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वकीलों को सरकारी मोहरे बनाने की मुहिम में जुटी सरकार 

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मुनेश त्यागी

     अब भारत की सरकार का विधि मंत्रालय अधिवक्ता संशोधन विधायक 2025 लेकर आया है। 1. इस विधायक में वकीलों द्वारा न्यायालयों के बहिष्कार और हड़ताल पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। 2. वकीलों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही और निलंबन का प्रावधान किया गया है। 3. इस विधेयक द्वारा बीसीआई यानी बार काउंसिल आफ इंडिया की स्वायत्तता पर खतरनाक हमला किया गया है, अब बीसीआई में केंद्र सरकार द्वारा नामित सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। 4. इस विधेयक द्वारा विदेशी कानूनी फर्मों के प्रवेश को अनुमति दी जा रही है, 5. वकीलों पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी थोपी जा रही है, 6. वकीलों की आवाज दबाने की यह साज़िश आर्टिकल 19 और 21 पर हमला है, 7. वकीलों की अपनी समस्या उठाने की और आवाज दबाने की कोशिश है, 8. इस विधायक द्वारा अनुचित जुर्माना देने का प्रावधान किया गया है जिसमें वकील पर 3 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, 9. झूठी शिकायतों पर वकीलों को कोई सुरक्षा नहीं दी गई है,10. वकीलों को तुरंत निलंबित करने का प्रावधान किया गया है, 11. इस विधायक द्वारा न्याय प्रणाली में वकीलों की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है और अनुशासनात्मक कार्यवाही डर दिखाकर उनकी आजादी छीनने की साजिश की जा रही है और उन्हें सरकारी गुलाम बनाने की साजिश की आधारशिला रखी जा रही है।

    यहां पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि आखिर अब अधिवक्ताओं पर इस तरह का खतरनाक हमला क्यों किया जा रहा है और उनकी स्वतंत्रता क्यों छीनी जा रही है? इसका मुख्य कारण है कि अधिवक्ता ही सरकार के गलत कानूनों, नीतियों और कार्यों के खिलाफ आवाज उठाते हैं और जिला न्यायालय से उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में आवाज उठाते हैं, सरकार की गलत नीतियों और कार्य प्रणाली का विरोध करते हैं और उन्हें चुनौती देते हैं।

     अधिवक्ताओं की यह जन समर्थक और कानून के शासन के प्रति जरूरी सक्रियता और स्वतंत्रता, पूंजीपतियों और धन्ना सेठों और सरकारी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं, सरकारी विधायकों, सांसदों और सरकार के चाटुकार अधिकारियों और कर्मचारियों को चुभती है। सरकार की इन जन विरोधी नीतियों के खिलाफ जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अधिवक्ता ही जन समर्थक होकर आगे आते हैं, ज्ञापन देते हैं और प्रदर्शन करते हैं और न्यायालयों के मनमाने और गैरकानूनी फैसलों का विरोध और बहिष्कार करते हैं और अपने संघर्ष को मीडिया, अखबारों, टीवी चैनलों के माध्यम से जनता के सामने ले जाते हैं जो पूरे सरकारी हमले को नागवांर लगती है।

      इसके अतिरिक्त अधिवक्ता अपने संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारियों के तहत जनता को सस्ते और सुलभ न्याय की मांग करते हैं, मुकदमों के अनुपात में न्यायालयों के निर्माण की मांग करते हैं, मुकदमों के अनुपात में जज और सरकारी कर्मचारियों की नियुक्तियों की मांग करते हैं, सरकार द्वारा पारित असंवैधानिक और गैरकानूनी नीतियों, नियमों और कानूनों का विरोध करते हैं, उन्हें अदालतों में चुनौतियां देते हैं। सरकार वकीलों की इन स्वतंत्र, निष्पक्ष और ईमानदारीपूर्ण कार्यवाहियों को अपने लिए चुनौतियां समझती है। अतः वह वकीलों की सक्रियता और आजादी को खत्म कर देना चाहती है।

