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वैश्विक फलक : प्लेटो और कविता

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पुष्पा गुप्ता 

प्लेटो (428 ई.पू.—348 ई.पू.) की जो भी पुस्तकें उपलब्ध हैं, क़ानून (Laws) को छोड़कर (जो आदर्श स्थिति की असम्भाव्यता की स्थिति में द्वितीयक सर्वोत्तम,Second Best, का विवेचन है), उनकी स्थापनाओं को प्लेटो अपने गुरु सुकरात (470 ई. पू.—399 ई.पू.) की स्थापनाएँ  बताते हैं।

      कहना कठिन है, कितनी स्थापनायें सुकरात की हैं और कितनी उनसे नि:सृत या उत्प्रेरित प्लेटो की। सुकरात / प्लेटो के समय में उनके नगर-राज्य एथेंस की हालत ठीक नहीं थी। ख़ासकर पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा के मुक़ाबले। और दोनों में थी पुरातन शत्रुता।

        एथेंस में दर्शन की प्राचीन परम्परा सॉफ़िज़्म के व्यावहारिक और विकृत रूप का बोलबाला था और राजनीतिज्ञ उसका उपयोग राजकीय हितों के मूल्य पर अपने निजी हित साधने के लिए कर रहे थे। तर्क से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने की क़ाबिलियत ही राजनीतिक सफलता का पर्याय बन गई थी; सॉफ़िज़्म के नाम पर स्कूलों में इसका प्रशिक्षण तक दिया जाता था।  

तत्कालीन स्थितियों की माँग के अनुरूप सुकरात / प्लेटो  ने अपने दर्शन में दो पहलुओं पर आत्यंतिक ज़ोर दिया। एक, सॉफ़िस्टों के हथियार—तर्क–से ही उनका खंडनकर, सत्य की प्रतिष्ठा करना। और दो, नागरिकों, विशेषकर शासकों एवं सैनिकों का राज्य के प्रति पूर्ण समर्पण सुनिश्चित कर, आदर्श राज्य की स्थापना करना।   

        सुकरात / प्लेटो की वह उक्ति बहुत प्रसिद्ध है–ज्ञान ही गुण है (Virtue is knowledge)। दूसरे शब्दों में गुण ही ज्ञान है। सुकरात / प्लेटो की प्रतीति थी कि तात्विक ज्ञान की शिक्षा देकर व्यक्ति को गुणी बनाया जा सकता है।

       इसी की परिणति थी दार्शनिक राजा (शासक) की अवधारणा। दार्शनिक शासक अपने-पराए में भेद नहीं करता, इसलिए वही सबके साथ न्याय कर सकता है और आदर्श शासक बन सकता है। उसके लिए किसी क़ानून की ज़रूरत नहीं, बल्कि नई-नई और अनन्य स्थितियों से निपटने में क़ानून उसके मार्ग में बाधक बन सकता है।

      इसका एक हासिल यह हुआ कि कविता और अन्य कलाएँ, जो आत्मपरक अनुभूति से निरपेक्ष ज्ञान का विभ्रम उत्पन्न करती हैं, तार्किक पद्धति से आदर्श राज्य के लिये उनकी उपयोगिता का विस्तृत प्रत्याख्यान। और जो एक जैविक तत्व (Organism) के रूप में राज्य के लिए अनुपयोगी है, वह उसके अविभाज्य अंग नागरिकों के लिए भी अनुपयोगी है।  

राज्य के प्रति शासकों और सैनिकों का पूर्ण समर्पण सुनिश्चित करने के लिए सुकरात / प्लेटो ने सम्पत्ति के साम्यवाद तथा स्त्रियों के साम्यवाद का अतिवादी विचार प्रस्तुत किया। उनके सम्पत्ति के साम्यवाद में शासकों और सैनिकों के पास निजी सम्पत्ति का पूर्ण अनस्तित्व होगा क्योंकि वह राज्य के प्रति, सार्वजनिक हित के प्रति, अपेक्षित समर्पण के आड़े आती है।

        स्त्रियों के साम्यवाद में एक क़दम और आगे बढ़कर उन्होंने शासकों और सैनिकों के लिए परिवार संस्था का भी निषेध कर दिया। किसी को न तो अपनी पत्नी की जानकारी होगी, न बच्चों की। न ही किसी बच्चे को उसके माता-पिता की जानकारी होगी। सर्वोत्तम से सर्वोत्तम के समागम से उत्पन्न संततियों का पालन-पोषण और उनकी शिक्षा-दीक्षा का पूरा दायित्व राज्य पर होगा।

