देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अशफाक उल्ला खान जंग-ए-आजादी के महानायक थे। हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन के अमर फ़ौजी, काकोरी कांड के शहीद अशफाक शहीद बिस्मिल के अनन्य मित्र और हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतिक पुरुष थे।
19 दिसंबर, 1927 को जालिम अंग्रेजों ने चार नौजवान क्रांतिकारियो में से तीन – राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी तथा 17 दिसंबर को रोशन सिंह को फांसी पर लटका दिया था। काकोरी के शहीदों के महत्वपूर्ण होने की एक वजह यह थी कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान अंग्रेज जो फूट डालो और राज करो की नीति अपना रहे थे और लगातार जो तमाम संप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश कर रहे थे, इन शहीदों ने अंग्रेजों की इन सभी नीतियों को नाकाम करते हुए हिंदू और मुस्लिम एकता स्थापित को स्थापित किया।
चौरी-चौरा कांड के बाद जब गाँधी जी ने असयोग आंदोलन वापस ले लिया था, तब हजारों की संख्या में युवा क्रन्तिकारी इस धोखे अचंभित हो गए। अशफ़ाक उल्ला खां उन्हीं में से एक थे। असहयोग आन्दोलन के धोखे से सचेत युवाओं ने क्रन्तिकारी संगठनों के साथ मिलकर क्रान्तिकारी दल ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ का गठन किया। अशफ़ाक़ इस दल के सिपाही बने।
अपनी भावनाओं का इजहार करते हुए अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने लिखा था कि- जमीं दुश्मन, जमां दुश्मन, जो अपने थे पराये हैं, सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले परेशाँ की।
आज जब देश में साम्प्रदायिक उन्माद शीर्ष पर है, तब काकोरी के इन शहीदों को याद करने की ज़रूरत और ज्यादा हो गई है।
*”बहुत ही जल्द टूटेंगी गुलामी की ये जंजीरें, किसी दिन देखना आजाद ये हिन्दोस्ताँ होगा।”*
*साभार- इंक़लाबी विचार मंच IVM*
“दिलवाओ हमें फाँसी, ऐलान से कहते हैं, खूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे !” – अशफ़ाक़

