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*जीजी पारीखः वह समाजवाद के दीये को जलाए रखने की कोशिश में थे*

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जीजी नर्मदा आंदोलन से लेकर उन तमाम आंदोलनों को मदद देते रहे जो वैचारिक रूप से समाजवादी विचारों के करीब हैें। उन्होंने मुंबई के दंगों से लेकर भुज के भूकंप के पीड़ितों को मदद जैसे कार्यक्रमों में सक्रियता से हिस्सा लिया है।  इस दौर में जीजी की वैचारिक स्थिरता की चर्चा भी जरूरी है। लोग लिबास की तरह पार्टी बदलते रहे हैं। जीजी पर्यावरण से लोकतंत्र तथा सेकुलरिज्म के पक्ष में चलने वाले अनगिनत अभियानों में लगे रहते थे। आरएसएस तथा भाजपा के नेतृत्व में चल रहे सांप्रदायिकता और तानाशाही के इस दौर में वह समाजवाद के दीये को जलाए रखने की कोशिश में थे।

अनिल सिन्हा 

मुंबई के बुजुर्ग समाजवादी डा. जीजी पारीख नहीं  रहे। उन्होंने जीवन के सौ  साल पूरे कर लिए थे। उनके निधन की खबर आयी तो ख्याल आया कि 17 साल के थे तो आजादी  के आंदोलन में पहली बार जेल गए। फिर तो जेल  जाने  का सिलसिला ही चल पड़ा। 1942 के आंदोलन के दौरान भी पकड़े गए। उनके जेल जाने की याद इसलिये आ रही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ साल होने पर लोग पूछ रहे हैं कि उसने किस आजादी के आंदोलन में हिस्सा  लिया था। लोग चिराग लेकर ढूंढ  रहे हैं  कि कोई जेल भी गया था।
जीजी समाजवादी आंदोलन की उस पीढ़ी से थे, जिसने आजादी की लड़ाई में बहादुरी की मिसाल कायम  की। मुंबई  में तो एक बड़ी फौज ही थी। अशोक मेहता, यूसुफ मेहर अली, केशव गोरे, मृणाल गोरे, मधु लिमये, मधु दंडवते। एक लंबी सूची है। जीजी समाजवादी आंदोलन के इस गौरवशाली इतिहास के हिस्सा थे।

उन्हें नहीं जानने वालों को ज़रूर अचरज होगा कि मुंबई की आपाधापी वाली जिंदगी मेें किसी शख्स ने शतक बना लिया है। इसकी वजह सहजता से जीने की उनकी शैली। इसका मतलब यह नहीं था कि उथल-पुथल के सामने वह खामोशी से बैठ जाते हैं। जीजी की सक्रियता कभी कम नहीं इुई और भारतीय राजनीति के चुनौती भरे दौर हों या ठहरी हुई राजनीति के, वह सक्रिय रहे।
 
साठ के दशक में मुंबई के समाजवादियों में दो गुट साफ दिखाई देते थे। उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार कम हो रहा था। लेकिन पुरानी गोलबंदी चल रही थी। एक गुट लोहियावादियों का था जिसके नेता जार्ज फर्नांडीस थे और दूसरा गुट प्रजा समाजवादियों का था जिन्हें लोग पीएसपी वाले कहते थे। उनके नेता मधु दंडवते थे। जीजी दंडवते के काफी करीबी थे। जनता पार्टी और बाद में जनता दल में समाजवादियों के दोनों वैचारिक धड़े साथ रहे, लेकिन सोशलिस्ट पार्टी के अतीत के विभाजन को वे लोग भूल नहीं पाए। यह उनकी सोच में झलके या नहीं, उनकी पहचान में दिखाई देता था।

