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*सरकारें सिर्फ़ वोट जुटाने के लिए करती हैं आरक्षण का उपयोग*

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Tej pal Singh ‘Tej’

गांधी बनाम अंबेडकर: सुधार बनाम विद्रोह
ज्ञात हो कि “जाति भेदभाव खत्म करने में धर्म की भूमिका” को समझने के लिए एक
गहन, प्रभावशाली और वृहद प्रस्तावना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
भारतवर्ष, जिसकी पहचान विविधता, आध्यात्मिकता और सहिष्णुता से होती है, उसी
धरती पर एक ऐसी सामाजिक संरचना ने जन्म लिया जिसने मानव गरिमा को वर्गों और
जातियों में बाँट दिया। यह विडंबना ही है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से ओत-प्रोत
संस्कृति में जाति आधारित भेदभाव जैसी अमानवीय व्यवस्था ने गहरी जड़ें जमा लीं। सदियों
तक यह भेदभाव केवल सामाजिक नहीं रहा—यह धार्मिक आस्था, कर्मकांड और ईश्वरीय
विधान के रूप में स्वीकार कर लिया गया। जाति व्यवस्था को धर्म की वैधता देकर ऐसा स्वरूप
दिया गया कि पीड़ित व्यक्ति स्वयं को हीन मानने लगा और शोषक स्वयं को पूजनीय।
यहीं से एक बड़ा प्रश्न उठता है: क्या धर्म ने इस भेदभाव को जन्म दिया, और क्या धर्म
ही इसे समाप्त कर सकता है? इस प्रश्न की प्रासंगिकता केवल ऐतिहासिक नहीं है, यह आज के
भारत में भी जीवित है—जहाँ एक ओर मंदिरों के द्वार खुले हैं, संविधान समता का वचन देता
है, और कानून बराबरी सुनिश्चित करते हैं; वहीं दूसरी ओर जातिगत हिंसा, छुआछूत, और
मानसिक भेदभाव अब भी अनेक रूपों में हमारे समाज में मौजूद हैं। डॉ. अंबेडकर, गांधीजी,
कबीर, रविदास, बुद्ध जैसे महामानवों ने जाति के इस कलंक को मिटाने का प्रयास किया—कभी
संवैधानिक सुधारों से, कभी नैतिक उपदेशों से, और कभी धर्म की नयी व्याख्या से। आज यह
आवश्यक हो गया है कि हम धर्म को पुनर्परिभाषित करें—क्या धर्म का उद्देश्य विभाजन है, या
समावेशन? क्या वह भेदभाव सिखाता है या भाईचारा? इस निबंध में इसी जटिल प्रश्न की तह
में जाकर धर्म और जातिभेद के संबंध की गहराई से पड़ताल करने की कोशिश की गई है।—धर्म
की ऐतिहासिक भूमिका, उसका दोहरा चेहरा, सुधार की संभावनाएँ, और वर्तमान भारत में
इसकी प्रासंगिकता।
भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश में जातिभेद एक ऐसी सामाजिक बुराई है
जिसने सदियों तक इंसान को इंसान से अलग किया। धर्म, जिसे मानवता, प्रेम और समानता का
मार्गदर्शक माना जाना चाहिए था, वह कभी-कभी इस भेदभाव का औजार बन गया। लेकिन
प्रश्न यही है — क्या धर्म ही इस जातिगत अन्याय की जड़ है, या वही धर्म इस अन्याय का
समाधान भी बन सकता है? इस निबंध में हम इसी विरोधाभास की पड़ताल करेंगे।
धर्म की ऐतिहासिक भूमिका: समस्या या समाधान?

भारत में वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति धार्मिक ग्रंथों में वर्णित “ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र” के
वर्गीकरण से मानी जाती है। प्रारंभ में यह व्यवस्था कर्म आधारित थी, परंतु धीरे-धीरे इसे जन्म
आधारित बना दिया गया।
विशेष रूप से मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में वर्णित नियमों ने इसे धार्मिक वैधता प्रदान की। इससे
जातिभेद को ईश्वरीय इच्छा का रूप दिया गया और अस्पृश्यता को एक सामाजिक-सांस्कृतिक
‘नियम’ बना दिया गया। परिणामस्वरूप, धर्म का वह स्वरूप, जो आत्मकल्याण और
सार्वभौमिक भाईचारे पर आधारित होना चाहिए था, वह सामाजिक वर्चस्व और शोषण का
आधार बन गया।


