शशिकांत गुप्ते
घुंघरू पाँव में पहने जातें हैं। विभिन्न प्रकार के नृत्य करने वाले नर्तक और नर्तकियां पाँव में घुंघुरू पहनती है।
घुंघरू की आवाज का तारतम्य ढोलक और तबले के साथ मिलता है, तब श्रोता और दर्शक आत्ममुग्ध हो जातें हैं।
फ़िल्म उपकार में गीतकार गुलशन बावराजी अपने गीत में लिखतें हैं।
बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोस दूर हो जाता है खुशियों के कंवल मुस्काते हैं
यह कथन एकदम सत्य है। जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि।
उपर्युक्त गीत की पँक्तियों में गीतकार ने कल्पना की है। बैलों के गले बंधे घुंघरूओं की आवाज जीवन का राग सुनाती है। इस आवाज से गम कोसों दूर हो जाता है।
वाह क्या कल्पना है। बैलों के गले बंधे घुंघरुओं की आवाज सुनने मात्र से गम बहुत दूर चला जाता है। गम दूर होने पर खुशियों के कंवल मुस्करातें है।
गीतकार ने खुशियों के इजहार के लिए उपमा भी कंवल के फूल की ही दी है। यह फूल कीचड़ में ही फलता फूलता है। इस फूल की विशेषता है कि, यह फूल पूजा में माँ लक्ष्मीजी को ही चढ़ाया जाता है।
लक्ष्मीजी का वाहन भलेही उल्लू हो लेकिन प्रायः लक्ष्मीजी की तस्वीरों में यही दर्शाया जाता है कि धन की देवी माँ लक्ष्मीजी कमल के फूल पर ही खड़ी है।
बहरहाल मुद्दा है घुंघरुओं का।
घुंघरू का शाब्दिक अर्थ शब्दकोष में देखा तो मै अचंभित रह गया।
शब्दकोष में घुंघरू का अर्थ नूपुर लिखा है।
एक ओर कल्पना में घुंघरुओं की आवाज में गम कोसों दूर हो जाता है, दूसरी ओर नूपुर के चंद शब्दों की गूंज विश्व स्तर पर पहुँच गई है। विश्वस्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त होने पर कुछ नादान लोग कुतर्क दे रहें हैं कि, बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ। यह कुतर्क एकदम ग़लत है।
कुछ आलोचकों का कहना है कि, यह Contrary propaganda
मतलब विरोधी प्रचार है। सम्भवतः इसीलिए इसे Fringe element कहा है।
Fringe फ्रिंग का शब्दश हिंदी अर्थ स्पष्ट रूप से कहीं मिल नहीं पाया। सामान्यज्ञान का उपयोग करने पर इतना समझ में आया कि फ्रिंग का मतलब होता है। वह दिखावटी श्रृंगार जो लोगों आकर्षित तो करता है लेकिन ऐसे श्रृंगार की आवश्यकता होती ही नहीं है। अनावश्यक सजनाधजना।
जो भी हो घुँघरू (नूपुर) की चर्चा विश्व स्तर पर हो रही है।
अंत में सन 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म चोर मचाए शोर का यह गीत याद आया। इस गीत के गीतकार और संगीतकार रविन्द्र जैनजी हैं। इस गीत की एक दो पंक्तियां प्रस्तुत है।
घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं
कभी इस पग में कभी उस पग में बँधता ही रहा हूँ मैं
अपनों में रहे या ग़ैरों में
घुँघरू की जगह तो है पैरों में
कभी मन्दिर में कभी महफ़िल में सजता ही रहा मैं
घुँघरू पहनने के बाद नर्तक या नर्तकी को बाकयदा प्रशिक्षण लेकर, तबले,मृदुंग और ढोलक की ताल पर ही नृत्य करना चाहिए।
बगैर प्रशिक्षण के नाचने पर ऐसा होता है।
छोड़ के सारे शर्म और लाज
मैं ऐसे ज़ोर से नाची आज
के घुँघरू टूट गये
एक व्यवहारिक प्रश्न उपस्थित होता है। विश्व स्तर पर यह आरोप-प्रत्यारोप का तांडव नृत्य कबतक चलेगा?
यह चुनौती नृत्य के प्रशिक्षकों के लिए है?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