जार्ज के भाजपा के करीब चले जाने से मुंबई के समाजवादियों को वैचारिक कठिनाइयों का सामना कर पड़ा है। लेकिन महाराष्ट्र के समाजवादियों में आरएसएस की राजनीति को लेेकर व्यापक विरोध रहा है। गैर-कांग्रेसवाद की वजह से जनसंघ के साथ जाने के बाद भी सांप्रदायिकता विरोधी संगठनों जिसमेें वामपंथी और आंबेडकरवादी संगठनों के वे ज्यादा करीब रहे हैं। मधु लिमये, एसएम जोशी और मृृणाल गोरे आदि तो सांप्रदायिकता के खिलाफ जमकर लड़ते रहे। जीजी के राजनीतिक-सामाजिक कार्यों मेें भी धर्मनिरपेक्षता एक महत्वपूर्ण तत्व रहा है। वेैसे भी, उनके राजनीतिक विचारों पर प्रसिद्ध समाजवादी यूसुफ मेहरअली का काफी प्रभाव था। मेहरअली ने ही ‘साइमन गोबैक’ और ‘भारत छोड़ो’ जैसे ऐतिहासिक नारे ही नहीं दिए हैं, बल्कि वह मुस्लिम लीग के दो राष्ट्र के सिद्धांत के खिलाफ जम कर लड़े। जीजी समाजवादी आंदोलन के जीवित इतिहास थे।

जीजी बातों-बातों में इस इतिहास को बताते रहते हैं। खुद के बारे में बताते हैं कि अभी महाराष्ट्र-गुजरात सीमा पर बसे तारापुर (उस समय ये इलाके बंबई प्रेसिडेंसी में आते थे) से जब वह पढ़ने के लिए सौराष्ट्र गए तभी आजादी के आंदोलन से उनका परिचय हो गया। उनके रिश्तेदारों में कई इस आंदोलन से गहरे जुड़े थे। फिर कालेज की पढ़ाई के लिए बंबई आए तो इसमें कूद पडे़। आज हम तीस के दशक में देश के उबलते माहौल का अंदाजा नहीं लगा सकते। गांधी जी आजादी की लड़ाई को ऐसी आजादी में बदल चुके थे, जिसमें अंग्रेजों को विदा करना अकेला लक्ष्य नहीं था। भारत को अपनी जड़ हो चुकी गैर-बराबरी वाली सामाजिक व्यवस्था से भी मुक्ति पानी थी। यह देश खुद को खोज रहा था और नई दुनिया बनाने के सपने देख रहा था। जाहिर है कि किशोर जीजी पर इसका असर पड़ा।

तीस के दशक में कम्युनिज्म और सोशलिज्म के दर्शन भारत के युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रहे थे। स्वतंत्रता, समानता और सेकुलरिज्म के विचारों पर आधारित समाज बनाने को लेकर एक वैचारिक मंथन जारी था। वे लोग जो कांग्रेस की लोगोें की व्यापक भागीदारी वाली राजनीति का हिस्सा बने रहना चाहते थे; गांधी के नेतृत्व में आजादी का आंदोलन लड़ना था, लेकिन पुराने समाज की जगह नया समाज बनाना था और इस नए समाज को लोकतंत्र, समानता और सेकुलरिज्म के विचारों पर आधारित रखना चाहते थे। कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन ऐसे ही लोगों ने किया था। जीजी का झुकाव इन्ही विचारों की ओर हुआ।
 
साल 1942 के ‘भारत छोड़ो’ या अगस्त क्रांति के आंदोलन में मुंबई ने अहम भूमिका निभाई है। मुंबई को सिर्फ आल इंडिया कांग्रेस कमिटी का मेजबान बनने का ही सौभाग्य ही नहीं मिला बल्कि इसका एक मुख्य केंद्र बनने, सरकार को सीधी चुनौती देे कर तिरंगा झंडा लहराने और भूमिगत रेडियो चलाने जैसी घटनाओं का गवाह बनने का अवसर भी इस शहर को मिला। जीजी उन दिनों कालेज की पढ़ाई कर रहे थे।
‘‘मैं आल इंडिया कांग्रेस कमिटी की बैठक के समय, नौ अगस्त को कस्तूरबा गांधी के नेतृत्व में प्रदर्शन और अरूणा आसफ अली का ग्वालिया टैंक में झंडा फहराने के मौकोें पर मौजूद था,’’ जीजी बताते थे।
ग्वालिया टैंक में हो रही कांग्रेस की बैठक के बारे में प्रसिद्ध समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपने संस्मरण में विस्तार से लिखा है और उससे तत्कालीन माहौल का पता चलता है। लिमये ने बताया है कि लोगों की भारी भीड़ पंडाल के बाहर किस उत्सुकता से आल इंडिया कमेेटी के फैसले का इंतजार कर रही थी। उन्होंने लिखा है कि किस तरह गांधी जी ने जब भारत छोड़ो प्रस्ताव पर अपना भाषण दिया तो उनके शब्द दिल में उतरते गए और लोगों में एक जबर्दस्त उत्साह और ऊर्जा का संचार हो रहा था।  