सामाजिक अन्याय के विरुद्ध नैतिकता और संवैधानिकता का द्वंद्व

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जातिगत भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसके
उन्मूलन की प्रक्रिया सदियों से चल रही है। इस प्रक्रिया के दो महानायक—महात्मा गांधी और
डॉ. भीमराव अंबेडकर—इस संघर्ष के दो प्रमुख ध्रुव बनकर सामने आए। दोनों का उद्देश्य एक
ही था: सामाजिक न्याय। किंतु उनके दृष्टिकोण और मार्ग अत्यंत भिन्न थे—एक नैतिक सुधार का
पक्षधर था, तो दूसरा संस्थागत विद्रोह का।


महात्मा गांधी: नैतिक पुनरुत्थान का मार्ग
महात्मा गांधी का विश्वास था कि जातिगत भेदभाव को प्रेम, सत्य और अहिंसा के
माध्यम से समाप्त किया जा सकता है। वे ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग कर दलितों के लिए सम्मान
और समानता की भावना जगाना चाहते थे। गांधीजी का तरीका धार्मिक और नैतिक सुधारवाद
पर आधारित था। वे मानते थे कि लोगों के हृदयों में दया और करुणा जागृत कर, सामाजिक
समरसता लाई जा सकती है। गांधीजी का यह तरीका आदर्शवादी था—वे एक ऐसे समाज की
कल्पना करते थे जहाँ कोई ऊँच-नीच न हो, कोई अस्पृश्यता न हो। किंतु यह पद्धति यथार्थ से
थोड़ा दूर प्रतीत होती है, विशेषतः तब जब समाज की बहुसंख्यक आबादी भयंकर शोषण और
वंचना का शिकार हो।


डॉ. अंबेडकर: संवैधानिक विद्रोह और व्यावहारिक दृष्टिकोण

डॉ. भीमराव अंबेडकर स्वयं उस समाज से आते थे जिसे सदियों से ‘अछूत’ कहकर अपमानित
किया गया। उन्होंने इस पीड़ा को न केवल जिया, बल्कि समझा और जड़ से उखाड़ने का संकल्प
लिया। उनका दृष्टिकोण नैतिक नहीं, व्यावहारिक था। वे मानते थे कि केवल नैतिकता की बातों
से सामाजिक विषमता दूर नहीं होगी, बल्कि इसके लिए संवैधानिक सुरक्षा, कानून और
संस्थागत हस्तक्षेप की आवश्यकता है। उन्होंने भारत का संविधान तैयार करते समय सुनिश्चित
किया कि दलितों और पिछड़े वर्गों को आरक्षण, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा जैसेअधिकार मिलें। उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत में लाखों लोगों को शिक्षा,नौकरी और आत्म-सम्मान की दिशा में प्रगति का मार्ग मिला है।
यह सवाल आज भी प्रासंगिक है: क्या डॉ. अंबेडकर का संवैधानिक मार्ग जातिगत भेदभाव को
पूर्णतः समाप्त करने में सफल रहा है? उत्तर आंशिक रूप से ‘हाँ’ है। प्रगति हुई है, बदलाव आए
हैं, अवसर बढ़े हैं। लेकिन क्या समाज पूरी तरह जातिहीन बन पाया है? नहीं। जातिगत भेदभाव
आज भी विभिन्न रूपों में जीवित है—कभी सामाजिक दूरी के रूप में, तो कभी मानसिक पूर्वाग्रह
के रूप में। इसलिए कहा जा सकता है कि संवैधानिक उपाय जरूरी तो हैं, पर पर्याप्त नहीं।
धर्म और शोषण का सम्बन्ध
अंबेडकर की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि जातिवाद को धर्म के नाम पर वैधता दी गई थी।
धार्मिक ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था को शाश्वत और ईश्वरीय व्यवस्था घोषित किया गया, जिससे
समाज में ऊँच-नीच को धार्मिक आस्था से जोड़ा गया। अंबेडकर ने साहस के साथ इस व्यवस्था
को चुनौती दी। उन्होंने पूछा—क्या धर्म केवल शोषण की व्यवस्था का नाम है? अंततः उन्होंने
हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपनाया—एक ऐसा धर्म जो समानता, तर्क और करुणा पर
आधारित था। उनके इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया कि वे सुधार नहीं, संरचनात्मक क्रांति के
पक्षधर थे।
आज की आवश्यकता: अंतर्मन का परिवर्तन
संवैधानिक परिवर्तन बाहरी ढांचे को सुधारते हैं, परंतु जब तक लोगों के मन में
समानता, करुणा और गरिमा की भावना नहीं जागृत होती, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा
रहेगा। गांधीजी के नैतिक आग्रह और अंबेडकर के कानूनी आग्रह के बीच जो शून्य है, उसे भरने
की आवश्यकता है—एक ऐसी क्रांतिकारी चेतना से जो व्यक्ति को भीतर से बदल दे। हमें धर्म,
जाति और समाज की उन अवधारणाओं पर पुनर्विचार करना होगा जिनके आधार पर भेदभाव
पनपा। हमें धर्म की परिभाषा बदलनी होगी—वह धर्म जो मानव को जोड़ता है, न कि तोड़ता
है; जो शांति लाता है, न कि शोषण।
महात्मा गांधी और डॉ. अंबेडकर—दोनों ने सामाजिक न्याय की दिशा में अतुलनीय
योगदान दिया। एक ने नैतिकता का दीप जलाया, दूसरे ने कानून की मशाल। दोनों ही आवश्यक
थे, परंतु आज आवश्यकता है कि हम न केवल समाज के ढांचे को बदलें, बल्कि अपने भीतर के
पूर्वाग्रहों को भी जड़ से उखाड़ फेंकें। क्योंकि जब तक हमारे विचार जातिहीन नहीं होंगे, तब तक
हमारा समाज भी जातिहीन नहीं हो सकता।


