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हर लड़की को खाना समझने वाले नामर्दों : शातिराना, साजिशाना कुत्तापन छोड़ दो!

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मीना राजपूत (कोटा)

   _किसी भी उम्र वर्ग की हो, अगर दो तीन लड़कियों, महिलाओं से उनके सार्वजनिक जीवन मे रोजमर्रा पेश आने वाले हालात और अनुभव सुन लीजिये तो गश आने लगेगा। ये सब हमसे होता है, हम करते है यानी मर्दाना समाज।_
  रास्ता चलते लड़की दिख गयी और घूरने लगे, बगल से गुजरे और जो भी बना, जैसे भी बना, रगड़ दिया। नजर मिल गयी और आँखे मार दी।
 _बिना एक पल को ये सोचे कि हमारी इस नामर्दानी, गलीज किस्म की और निर्लज्ज तथा क्रूर हरकत से उधर क्या-क्या टूट गया, क्या-क्या दरक गया।_
    ये भी तो नही होता कि इस तरह की हरकतों से किसी लड़की पर कभी कोई पोजिटिव असर पड़ता हो। छिछोरे ही तो समझ मे आते है। घिनौने ही तो लगते है। कभी किसी का ऐसा कोई अनुभव हो तो बताइये कि इस सड़कछाप आशिकाने अंदाज से किसी के मन मे कभी कोई मीठी हिलोर पैदा कर पाये हो आप।
 _लार टपकाते, किसी सड़कछाप भुक्खड़ आवारा लोफर से कुछ कम तो नही लगते। तो क्या मिल क्या जाता है हर लड़की को खाने की चीज समझ लेने वालों ?_
  कभी ये नही होता कि अपनी सारी कलाओं के साथ शराफत और सज्जनता से पेश आइये। मन जीतने की कोशिश कीजिए, दिल मे उतरने के जतन कीजिए। थोड़ी मजूरी कीजिए। 

बसंत /बेलेंटाइन/होली वेगेरह के बहाने भी वही नंगई, वही लुच्चई, वही शातिराना, वही साजिशाना कुत्तापन !
प्यार का मौसम है, तो प्यार कीजिए, सच मे इस दुनिया मे प्यार से खूबसूरत दूसरी कोई शय नही होती। तो प्यार करो नौजवानों, इश्क करो, छिछोरे मत बनो।
स्त्री के मन को भाव चाहिए, तुम घाव देते चलते हो। स्त्री के मन को अहसास चाहिए, तुम बकवास करते चलते हो। स्त्री के मन को मिठास चाहिए, तुम खटास देते चलते हो।
एक फूल पाकर मन हार जाने वाली स्त्री को समझने के लिए क्या किसी दूसरे ग्रह से पुरुष आयेंगे ?
वह बस मन ही समझ लिया जाना तो चाहती है।
तन तो बाई प्रोडक्ट है। मन वाली स्कीम मे ये शामिल है। तुम स्कीम ही नही समझते यार। औरत के मन को मर्द चाहिए और तुम हो कि छिछोरे बने फिरते हो। अरे धत्त !
(लेखिका चेतना विकास मिशन की संयोजिका हैं.)

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