       इस अतिवाद में संतुलन स्थापित करने का ज़रूरी कार्य किया प्लेटो के शिष्य अरस्तू (384 इ.पू.—322 ई. पू.) ने। अपने ग्रंथ ‘राजनीति’ (Politics) में उन्होंने संतुलित मात्रा में व्यक्तिगत सम्पत्ति और पारिवारिक ऊष्मा को मनुष्य के स्वस्थ और सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य बताया।

       एक स्वस्थ राज्य के लिए उसके नागरिक के रूप मे मनुष्य के स्वस्थ विकास की अपरिहार्यता पर ज़ोर दिया। उसी तरह अपने ग्रंथ काव्यशास्त्र (Poetics) में अरस्तू ने कविता और अन्य कलाओं को मानव-जीवन की बौद्धिक और आत्मिक समृद्धि के लिए आवश्यक सिद्ध किया।

      साथ ही काव्यशास्त्र के सिद्धांतों की सम्यक्‌ व्याख्या प्रस्तुत की जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

अरस्तू की व्यावहारिक स्वीकार्यता का तात्पर्य यह नहीं कि सुकरात / प्लेटो के अतिवादी विचारों की तात्विकता, सुसंगतता और सत्यनिष्ठा में कोई खोट है। अकारण नहीं कि जिसे हम आधुनिक शिक्षा पद्धति कहते हैं उसमें मानविकी (Humanities) के विभिन्न अनुशासनों का प्रारम्भ प्लेटो के विचारों से ही होता है (मेरे विद्यार्थीभी-जीवन और प्राध्यापक-जीवन तक तो यही था।) 

० हाथ कंगन को आरसी क्या!

आप ख़ुद देखें और तय करें।                

       यहाँ सीमित मुद्दा यह है कि क्या कविता (साहित्य की सभी विधाओं, बल्कि सभी कलाओं की प्रतिनिधि के तौर पर) ‘ज्ञान’ के मार्ग में बाधक है? सुकरात / प्लेटो के अनुसार ऐसा ही है। और उन्होंने होमर के ख़ास संदर्भ में, उनके कृतित्व का हवाला देते हुए, इसे सिद्ध करने का उपक्रम किया है।   

      कविता और दर्शन (ज्ञान) के अंतर्सम्बंध पर सुकरात / प्लेटो का विमर्श प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक रिपब्लिक के दशम खंड में है। इसे समझने के लिए पहले यूनानी दर्शन में प्रचलित प्रयोजनवाद (teleology) को समझना ज़रूरी है। संसार में हर वस्तु का एक प्रत्यय, एक आदर्श (idea) है जो पूर्ण है और इकलौता है। उस वस्तु का हर उपलब्ध रूप उसी प्रत्यय की नक़ल है, स्वयं में अपूर्ण है और उसी आदर्श या पूर्णता को प्राप्त करने की ओर उन्मुख है।

       यह भी कि हर वस्तु अपने उपलब्ध, भौतिक रूप में अपने नाम की दूसरी वस्तु से भिन्न है। इस तरह हर वस्तु का प्रत्यय (idea) उसका वास्तविक यानी आदर्श रूप भी है, अंतिम गति भी। उसकी वास्तविक प्रकृति और उसका लक्ष्य दोनों एक हैं। उस वस्तु के भिन्न-भिन्न काल और भिन्न-भिन्न स्थान में जो भिन्न-भिन्न रूप मिलते हैं, उसी एक और पूर्ण प्रत्यय की अनेक और अपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं। तत्व (substance) और रूप (form) का शाश्वत द्वंद्व।  

सुकरात एक पलंग के चित्र के उदाहरण से अपनी बात शुरू करते हैं। दो पलंग हूबहू एक से नहीं हो सकते। एक ही बढ़ई द्वारा बनाए गए दो पलंगों में भी कुछ न कुछ भिन्नता होगी। पलंग बनाते समय बढ़ई के दिमाग़ में पलंग का एक प्रत्यय होता है जिसकी वह नक़ल करता है।  लेकिन कितनी भी शिद्दत से नक़ल करे, उस प्रत्यय को वह पूर्णत: साकार नहीं कर सकता, उससे बेहतर पलंग बनाने की संभावना हमेशा बनी रहेगी। 

       चित्रकार जब पलंग का चित्र बनाएगा तो बढ़ई द्वारा बनाए गए पलंग की नक़ल करेगा। फिर एक ही पलंग भिन्न-भिन्न कोणों से–बगल से, सामने से या तिरछा–देखने पर–भिन्न-भिन्न दिखाई पड़ेगी। तो चित्रकार भौतिक पलंग को भी जस का तस नहीं देख पाएगा।