डॉ.अंबेडकर के संवैधानिक सुधारों के वर्तमान उदाहरण:

डॉ. भीमराव अंबेडकर के संवैधानिक सुधारों की विरासत आज भी जीवंत और
प्रभावशाली है। उन्होंने जो संवैधानिक ढाँचा तैयार किया था, वह केवल कागज़ी नहीं रहा,
बल्कि आज भारत के करोड़ों लोगों के जीवन में प्रत्यक्ष रूप से दिखता है। यहाँ पर डॉ. अंबेडकर
के संवैधानिक सुधारों के 6 प्रमुख वर्तमान उदाहरण दिए जा रहे हैं:

  1. आरक्षण प्रणाली (Reservation System) : संविधान में अनुच्छेद 15(4), 16(4), और 340
    के तहत SC, ST और OBC वर्गों को शिक्षा, नौकरियों और राजनैतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण
    मिला हुआ है। आज भी UPSC, NEET, JEE, और राज्य सेवाओं की परीक्षाओं में आरक्षण लागू है।
    सरकारी नौकरियों में आरक्षित सीटों के कारण लाखों लोगों को पहली पीढ़ी के सरकारी
    कर्मचारी बनने का अवसर मिला है। किंतु अफसोस कि इस प्रावधान के क्रियांवयन के प्रति
    वर्तमान सरकार की बेरुखी साफ तौर पर देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण अधिकातर
    सरकारी संस्थाओं का निजीकरण है, जहाँ आरक्षण का अभी तक भी कोई प्रावधान कियाग गया
    है।
  2. राजनैतिक प्रतिनिधित्व : अनुच्छेद 330–334: अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए संसद
    और विधानसभाओं में आरक्षित सीटें — आज देश की लोकसभा और विधानसभाओं में SC/ST
    वर्ग के सांसद और विधायक एक निश्चित संख्या में प्रतिनिधित्व पा रहे हैं। यह प्रतिनिधित्व
    निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करता है। शुरू में यह केवल 10
    सालों के लिए लागू किया गया था किंतु इसी प्रतिवर्ष सत्ता पक्ष द्वारा अपने राजनीतिक हित
    साधने के लिए बढ़ा दिया जाता रहा है।
  3. शैक्षणिक संस्थानों में विशेष अवसर : संवैधानिक प्रावधानों और संसद द्वारा बनाए गए
    क़ानूनों के आधार पर सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के
    साथ-साथ छात्रवृत्तियाँ, कोचिंग योजनाएँ, और विशेष प्रवेश कार्यक्रम चलते हैं। JNU, DU, IITs,
    IIMs और अन्य संस्थानों में हजारों दलित, आदिवासी, और पिछड़े वर्ग के छात्र शिक्षा पा रहे हैं।
    लेकिन वर्तमान सरकार इन संस्थाओं के स्तर को गिराने ही नहीं अपितु इनके वर्चस्व को मिटाने
    की कोशिश भी की जा रही हैं। जिसके प्रति राजनीतिक कारण स्पष्ट रूप से दिखता है।
  4. अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act, 1989):
    अत्याचारों से सुरक्षा हेतु विशेष कानून : यह अधिनियम डॉ. अंबेडकर की सोच को आगे बढ़ाता
    है—जहाँ संविधान सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, सुरक्षा का व्यवहारिक ढांचा भी बनता है। यह
    अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि अगर SC/ST समुदाय के किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव,
    हिंसा या अपमान होता है, तो कड़ी सज़ा दी जाए।
  5. सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण योजनाएँ : संविधान की प्रस्तावना और भाग IV
    (Directive Principles)