इसमें कोई शक नहीं कि ‘भारत छोड़ो’ का आंदोलन असली में समाजवादियों ने ही चलाया। कांग्रेस के ज्यादातर नेता जेल चले गए थे। समाजवादी भूमिगत रह गए थे। सन् बयालीस के किस्से सालों तक मुबई की लोक कथाओं के हिस्सा थे। इसके कई किरदार जिनमें जीजी भी शामिल थे, लंबे समय तक यहां की राजनीति मेें अहम भूमिका निभाते रहे। भूमिगत रेडियो का संचालन करने वाली डा. ऊषा मेहता का नाम इनमें सबसे ऊपर है। वह दलीय राजनीति मेें नहीं रहीं और गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम में लगी रहीं। उनकी नैतिक उपस्थिति बंबई को अलग बनाती थी।

लेकिन ‘भारत छोड़ो’ के सबसे चमकते सितारे और प्रसिद्ध समाजवादी नेता यूसुफ मेहरअली ने काफी अरसा पहले विदा ले ली थी। मेहरअली 1942 में बंबई महानगरपालिका के चेयरमैन थे और कांग्रेस कमिटी की बैठक का सारा इंतजाम उनके हाथों में था। यूसुफ मेहर अली का दिया ‘भारत छोड़ो’  का नारा गांधी जी को पहली ही बार में जंच गया था।  
मेहरअली ने जीजी सरीखे बंबई के हजारों छात्रों-नौजवानों को प्रेरित किया। जीजी बताते थे कि किस तरह छात्रोें ने कालेज-स्कूल बंद करा दिए। चर्चगेट तक जुलूस निकला। 11 दिसंबर 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जीजी पर मेहर अली का प्रभाव बहुत गहरा था और बाद में रचनात्मक कामों के लिए उन्होंने पनवेल के आदिवासी क्षेत्र में उनके नाम पर केंद्र भी बनाया है जो शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यक्रम चला रहा है।

कांग्रेस समाजवादी पार्टी से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले जीजी सोशलिस्ट पार्टी की तमाम राजनीतिक यात्राओं के सहभागी रहे। वैसे मुंबई समाजवादियों के वैचारिक विवादों और आपसी विभाजन के साथ-साथ उनकी नेतृत्व में चलने वाले ट्रेड यूनियन आंदोलनों और रचनात्मक कार्यक्रमों का भी केंद्र रहा है। हिंद मजदूर सभा का एक बड़ा  केंद्र रहा है। जीजी का जुड़ाव हिंद मजदूर सभा और रचनात्मक कार्यक्रमों से रहा है।

आजादी के बाद के दौर में आरएसएस और जनसंघ की कोई हैसियत नहीं थी। सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट नई दुनिया बनाने के लिए लड़ रहे थे। वे ही व्यवस्था से लोहा ले रहे थे। जनमानस में भी उन्हीं का प्रभाव था। समाज में यथास्थिति बनाए रखने या इसे धीरे-धीरे बदलने वाले कांग्रस के साथ थे।  हिंदुत्व अपनी ताकत बनाने की कोशिश में ज़रूर लगा था, लेकिन कमोबेश बेअसर ही था। मुंबई के राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक माहौल पर भी वामपंथियों, समाजवादियों तथा कम्युनिस्टों का वर्चस्व था। जीजी ने एक सक्रिय भागीदार के रूप में मुंबई के उस दिलचस्प राजनीतिक दौर को जिया है।