     इसके अलावा, सरकार ने वकीलों के कल्याण के लिए कोई काम नहीं किया है। न्यायालय कहते हैं कि “वकील न्यायिक अधिकारी हैं”, मगर सरकार द्वारा इन न्यायिक अधिकारी वकीलों को कोई मदद नहीं दी गई है। ना तो उनमें से अधिकांश वकीलों के पास चैंबर्स हैं, ना ही जूनियर वकीलों को स्टाइपेंड दिया जाता है, ना ही उनके लिए कोई मेडिकल क्लेम बीमा पॉलिसी है और ना ही 60-65 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग वकीलों को कोई पेंशन का प्रावधान किया गया है। जब वकील इन मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन करते हैं तो यह सब करना सरकार को बुरा लगता है।

      इसके अतिरिक्त सरकार ने अपने विरोधियों को सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स जैसे सरकारी विभागों का दुरुपयोग करके डर धमका दिया है। उनमें से अधिकांश की आवाज बंद कर दी गई है। सरकार ने अपनी नीतियों के विरोधी छात्रों और मजदूरों को अपनी यूनियन बनाने के अधिकारों से वंचित कर दिया है और उन्हें गुलाम जैसी जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया है। उसी प्रकार सरकार अधिवक्ता संशोधन विधेयक 2025 के माध्यम से वकीलों से उनके कानूनी और संवैधानिक अधिकार और आजादी छीनकर उनकी आवाज को दबाना चाहती है, उनकी जान मांगों को स्वीकार करना नहीं चाहती, उनके धरने प्रदर्शन और विरोध करने की आवाज पर पूरी तरीके से पाबंदी लगाना चाहती है और उसे छीन लेना चाहती है तथा उन पर अवांछनीय, अमानवीय, मनमाने एवं गैर कानूनी प्रतिबंध लगा देना चाहती है। उनसे उनका बहिष्कार का कानूनी और संवैधानिक अधिकार छीनकर, उन्हें आधुनिक गुलाम बना देना चाहती है ताकि सरकार की जन विरोधी नीतियों और चालाकियां का कोई विरोध ही ना कर सके।

      सरकार जानती है कि देश और दुनिया के स्तर पर वकील ही सरकार की जन विरोधी, किसान और मजदूर विरोधी नीतियों का विरोध करते आए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इब्राहिम लिंकन, नेल्सन मंडेला, कार्ल मार्क्स, लेनिन और फिदेल कास्त्रो ऐसा करके समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर चुके हैं। आजादी के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जैसे हजारों वकीलों ने अंग्रेज़ों की गुलामी और जन विरोधी नीतियों का विरोध किया था और आजादी की लड़ाई में अहम् भूमिका निभाई थी। वकीलों ने ही भारत के संविधान को बनाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी और भारत के संविधान को जनतांत्रिक, गणतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और सामाजिक न्याय और आपसी भाईचारे के आधुनिकतम मूल्यों से सुसज्जित किया था।

    आज भी सरकारी जुल्म ज्यादतियों और गलत नीतियों और गलत कानूनों का विरोध वकील ही करते हैं, संविधान और कानून के शासन को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, इसलिए सरकार एक साजिश के तहत उनकी इस आजादी को छीन लेना चाहती है, उनकी आवाज को बंद कर देना चाहती है ताकि सरकार की संविधान विरोधी, कानून विरोधी और जन विरोधी नीतियों का नाममात्र का भी कोई विरोध ही ना कर सके, इसलिए इस भयंकर हमले के आलोक में कानून के शासन और संविधान के रक्षक वकीलों के लिए यह जरूरी हो गया है कि समस्त वकील एकजुट होकर अपनी आजादी और अधिकारों पर किये जा रहे इस हमले का मजबूती के साथ विरोध करें। सरकार की इस साजिश को नाकाम करें और अपनी रक्षा करने के लिए जनता समेत किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों के तमाम संगठनों का सहयोग लेकर, सरकार द्वारा वकीलों का गला घोटने उन्हें अपना गुलाम बनाने और उनकी आजादी छीनने की सरकार की इस ख़तरनाक मुहिम को नाकाम करें। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। हम तो यहां पर यही कहेंगे,,,,,

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरी “बार” के
अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे “बार” के
बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहां ये जानकर
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे “बार” के।

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