    Stand-Up India, Dalit Venture Capital Funds, Post-Matric Scholarship, Ambedkar
    Foundation, आदि योजनाएँ सीधे तौर पर सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं। इन योजनाओं से
    लाखों लोगों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करने का प्रावधान है।
  6. ‘न्यूनतम शिक्षा का अधिकार’ और ‘न्याय तक पहुँच’ :
    अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार, Legal Services Authority Act, 1987
    सभी बच्चों के लिए मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी—यह डॉ. अंबेडकर के “शिक्षित
    बनो” के नारे की संवैधानिक गूंज है। ग़रीबों और वंचितों को मुफ़्त क़ानूनी सहायता उपलब्ध
    कराना, ताकि वे अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें। डॉ. अंबेडकर ने जो बीज संविधान में बोया
    था, आज वह एक बड़ा, जीवंत वृक्ष बन चुका है। उनके द्वारा शुरू किए गए सुधार केवल
    ऐतिहासिक नहीं, बल्कि आज भी करोड़ों भारतीयों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं।
    क्या इन सुधारों में कोई वर्तमान चुनौतियां हैं?
    आरक्षण” आज भी समाज में विवाद और असंतुलन का विषय बना हुआ है। आरक्षण का
    विरोध कुछ वर्गों द्वारा किया जाता है, जो इसे “मेरिट के खिलाफ” मानते हैं। EWS आरक्षण
    (General Category के ग़रीबों के लिए) के आने के बाद एक नई बहस खड़ी हो गई है: क्या अब
    आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए या सामाजिक भेदभाव पर? असली हकदारों तक
    आरक्षण का लाभ पहुँचाने में “क्रीमी लेयर” जैसी जटिलताएँ भी पैदा की जा रही हैं।
  7. जातीय हिंसा और सामाजिक भेदभाव अभी भी ज़िंदा है :
    संविधान भले ही बराबरी की बात करता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है।
    ग्रामीण इलाकों में आज भी अस्पृश्यता, दलित उत्पीड़न, जमीन पर कब्जे, और भेदभाव के
    हज़ारों मामले हर साल सामने आते हैं। SC/ST Act के बावजूद न्याय मिलने में देरी और
    पुलिस/प्रशासन की निष्क्रियता आम समस्याएँ हैं।
  8. शैक्षिक और आर्थिक अवसरों की असमानता:
    आरक्षण से प्रवेश मिल जाता है, लेकिन उसके बाद क्या? कई बार वंचित वर्गों के छात्र
    शैक्षिक सहायता और समावेशी माहौल के अभाव में कॉलेज या कोर्स बीच में छोड़ देते हैं। भाषा
    की बाधा, मनोवैज्ञानिक दबाव, और छुपे हुए भेदभाव (subtle discrimination) भी समस्याएं
    हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता।
  9. संवैधानिक सुधारों का राजनीतिक उपयोग और दुरुपयोग :

अंबेडकर का सपना “सशक्तिकरण” था, लेकिन आज वह “वोट बैंक” बन गया है। कई
बार सरकारें आरक्षण या अन्य नीतियों का उपयोग सिर्फ़ राजनीतिक लाभ के लिए करती हैं, न
कि वास्तविक सशक्तिकरण के लिए। इससे सुधारों की साख पर सवाल खड़े होते हैं और समाज
में ध्रुवीकरण (polarization) बढ़ता है।