आज के घोर राजनीतिक पतन वाले दौर में उस समय के  माहौल की कल्पना नहीं की जा सकती है। छोटे मकानोें में कम्यून की तरह रहना और दुनिया बदलने के संघर्ष में जुटे रहना। जिंदगी की इस रवानगी को आज महसूस नहीं किया जा सकता है। जीजी को ही देख लीजिए। बंबई के बडे़ से बड़े अमीर घराने से परिचय और हर बड़े राजनीतिज्ञ को व्यक्तिगत जानने के बाद भी उन्होंने अपना खर्च डाक्टरी से चलाया। उनकी क्लिनिक अच्छी चलती थी। उन्होंने बहुत उम्र हो जाने के बाद ही क्लिनिक में बैठना बंद किया। उनके समय में डाक्टरी पैसा लूटने का माध्यम बनने लगा था।  क्या पैसा लूटने के माध्यम बनते जा रही डाक्टरी के दौर उस में मरीज की तकलीफ समझने वाले एक कोमल हृदय डाक्टर की उपस्थिति कोई साधारण बात है? इस कोमलता और करूणा का स्रोत उनके समाजवादी विचारों में था। वह उपभोक्तावाद की गिरफ्त में आ रहे डाक्टरी के पेशे को उससे मुक्त रखने की लड़ाई लड़ रहे थे।    

1974 का जयप्रकाश नारायण का आंदोलन हुआ तो उन्होंने जम कर हिस्सा लिया और इमरजेंसी लगी तो पूरे परिवार के साथ जेल चले गए। बाद में, जनता पार्टी के दौर में उनकी पत्नी मंगला पारिख विधायक भी बनीं। जब वीपी सिंह का आंदोलन चला तो वह उसमें भी सक्रिय रहे और सिंह के नेतृत्व में जनता दल बना तो वह कुछ समय तक मुंबई जनता दल के प्रमुख रहे।
जीजी की वैचारिक यात्रा पर भी गौर करना चाहिए। मुंबई को छोड़ कर शायद ही कोई जगह हो जहां समाजवादियों को रचनात्मक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते देखा जा सके। इन रचनात्मक कार्यक्रमोें की शुरुआत उन दिनोें हुई जब अशोक मेहता जैसे नेता मुंबई के ट्रेड यूनियन आंदोलन का नेतृत्व करते थे। उन्होंने मजदूरोें के लिए सहकारी दुकानों की स्थापना की ताकि बाजार में कोई उनकी गाढ़ी कमाई नहीं लूट सके। बाद में, अपना बाजार जैसी संस्थाएं विकसित हुईं। जीजी ने यूसुफ मेहर अली केंद्र की स्थापना के जरिए छोटे उद्योगोें के जरिए गांधीवादी अर्थव्यवस्था का एक माडल पेश करने की कोशिश की है। क्या उनका माडल देश के बहुसंख्यक लोगोें को रोजगार देने के काम आ सकता है? यह तो समय ही बताएगा।
वह नर्मदा आंदोलन से लेकर उन तमाम आंदोलनों को मदद देते रहे जो वैचारिक रूप से समाजवादी विचारों के करीब हैें। उन्होंने मुंबई के दंगों से लेकर भुज के भूकंप के पीड़ितों को मदद जैसे कार्यक्रमों में सक्रियता से हिस्सा लिया है।  
इस दौर में जीजी की वैचारिक स्थिरता की चर्चा भी जरूरी है। लोग लिबास की तरह पार्टी बदलते रहे हैं। जीजी पर्यावरण से लोकतंत्र तथा सेकुलरिज्म के पक्ष में चलने वाले अनगिनत अभियानों में लगे रहते थे। आरएसएस तथा भाजपा के नेतृत्व में चल रहे सांप्रदायिकता और तानाशाही के इस दौर में वह समाजवाद के दीये को जलाए रखने की कोशिश में थे। उन्हें सादर नमन।

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