       पलंग किसी ख़ास कोण से जैसा दिखेगा वही उसके दिमाग़ में दर्ज होगा। वह बढ़ई द्वारा बनाए किसी एक पलँग की नक़ल होगी। चित्र बनाते समय चित्रकार अपने दिमाग़ में दर्ज उसी पलँग की नक़ल करेगा। इस तरह चित्रकार का चित्र पलंग के प्रत्यय से तीन डिग्री दूर होगा।

      बढ़ई ने अपने दिमाग़ में मौजूद पलंग के प्रत्यय की नक़ल की। चित्रकार ने उसे जिस कोण से देखा वह बढ़ई के बनाए पलंग की नक़ल थी। यानी नक़ल की नक़ल। अब चित्रकार पलंग का जो चित्र बनाएगा वह किसी ख़ास कोण से बढ़ई द्वारा बनाए गए पलंग को देखने पर उसके दिमाग़ में दर्ज उसके रूप की नक़ल होगा। यानी नक़ल की नक़ल की नक़ल। 

जो चित्रकार के साथ, वही कवि या कथाकार के साथ। जो काम चित्रकार अपनी तूलिका और रंगों से करता है, वही काम कवि-कथाकार शब्दों और वाक्यों से करता है। कवि-कथाकार नक़ल की नक़ल की नक़ल करके मूल की पुनर्रचना करने की कोशिश करता है।

      वह यह भी नहीं जानता कि उसकी कृति पढ़नेवालों का क्या और कितना भला करेगी, करेगी भी या नहीं। यहाँ प्लेटो (सुकरात?) बागडोर और ज़ीन (काठी) का बहुत सटीक उदाहरण देते हैं। यद्यपि बागडोर को लोहार और ज़ीन को घोड़े का साज़ोसामान बनानेवाला निर्मित करता है किंतु इन्हें बनानेवाले लोग नहीं, केवल घुड़सवार, जो इनका उपयोग करता है, वही जानता है कि एक अच्छी बागडोर और अच्छी ज़ीन कैसी होनी चाहिए।   

       इस बिंदु पर आते हैं होमर और उनकी त्रासदियाँ (दु:खांतिकाएँ)। सुकरात होमर को त्रासदियों का बादशाह मानकर कहते हैं–लोग कहते हैं, त्रासदी-लेखक सभी कलाएँ और मनुष्य से संबंधित सभी गुण-अवगुण और सारी चीज़ें जानते हैं। एक अच्छा कवि किसी विषय पर तभी सुंदर कविता रच सकता है जब वह उसे विषय की सच्ची जानकारी हो।

       यदि नहीं है तो वह अपने काम में बिल्कुल असफल रहेगा। हमें जानना चाहिए कि जो लोग उसकी रचना की प्रशंसा करते हैं वे केवल नक़ल की प्रशंसा कर रहे हैं। इस तरह वे ज्ञान से नहीं, धोखे से प्रशंसा कर रहे हैं। क्या वे जानते हैं कि कवि वाक़ई उस विषय का वास्तविक ज्ञान रखता है जिस पर उसका आख्यान सामान्य लोगों द्वारा अनुमोदित किया जा रहा है? क्या वे समझते हैं कि कवि सत्य से, वास्तविकता से, being से, तीन डिग्री दूर है? 

कवि को उस विषय का सच्चा ज्ञान होता जिसकी वह नक़ल कर रहा है तो वह नक़ल करने के बजाय उस विषय को क्रियान्वित करने में उत्साह दिखाता और अपने पीछे कविताएँ नहीं, बहुत सारे सुंदर और स्मरणीय काम छोड़ जाता। तब वह उनका नायक होता जिनका वह गान करता है, न कि कवि जो सिर्फ़ गान करता है।

        अगर होमर लोगों को शिक्षित करके उन्हें बेहतर मनुष्य बना सकता तो उसके केवल प्रशंसक न होते, उसके ऐसे अनेक शिष्य होते जिनका जीवन बदल जाता और जो उसे जीवनदाता की तरह सम्मान और प्यार करते। यदि होमर लोगों को गुणी और सज्जन बनने में मदद कर सकता तो उसके समय के लोग उसे इस तरह घूम-घूमकर अपने गीत गाने के लिए न छोड़ देते।

       तब वे उसे अपने साथ रहने को विवश कर देते और ऐसा न कर पाते तो वह जहाँ भी जाता उसके पीछे-पीछे जाते, जब तक कि उसके शिक्षाओं को पूरी तरह हृदयंगम न कर लेते।

     यदि ज्ञान ही गुण है तो क्या नक़ल की नक़ल की नक़ल करनेवाली कविता और अन्य कलाएँ उस ज्ञान के यानी गुणशीलता के मार्ग में बाधा नहीं है?

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