे कोने की तरह। किसी आकस्मिक क्षण में तुम्हारी दुई मिट जाती है। और तुम एक हो जाते है। यह मिलन चतुर्भुजी मिलन से बेहतर है। क्योंकि कम से कम एक क्षण के लिए ही सही , एकता सध जाती है। वह एकता तुम्हें स्वास्थ्य देती है। शक्ति देती है। तुम फिर युवा और जीवंत अनुभव करते हो।
(३)-
तीसरा मिलन सर्वश्रेष्ठ है। यह आध्यात्मिक मिलन है। इसमें आप एक वर्तुल हो जाते हो। इसमें कोने नहीं रहते। यह मिलन क्षण भर के लिए नहीं है, वस्तुत: यह मिलन समयातित है।
उसमें समय नहीं रहता। यह मिलन तभी संभव है जब आप स्खलन/डिस्चार्ज नहीं खोजते हो। अगर स्खलन खोजते हो तो फिर यह त्रिभुजीय मिलन हो जाएगा। क्योंकि-
स्खलन होते ही संपर्क का बिंदु मिलन का बिंदु खो जाता है।
आरंभ के साथ रहो, अंत की फिक्र मत करो। इस आरंभ में कैसे रहा जाए?
इस संबंध में कु़छ बातें ख्याल में लेने जैसी हैं।
पहली बात कि काम कृत्य को कहीं जाने का, पहुंचने का माध्यम मत बनाओ। संभोग को साधन की तरह मत लो, वह आपने आप में साध्य है। उसका कहीं लक्ष्य नहीं है, वह साधन नहीं है।
दूसरी बात कि भविष्य की चिंता मत लो, वर्तमान में रहो। अगर संभोग के आरंभिक भाग में वर्तमान में नहीं रह सकते, तब कभी वर्तमान में नहीं रह सकते। क्योंकि वास्तविक काम कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि आप वर्तमान में फेंक दिए जाते हो।
तो वर्तमान में रहो। दो शरीरों के मिलन का सुखा लो, दो आत्माओं के मिलने का आनंद लो। और एक दूसरे में खो जाओ। एक हो जाओ। भूल जाओ कि कहीं जाना है, कु़छ करना है, कु़छ और भी जीना है। वर्तमान क्षण में टोटली जीओ, जहां से कहीं जाना नहीं है। एक दूसरे से मिलकर एक हो जाओ।
*उष्णता और प्रेम वह स्थिति बनाते है जिसमें दो व्यक्ति एक दूसरे में पिघलकर खो जाते हैं। यही कारण है कि यदि प्रेम न हो तो संभोग जल्दबाजी का काम हो जाता है।* तब आप दूसरे का उपयोग कर रहे हो। दूसरे में डूब नहीं रहे हो। प्रेम के साथ ही आप दूसरे में डूबकर अद्वैत बन सकते हो।
यह एक दूसरे में डूब जाना अनेक अंतदृष्टियां प्रदान करता है। अगर संभोग को समाप्त करने की जल्दी नहीं करते हो तो काम-कृत्य धीरे-धीरे कामुक कम और आध्यात्मिक ज्यादा हो जाता है।
जननेंद्रियों भी एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं। तब दो शरीर ऊर्जाओं के बीच एक गहन मौन मिलन घटित होता है।
तब आप घंटों साथ रह सकते हो। यह सहवास समय के साथ-साथ गहराता जाता है। लेकिन सोच-विचार मत करो, वर्तमान क्षण में प्रगाढ़ रूप से विलीन होकर रहो। वही समाधि बन जाती है।
अगर इसे जान सके, इसे अनुभव कर सके, इसे उपलब्ध कर सके तो आपका कामुक चित अकामुक हो जाएगा। एक गहन ब्रह्मचर्य (ब्रह्मा में विचरण) उपलब्ध हो सकता है। जी हां, इस काम से ब्रह्मचर्य की अवस्था उपलब्ध हो सकती है।
*अगर आपकी प्रेमिका/ आपका प्रेमी* (पति-पत्नी अगर प्रेमी-प्रेमिका ‘नहीं’ हैं तो उनके वस का कु़छ नहीं) *मिलन के अंत की फिक्र किए बिना लंबा चल सके* तो आप आरंभ में ही बने रहे सकते हो।
उत्तैजना ऊर्जा है और शिखर पर जाकर आप उसे खो सकते हो। ऊर्जा के खोने से गिरावट आती है। कमजोरी पैदा होती है। उसे विश्राम समझ सकते हो। लेकिन वह उर्जा का अभाव है, पतन है, शीघ्र-पतन।
*अध्यात्मिक संभोग उच्चतर विश्राम का आयाम प्रदान करता है। प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे में विलीन होकर एक दूसरे को शक्ति प्रदान करते हैं। तब वे एक वर्तुल बन जाते हैं। उनकी ऊर्जा वर्तुल में घूमने लगती है। वह दोनों एक दूसरे को जीवन ऊर्जा दे रहे हैं। नव जीवन दे रहे हैं। इसमे ऊर्जा का ह्रास नहीं होता है। वरन उसकी वृद्धि होती है।*
क्योंकि-
विपरीत यौन के साथ संपर्क के द्वारा आपका प्रत्येक कोश ऊर्जा से भर जाता है। उसे चुनौती मिलती हेै।
यदि स्खलन न हो, यदि ऊर्जा को फेंका न जाए तो संभोग ध्यान बन जाता है। आप पूर्ण हो जाते हो। इसके द्वारा आपका विभाजित व्यक्तित्व अविभाजित हो जाता है। अखंड हो जाता है।
चित की सब रूग्णता इस विभाजन से ही पैदा होती है। जब आप जुड़ते हो, अखंड होते हो तो फिर बच्चे हो जाते हो। निर्दोष हो जाते हो।
एक बार अगर इस निर्दोषता का उपलब्ध हो गए तो फिर अपने समाज में उसकी जरूरत के अनुसार जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो। तब यह व्यवहार महज अभिनय होगा,उससे ग्रस्त नहीं होगे। तब यह एक जरूरत है जिसे पूरा कर रहे हो। तब आप उसमे नहीं हो। मात्र एक अभिनय कर रहे हो।
*‘’काम-आलिंगन के आरंभ में उसकी आरंभिक अग्नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’*
यह स्टैमिना चेतना के विकास से सहज सुलभ हो जाती है। होशपूर्वक गति, सजगता पूर्वक संचलन यानी ध्यान चेतना के विकास का आधार बनता है।
*याद रखें-*
अगर असमय स्खलन होता है तो दोनों की ऊर्जा बढ़ने के बजाए, नष्ट होती है। स्त्री को तो यौनानंद का अहसास तक नहीं होता, अनुभव तो बहुत दूर की बात है।
ऐसे में यह स्पस्ट हो जाता है कि आपमें अग्नि नहीं है। आप राख सावित होते हो। आप कुछ प्राप्त किए बिना ऊर्जा खो देते हो।
_यह विधि गुरू के संरक्षण में, उसकी ऊर्जा ओब्ज़ार्व करते हुए केवल 15 दिन में सीखी जा सकती है. ध्यान की यह विधि सीखकर एक घंटे तक वीर्य को डिस्चार्ज होने से रोका जा सकता है. कितनी भी हॉट स्त्री हो 40-45 मिनट में ही पूरी तरह गरम होकर, पिघलकर, निचुड़कर परम तृप्ति के सुख में बेसुध हो जाती है._
हम कपल्स के लिए निःशुल्क सुलभ है.

