डॉ. प्रिया
यह जड़ता जनित घामड़ता ग्रसित भूल हुई है कि हमने परमात्मा को एक व्यक्ति समझ रखा है। इसलिए हम सोचते हैं, जैसे हम व्यक्ति के संबंध में सोचते हैं। हम कहते हैं, वह बड़ा दयालु है, हम कहते हैं, वह बड़ा कृपालु है; हम कहते हैं, वह सदा कल्याण ही करता है। ये हमारी आकांक्षाएं हैं जो हम उस पर थोप रहे हैं।
व्यक्ति पर तो ये आकांक्षाएं थोपी जा सकती हैं; और अगर वह इनको पूरा न करे तो उसको उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। शक्ति पर ये आकांक्षाएं नहीं थोपी जा सकतीं। और शक्ति के साथ जब भी हम व्यक्ति मानकर व्यवहार करते हैं तब हम बड़े नुकसान में पड़ते हैं; क्योंकि हम बड़े सपनों में खो जाते हैं।
शक्ति के साथ शक्ति मानकर व्यवहार करेंगे तो बहुत दूसरे परिणाम होंगे। जैसे कि जमीन में ग्रेविटेशन है, कशिश है, गुरुत्वाकर्षण है। आप जमीन पर चलते हैं तो उसी की वजह से चलते हैं। लेकिन वह इसलिए नहीं है कि आप चल सकें।
आप न चलेंगे तो गुरुत्वाकर्षण नहीं रहेगा, इस भूल में मत पड़ जाना। आप नहीं थे जमीन पर, तो भी था, एक दिन हम नहीं भी होंगे, तो भी होगा। और अगर आप गलत ढंग से चलेंगे, तो गिर पड़ेंगे, टांग भी टूट जाएगी; वह भी गुरुत्वाकर्षण के कारण ही होगा। लेकिन आप किसी अदालत में मुकदमा न चला सकेंगे, क्योंकि वहां कोई व्यक्ति नहीं है।
गुरुत्वाकर्षण एक शक्ति की धारा है। अगर उसके साथ व्यवहार करना है तो आपको सोच—समझकर करना होगा। वह आपके साथ सोच—समझकर व्यवहार नहीं कर रही है।
परमात्मा की शक्ति आपके साथ सोच—समझकर व्यवहार नहीं करती है।
परमात्मा की शक्ति कहना ठीक नहीं है, परमात्मा शक्ति ही है। वह आपके साथ सोच—समझकर व्यवहार नहीं है उसका, उसका अपना शाश्वत नियम है। उस शाश्वत नियम का नाम ही धर्म है। धर्म का अर्थ है, उस परमात्मा नाम की शक्ति के व्यवहार का नियम।
अगर आप उसके अनुकूल करते हैं, समझपूर्वक करते हैं, विवेकपूर्वक करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाएगी— उसकी तरफ से नहीं, आपके ही कारण।
अगर आप उलटा करते हैं, नियम के प्रतिकूल करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए अकृपा बन जाएगी। परमात्मा अकृपा नहीं है, आपके ही कारण। तो परमात्मा को व्यक्ति मानेंगे तो भूल होगी।
परमात्मा व्यक्ति नहीं है, शक्ति है। और इसलिए परमात्मा के साथ न प्रार्थना का कोई अर्थ है, न पूजा का कोई अर्थ है; परमात्मा के साथ अपेक्षाओं का कोई भी अर्थ नहीं है। यदि चाहते हैं कि परमात्मा, वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाए, तो आपको जो भी करना है वह अपने साथ करना है।
इसलिए साधना का अर्थ है, प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। ध्यान का अर्थ है, पूजा का कोई अर्थ नहीं है।
इस फर्क को ठीक से समझ लें : प्रार्थना में आप परमात्मा के साथ कुछ कर रहे हैं— अपेक्षा, आग्रह, निवेदन, मांग, ध्यान में आप अपने साथ कुछ कर रहे हैं। पूजा में आप परमात्मा से कुछ कर रहे हैं; साधना में आप अपने से कुछ कर रहे हैं।
साधना का अर्थ है, अपने को ऐसा बना लेना कि धर्म के प्रतिकूल आप न रह जाएं; और जब नदी की धारा बहे तो आप बीच में न पड़ जाएं—तट पर हों कि नदी की धारा का पानी आपकी जड़ों को मजबूत कर जाए, उखाड़ न जाए।
जैसे ही हम परमात्मा को शक्ति के रूप में समझेंगे, हमारे धर्म की पूरी व्यवस्था बदल जाती है।

