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*वरवरा राव को खत्म करने की सरकारी साजिश*

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वरवरा राव गर अमिताभ बच्चन की तरह जवानी में सिनेमा की राह पकड़ते तो आज उनको भी चमचमाता हुआ अस्पताल मिलता. फिलहाल वे कैद हैं, बीमार हैं. ब्रश तक करने की हालत में नहीं हैं. दोनों एक ही उम्र के हैं. एक के लिए राष्ट्र दुआ मांग रहा है, दूसरे की जान का जिक्र और फिक्र कितनों को है, वो उंगलियों पर गिन लीजिए, जगह शायद तब भी बच जाए.

वरवरा राव कवि हैं, लिटररी क्रिटिक और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 1957 के जमाने से कविता लिख रहे हैं. आम जनता के लिए काम कर रहे हैं, लिहाजा राजनीतिक पक्षधरता भी है, जो जाहिर है सत्ता को चुभती है.

जब अमिताभ पर्दे पर नाच रहे थे, रिझा रहे थे, प्रेम में मशगूल अनाप-शनाप पैसा बना रहे थे, तब तेलुगू साहित्य के नामी आलोचकों में शुमार वरवरा राव यूनिवर्सिटी के छात्रों को तेलुगू पढ़ा रहे थे. सड़कों पर जनता के गीत गा रहे थे. सरकारों के खिलाफ जनादोलनों में लोहा ले रहे थे.

फिर भीमा कोरेगांव मामले में सरकार ने राव पर नक्सल समर्थक होने का आरोप मढ़ा. और जैसा कि इन दिनों तमाम राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ हो ही रहा है, उन्हें बंदी बनाकर जेल पहुंचा दिया गया. आज तक ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ. हमें सिनेमाई नायक चाहिए मनोरंजन के वास्ते, लेकिन हमें असल नायक भी तो चाहिए न, स्वस्थ समाज के वास्ते !

राजा को जो पसंद हो वही राग बजाने का रिवाज कोई नया भी तो नहीं न ! खैर, अब जबकि अमिताभ बच्चन की बीमारी के बाद दुवाओं की बाढ़ आई तो लगा वरवरा राव को भी याद किया जाए. आखिर एक बुड्ढे ने सिनेमा दिया है तो दूसरे ने असल जमीन के संघर्ष को तो जिंदा रखा न !

सरकारों को राजनीतिक बंदियों जो बीमार हों, क्या उनसे ठीक से सुलूक नहीं करना चाहिए ? आदमी जिंदा रहेगा तो विचारधारा की लड़ाई तो बाद में भी लड़ी जा सकती है न भई ! बाकी वरवरा राव ने न संपत्ति जोड़ी न पनामा पेपर में टैक्स चोरी का ही आरोप कभी लगा, बातें भी वैज्ञानिक ही की. ढोल थाली से शायद ही कोरोना भगाने का ढोंग ही किया होगा.

कुल मिलाकर गर विचारधाराओं की लड़ाई और दंभ अत्याधुनिक मानव समाज की परिकल्पना ही है, तब दूसरे से संवाद के बजाय कैद करने का अधिकार किसी के भी पास कैसे हो सकता है ? बुड्ढे स्वस्थ रहें, बाकी जनता को जो सहेजना-समेटना होगा वो अपने-अपने हिसाब से सहेज-समेट ही लेगी ?

वर्षों पहले (23.10.1985) कवि वरवरा राव एक कविता लिखे थे बैंजामिन मालेस की याद में. यह कविता आज खुद वरवरा राव पर सटीक बैठती है, जब शासक एक फर्जी मुकदमें में इनको कैद कर, तिलतिल मारकर इनकी आवाज बंद कर देने की साजिश कर रही है.

जब प्रतिगामी युग धर्म
घोंटता है वक़्त के उमड़ते बादलों का गला
तब न ख़ून बहता है
न आंंसू.

वज्र बन कर गिरती है बिजली
उठता है वर्षा की बूंदों से तूफ़ान…
पोंछती है मांं धरती अपने आंंसू
जेल की सलाखों से बाहर आता है
कवि का सन्देश गीत बनकर.

कब डरता है दुश्मन कवि से ?
जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हिं
वह कै़द कर लेता है कवि को.

फांंसी पर चढ़ाता है
फांंसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार
दूसरी ओर अमरता
कवि जीता है अपने गीतों में
और गीत जीता है जनता के हृदयों में.

(रचनाकाल : 23 अक्तूबर 1985)

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