रोहनकुमार
यूपीए-२ की सबसे अजीब बात यह थी की सरकार के शीर्ष के अधिकारीगण भाजपा के साथ साँठ गाँठ करके सरकार के ख़िलाफ़ षड्यंत्र करने लगे थे और सरकार ने उनपर कोई करवाई नहीं की।
सी॰ए॰जी॰ विनोद राय लगातार मीडिया में सरकार पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगा रहे थे, प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार संजय बारू ‘ऐक्सिडेंटल पी॰एम॰’ लिखकर कांग्रेस सरकार की छवि धूमिल कर रहे थे, सेना प्रमुख वी॰के॰ सिंह भाजपा के इशारे पर लगातार बयानबाज़ी कर रहे थे और पदमुक्त होते ही भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़े और मंत्री भी बने। गृह सचिव आर॰के॰ सिंह जिन्होंने समस्तिपुर ज़िलाधिकारी रहते आडवाणी जी को गिरफ़्तार किया था और ‘हिंदू आतंकवाद’ टर्म कोईन किया था, भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और केंद्र में बड़े मंत्री हैं।
वही क़िस्सा मुंबई पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह का भी है। देखिये, ब्युरक्रैट के मंत्री बनने में समस्या नहीं है, आज जयशंकर सरकार का अंतराष्ट्रीय स्तर पर बहुत लाज बचा रहे हैं, समस्या है पद के दायित्व से मुक्त होते ही दूसरी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने में। इसका मतलब ये हुआ की इतने महत्वपूर्ण पद पर होकर भी ये लोग देश के विषय में नहीं, अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में सोच रहे थे। Cooling Period भी कोई चीज़ होता है।
यू॰पी॰ में ताज़ा क़िस्सा अरविंद शर्मा का है। इस मामले में नीतीश कुमार का दाद देना होगा, अति महत्वाकांक्षी और नाटकीय डी॰जी॰पी॰ गुप्तेश्वर पांडेय को नीतीश जी ने अच्छा सबक़ सीखाया!