  1. जागरूकता की कमी और सामाजिक चेतना की धीमी गति :
    संविधान ने अधिकार दिए, लेकिन क्या सभी जानते हैं कि उनके पास ये अधिकार हैं?
    ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में बहुत से लोगों को आज भी अपने मूल अधिकारों की जानकारी
    नहीं है। समाज में अब भी जातिगत पहचान ही सामाजिक सम्मान का आधार मानी जाती है।
    इस मानसिकता को बदलने में शिक्षा, संवेदना और संवाद की भारी कमी है।
    डॉ. अंबेडकर ने जो संविधान हमें दिया, वो अब भी जीवंत है — लेकिन उसकी आत्मा तभी पूरी
    होगी जब समाज मन से भी बराबरी को स्वीकार करेगा, न कि केवल क़ानून से।
    इन चुनौतियों से लड़ने के लिए अब हमें: शिक्षा को अधिक सशक्त बनाना होगा,
    सामाजिक चेतना को जागरूक करना होगा और संवैधानिक मूल्यों को केवल किताबों में नहीं,
    ज़िंदगी में उतारना होगा।
    जाति भेदभाव खत्म करने में धर्म की भूमिका?
    “जातिभेद खत्म करने में धर्म की भूमिका” एक ऐसा विषय है जो भारत की आत्मा से
    जुड़ा हुआ है। धर्म जहाँ समाज को जोड़ सकता है, वहीं इतिहास में हमने देखा है कि इसी धर्म के
    नाम पर जातिगत भेदभाव को “वैध” ठहराया गया। इसे समझने के लिए ये दो पहलू मुख्य हैं:
  2. धर्म ने जातिभेद को कैसे जन्म दिया या बनाए रखा? (नकारात्मक भूमिका)
    1.1. धार्मिक ग्रंथों की व्याख्याएँ : कुछ धार्मिक ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था का वर्णन मिलता है—जैसे
    कि मनुस्मृति और कुछ पुराणों में। इन ग्रंथों की पारंपरिक व्याख्या के अनुसार, समाज को ऊँच-
    नीच में बाँट दिया गया—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और फिर “अवर्ण” (अछूत) तक।
    1.2. धर्म के नाम पर मानसिक-अनुकूलन (conditioning) : लोगों के मन में ये बैठा दिया गया
    कि यह भेदभाव ईश्वर की इच्छा है, इसलिए इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।इससे जातिगत
    ऊँच-नीच को आध्यात्मिक वैधता मिल गई और यह सदियों तक समाज में बना रहा।
    1.3. धार्मिक सत्ता का केंद्रीकरण : धर्म के ठेकेदारों (पुजारी वर्ग) ने अपने विशेषाधिकार बनाए
    रखने के लिए जातिभेद को बनाए रखा। धार्मिक कर्मकांड और पूजा-अर्चना पर एक विशेष
    जाति का एकाधिकार स्थापित हो गया। धर्म ने जातिभेद को न केवल जन्म दिया, बल्कि उसे
    बनाए रखने का औज़ार भी बन गया।
  3. क्या धर्म जातिभेद मिटा सकता है? (सकारात्मक भूमिका)
    2.1. धर्म में सुधार और नव व्याख्या की शक्ति : कई संतों, सुधारकों और गुरुओं ने जाति-
    आधारित भेदभाव का विरोध किया—संत रविदास, कबीर, गुरु नानक, स्वामी दयानंद, बुद्ध,
    बसवन्ना, और यहाँ तक कि गांधीजी ने भी। इन सुधारकों ने बताया कि सच्चा धर्म वो है जो प्रेम,
    करुणा, और समता सिखाए। संत रविदास: “जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का
    होई।”
    धार्मिक सुधार आंदोलन: नई व्याख्या और समता की पुकार
    धर्म के इस रूढ़िवादी स्वरूप के विरुद्ध भारत में कई संतों और सुधारकों ने आवाज़
    उठाई:
    संत कबीर: “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।”
    संत रविदास: “सबको एक समान समझो, सबमें एक ही आत्मा है।”
    गुरु नानक: “एक ओंकार सतनाम” — सब एक ही परम सत्ता से उत्पन्न हैं।
    बुद्ध: “न जाति से, कर्म से महान बनो।”
    स्वामी दयानंद: “वेदों में जातिवाद नहीं है, यह बाद में जोड़ा गया।”
    इन सुधारकों ने धर्म की पुनर्व्याख्या करते हुए उसे समानता, करुणा और विवेक से
    जोड़ा। उन्होंने दिखाया कि सच्चा धर्म जाति नहीं देखता, केवल मनुष्यत्व देखता है।
    डॉ. अंबेडकर: संवैधानिक और धार्मिक प्रतिरोध :
    डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जातिभेद को जड़ से खत्म करने का प्रयास किया — संविधान
    निर्माण के माध्यम से भी, और व्यक्तिगत निर्णयों से भी। उन्होंने संविधान में समानता का
    अधिकार, अस्पृश्यता उन्मूलन, आरक्षण, और मौलिक अधिकारों की नींव रखी। परंतु उन्होंने यह
    भी समझा कि जब तक जातिभेद को धार्मिक वैधता मिलती रहेगी, तब तक समाज परिवर्तन
    अधूरा रहेगा। इसलिए, 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया — यह कहते हुए कि उन्हें ऐसा
    धर्म चाहिए जो न सिर्फ़ समानता की बात करे, बल्कि जातिवाद को स्पष्ट रूप से नकारे। उन्होंने
    कहा: “मैं उस धर्म को मानता हूँ जो समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की शिक्षा देता है।”
    वर्तमान भारत में धर्म की भूमिका: चुनौती और संभावना : आज भारत में धर्म दो छोरों पर
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