मुनेश त्यागी
27 मार्च 2023 को भारत के कानून और न्याय मंत्री किरण रिजिजू ने पार्लियामेंट में दिए गए बयान में बताया है कि इस समय भारत की 25 उच्च न्यायालय में 360 पद लंबित हैं और जिला स्तर की अदालतों में 5667 न्यायिक अधिकारियों के पद खाली पड़े हुए हैं। इस प्रकार पूरे देश में 6000 से ज्यादा न्यायिक पदों के पद खाली पड़े हुए हैं और इनकी सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है। उन्होंने जानकारी दी है कि खाली पड़े पदों में सबसे ज्यादा पद उत्तर प्रदेश में खाली हैं, जिनमें 58 इलाहाबाद उच्च न्यायालय में और 1200 पद जिला न्यायालय के स्तर पर खाली पड़े हुए हैं।
उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट और जिला स्तर पर न्याय अधिकारी और जज नियुक्त करने के लिए राज्यों की हाईकोर्ट और राज्य सरकार जिम्मेदार हैं। उन्होंने प्रमुखता से जानकारी दी कि इनमें इन पदों को नियुक्त करने में केंद्र सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है और उसका कोई रोल भी नहीं है।
उन्होंने जानकारी दी है कि सर्वोच्च न्यायालय में कोई पद खाली नहीं है। जबकि भारत के 25 उच्च न्यायालयों में 1114 स्वीकृत पदों में से 330 पद खाली पड़े हुए हैं। उन्होंने जानकारी दी है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 160 में से 58 न्यायाधीशों के पद खाली पड़े हुए हैं। इसी तरह से बिहार उच्च न्यायालय में 29, गुजरात उच्च न्यायालय में 23, मध्यप्रदेश में 22, पटना में 21, पंजाब और हरियाणा में 20, मद्रास और राजस्थान में 17 और दिल्ली में 15 उच्च न्यायालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के पद खाली पड़े हुए हैं।
कानून मंत्री ने अपने लिखित उत्तर में जानकारी दी है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 69,511, देश की 25 उच्च न्यायालयों में 59 लाख के लंबित है और इनमें से 10 लाख 3000 मुकदमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित हैं। कानून मंत्री ने यह भी बताया कि दिसंबर में जिला स्तर पर, 4 करोड़, 30 लाख मुकदमों से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं।
उन्होंने जानकारी दी है कि मुकदमों के निपटाने के लिए जजों की संख्या, कोर्ट स्टाफ, अदालतों की संख्या, गवाही, वादकारियों का सहयोग, बार एसोसिएशनों का सहयोग, पुलिस की तफ्तीश एजेंसियों, गवाहों के बयानों और गवाहियों और कानून के सही रूप से इंटरप्रीटेशन और लागू किए जाने पर निर्भर है। ये सारी जानकारियां 11 अप्रैल 2023 के टाइम्स ऑफ इंडिया में दी गई हैं।
मगर यह अफसोस की बात है कि भारत के कानून मंत्री पिछले कई सालों से लगातार यही जानकारी देते आ रहे हैं। क्या यह भारत सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि जनता को सस्ता और सुलभ न्याय सस्ता कम से कम समय में उपलब्ध कराया जाए। भारत का संविधान भी यही निर्धारित करता है वाद कार्यों को सस्ता और सुलभ न्याय कम से कम समय में, कम से कम दूरी में, और कम से कम खर्चे पर मुहैया कराया जाए। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों ने जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने में कोई रुचि नहीं दिखाई है, जनता के साथ अन्याय कर कर रहे कारणों को और समस्याओं को दूर नहीं किया है। और ऐसा करने में लगातार कई वर्षों से कोई रुचि भी नहीं दिखाई है। ऐसे लगता है कि जैसे सरकारें सिर्फ बयान देकर खानापूर्ति कर रही हैं, जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने में उनकी कोई रुचि नहीं है।
मगर हम यह देख रहे हैं कि केंद्र सरकार जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने में अपनी भूमिका नहीं निभा रही है और वह लगातार कोई ना कोई बहाना बना कर मामले को टालती रहती है। हमारा कहना है कि भारत में सस्ते और सुलभ न्याय देने के लिए मुख्य रूप से केंद्र सरकार जिम्मेदार है। केंद्र सरकार सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को, कानून मंत्रियों को बुलाए, बार काउंसिलों के सदस्यों को बुलाए और उनसे बातचीत करें और वे सारे सिद्धांत निर्धारित और प्रतिपादित करे और वे सारे कार्यक्रम बनाएं कि जिससे जनता को समय से, कम से कम खर्चे पर और कम से कम दूरी पर, सस्ता और सुलभ न्याय मिल सके।
केंद्र और राज्य सरकारों की कमियों के कारण जनता के साथ हो रहे इस अन्याय के लिए, उन्हें समय से सस्ता और सुलभ न्याय मिलने के लिए केवल और केवल केंद्र सरकार, राज्य सरकार और देश की हाई कोर्ट्स जिम्मेदार हैं। उनके पास जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने का कोई मार्ग नहीं है, कोई कार्यप्रणाली नहीं है। वे केवल और केवल बयान देकर जनता को ऐसे ही गुमराह करती रहती हैं। हम बिल्कुल सटीक रूप से कह सकते हैं कि जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों के पास कोई रोड मैप नहीं है।

