
कानपुर अंचल में लोकमंचीय कला के अन्तर्गत रामलीला और नौटंकी का बहुत ही महत्व रहा है । नौटंकी प्राय: रात से शुरू हो कर भोर तक मंचित होती है । छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद जी ने “रंगमंच” शीर्षक निबन्ध में नौटंकी की चर्चा करते हुए लिखा है कि ” नौटंकी नाटक की ही अपभ्रंश है।
हीर रांझा को सबसे पहली नौटंकी का कथा वस्तु माना जाता है। आधुनिक नौटंकी का प्रादुर्भाव ब्रज क्षेत्र से माना जाता है । रास मण्डलियां प्राय: कृष्ण लीला मंचन के साथ साथ मध्य रात्रि के बाद पौराणिक व धार्मिक उपाख्यानों का भी मंचन प्रारम्भ किया जिनमें नौटंकी भी शामिल थी। ब्रज क्षेत्र में ही हाथरस के पण्डित नत्थाप्रसाद शर्मा ने एक नौटंकी कम्पनी बनाई जो दूर दूर तक मंचन के लिए जाती थी।
उनकी मण्डली में सभी पात्रों का अभिनय पुरूष करते थे स्त्रियों का मंचन में प्रवेश निषिद्ध था। नत्थाप्रसाद की मण्डली में कन्नौज के त्रिमोहनलाल जी नगाड़ा /नक्कारा बजाते थे।
कुछ समय बाद त्रिमोहन लाल ने अपनी नई नौटंकी कम्पनी बनाई और कन्नौज और मकनपुर मेले से नौटंकी का मंचन शुरू किया। त्रिमोहन लाल ने नौटंकी में सबसे पहले महिला कलाकारों को भी प्रवेश दिया उनमें से कृष्णा बाई और गुलाबबाई प्रमुख थी। त्रिमोहन लाल की नौटंकी कम्पनी को कन्नौज के प्रसिद्ध व्यापारी, रईस और राजनेता चन्द्र सेठ का संरक्षण प्राप्त था। त्रिमोहनलाल ने अपनी नौटंकी कम्पनी के मुकाम को कन्नौज से कानपुर बना दिया।
कनपुरिया शैली की नौटंकी के प्रवर्तक उस्ताद तिरमोहन लाल जी को नौटंकी मे नक्कारा बजाने मे विशेष महारत प्राप्त थी | तिरमोहन लाल जी प्रारंभिक दिनो मे हाथरस शैली की नौटंकी के प्रवर्तक प. नत्थाराम शर्मा की नौटंकी कम्पनी मे नगाड़ा बजाते थे| बाद मे उन्होने कानपुर मे नौटंकी की कम्पनी स्थापित की थी | तिरमोहन लाल उस्ताद की नौटंकी कंपनी मे पहली बार गुलाबबाई ने सन् १९२९ ई० मे नौटंकी मे अभिनय शुरू किया था ,उस समय गुलाबबाई महज ११- १२ साल की थी और नौटंकी का मंचन हुआ था मकनपुर मेला मे|
उस्ताद तिरमोहन लाल नक्कारा बजाने के साथ अभिनय भी अच्छा करते थे उनका कार्यक्षेत्र कानपुर से कन्नौज तक प्रमुख रूप से था | एक बार तिरमोहन लाल जब कानपुर स्थित फूलबाग मे देशभक्ति पूर्ण नौटंकी का कथानक मंचन किया तो अंग्रेज सरकार ने इसे कठोरतापूर्वक प्रतिबंधित किया था|
नौटंकी मे नगाड़े के साथ नगड़िया का योग कर बजाया जाता है | नगाड़े की ध्वनि मोटी और नगड़िय़ा की ध्वनि तीक्ष्ण होती हैं | नगड़िया की ध्वनि मे तीक्ष्णता बनायें रखने के लिए उसे आग का सेंक कराया जाता हैं और बजाने के लिए लकड़ी की चोपो का प्रयोग किया जाता है|
नगाड़े के साथ ढोलक और हरमोनियम से संगत होती हरमोनियम ऊंचे स्टैण्ड पर रखी होती और उसमे पैरों से हवा देकर दोनो हाथों से बजाया जाता।
कानपुर में पहले से ही नौटंकी विधा मौजूद थी उसका श्रेय मंधना के जमींदार श्री लालमन दुबे लंबरदार जी को था । वैसे कानपुर में श्री कृष्ण पहलवान जी जो कवि, शायर और लोकभाषाओ के मर्मज्ञ थे। श्री कृष्ण पहलवान नौटंकी साहित्य के प्रणेता व प्रकाशक थे उनकी प्रकाशन संस्था थी श्री कृष्ण पुस्तकालय चौक कानपुर।
श्री कृष्ण पहलवान की नौटंकी कम्पनी कानपुर से करांची तक नौटंकी का प्रदर्शन किया । नौटंकी की भाषा में श्रीकृष्ण पहलवान के साथ यासीन खलीफा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस प्रकार नौटंकी की हाथरस शैली के बाद कनपुरिया शैली लब्धप्रतिष्ठ हुई।