विश्व मोहन
भारत के बायो-टेक रेग्युलेटर ने जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) सरसों के बीज उत्पादन और परीक्षण के लिए पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है। यह इसके व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले का कदम है। हालांकि किसान जीएम सरसों की खेती शुरू कर सकें, इसमें अभी कम से कम दो साल लगेंगे, लेकिन फिर भी जेनेटिकली इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी का यह फैसला दो वजहों से खासा अहम माना जा रहा है।
- देश में विकसित ट्रांसजेनिक हाइब्रिड मस्टर्ड (डीएमएच-11) से ऑयल सीड की पैदावार बढ़ने की उम्मीद है।
- इससे जीएम सरसों की पैरंटल लाइंस को भी पर्यावरणीय मंजूरी मिलने का रास्ता खुला है, जिससे ट्रांसजेनिक हाइब्रिड्स की नई पीढ़ी के विकास में मदद मिलेगी और फार्म सेक्टर में जीन टेक्नॉलजी रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा।
किसने विकसित किया
जेनेटिक्स के प्रफेसर और दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर दीपक पेंटल के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स में साल 2002 में डीएमएच-11 को विकसित किया था। इसे भारतीय सरसों की लोकप्रिय प्रजाति ‘वरुण’ की यूरोपीय सरसों के साथ क्रॉसिंग कराते हुए विकसित किया गया। इस प्रॉजेक्ट की फंडिंग बायोटेक्नॉलजी विभाग और नैशनल डेयरी डिवेलपमेंट बोर्ड ने की थी।
क्या वाकई सबको नुकसान पहुंचाने जा रही है जीएम सरसों?
आईसीएआर की देखरेख में किए गए प्लॉट-लेवल ट्रायल ने दिखाया कि वरुण के मुकाबले इसकी पैदावार 28 फीसदी ज्यादा है। लेकिन कई और वजहें भी हैं इसे बेहतर मानने की।
- इसे विकसित करने वाले बताते हैं कि सरसों की ट्रांसजेनिक किस्म में अतिरिक्त पानी, खाद या कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों को कम खर्च में ही बेहतर फसल मिलने लगेगी।
- इससे यह संभावना भी बनती है कि किसान सरसों की खेती का क्षेत्रफल बढ़ाने को प्रेरित होंगे। इससे देश में खाद्य तेलों के आयात पर होने वाला खर्च कम करने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।
- पिछले वित्तीय वर्ष में भारत को करीब 19 अरब डॉलर का खाद्य तेल आयात करना पड़ा था।
सेहत से जुड़े कई सारे अध्ययनों के आधार पर रेग्युलेटर ने कहा है कि जीएम सरसों का इस्तेमाल उतना ही सुरक्षित है, जितना भारत में पारंपरिक तौर पर उगाए जाने वाले सरसों की अन्य प्रजातियों का सेवन। ट्रांसजेनिक सरसों के इस्तेमाल से जुड़ी नागरिकों की चिंता दूर करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय पब्लिक सेक्टर के टॉप वैज्ञानिक संस्थानों में किए गए विभिन्न सेफ्टी ट्रायल के हवाले से एफएक्यू (बार-बार पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब) भी जारी कर चुका है।
- इसमें बताया गया है कि कैसे रेग्युलेटरी अथॉरिटीज ने जीन डिवेलपर्स की ओर से मुहैया कराए गए डॉसियर का बारीकी से आकलन करने और इंसानों तथा पशुओं में जहर और एलर्जी के प्रतिरोध को लेकर उपलब्ध तमाम सेफ्टी डेटा पर गंभीरता से विचार करने के बाद पाया कि इन प्रोटीनों में कोई जहरीलापन नहीं है।
- इसमें जोर देकर यह भी कहा गया है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि ऐसा भोजन करने से इंसानों या पशुओं में ट्रांसजीन ट्रांसफर हो सकता है।
वर्तमान में बीटी कॉटन ही एकमात्र ट्रांसजेनिक फसल है, जिसकी भारत में व्यावसायिक खेती की जा रही है। - हालांकि यह एक अखाद्य फसल है, लेकिन सरकार ने बताया है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर माना जा सके कि इस प्रजाति की पिछले दो दशकों से हो रही खेती का जमीन पर या उस इलाके की संपूर्ण जैव विविधता पर किसी भी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
क्यों हो रहा है विरोध
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर विभिन्न स्टेकहोल्डर्स की ओर से इसका इतना विरोध क्यों हो रहा है। इस विरोध के कई पहलू हैं।
- लोगों की सेहत पर पड़ने वाला असर तो अपनी जगह है ही, एक बड़ी चिंता यह भी है कि कहीं ट्रांसजेनिक पौधे किसी तरह से बच निकले और उनके जरिए इंजीनियर्ड जीन व्यापक आबादी तक पहुंच जाए तो क्या होगा।
- इसके अलावा नॉन-टारगेट ऑर्गेनिज्म्स (जैसे वे कीड़े जो पेस्ट्स नहीं हैं) की जीन प्रॉडक्ट्स के प्रति संवेदनशीलता का मसला भी है।
- जैव विविधता को होने वाला नुकसान भी बहुतों की चिंता का कारण है। खेती में केमिकल्स के बढ़ते इस्तेमाल का सवाल भी है।
लेफ्ट, राइट एक
इन मुद्दों ने लेफ्ट और राइट दोनों तरफ के समूहों को खेती में जीएम सरसों की इजाजत देने के फैसले के खिलाफ एक कर दिया है। फैसले का विरोध आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच जैसे ग्रुप भी कर रहे हैं।
- इनके विरोध की वजह आर्थिक है। उनकी दलील है कि चूंकि भारत ने खाद्य फसलों में अब तक जीएम को इजाजत नहीं दी है, इसलिए देश से निर्यात पर लगा नॉन-जीएम का ठप्पा यूरोपीय देशों से ऑर्डर लेने में मददगार होता है क्योंकि वहां ट्रांसजेनिक फूड बैन है।
- ट्रांसजेनिक रेप्सीड (सफेद सरसों, जो सरसों की ही एक किस्म है) 1996 से कनाडा में, 2002 से अमेरिका में और 2007 से ऑस्ट्रेलिया में उगाई जा रही है। कनाडा से तो इसका कई देशों में निर्यात भी हो रहा है।
- जिन देशों में भी इन्हें मंजूरी मिली हुई है, वहां लोगों की सेहत पर कोई हानिकारक प्रभाव देखने में नहीं आया है।
अलग-अलग हो जांच
चूंकि विभिन्न जीएम ऑर्गेनिज्म्स में तमाम जीन्स अलग-अलग तरह से लाए जाते हैं, इसलिए हर जीएम फूड की सुरक्षा की जांच अलग-अलग होनी चाहिए, केस-बाय-केस बेसिस पर, न कि सामान्य रूप में सभी जीएम फूड के बारे में कोई एक निष्कर्ष स्वीकार लेना चाहिए। बहरहाल, अपने एफएक्यू में सरकार ने कहा है कि जो जीएम फूड अभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध हैं, वे सब सुरक्षा जांच से गुजर चुके हैं और लोगों की सेहत के लिए किसी भी रूप में नुकसानदेह नहीं पाए गए हैं।

