अंत में उतनी आबादी भी नहीं बची
जितना बुरका सिल दिया गया था….!
बुरके को बर्बाद तो कर नहीं सकते थे….!
अगर बुरका बना है तो उसे पहनाया भी जाएगा.
बंकर की मीटिंग में फ़ैसला हुआ.
सारे शिक्षकों को बुरका पहना दो….!
बुरका फिर भी बच गया.
तो सारे सिपाहियों को बुरका पहना दो….!
बुरका फिर भी बच गया.
तो हर बंदूक को बुरका पहना दो….!
बुरका फिर भी बच गया.
तो सरकार ने एलान किया
कि जो भी यह बताएगा
कि इन बुरकों का क्या किया जाए
उसे इनाम में ढेर सारे गोले-बारूद दिए जाएंगे…!
कई दिनों तक सन्नाटा रहा.
कोई सहम कर. कोई वहम कर.
आगे कोई नहीं आया….!
आख़िरकार उलेमाओं ने ही किताबें खंगालीं
फिर हुक्म दिया कि हमारे मुल्क में
कोई भी जानवर नंगा नहीं घूमेगा…!
और जो भी पेड़-पौधे बेशर्मी से नंग-धड़ंग खड़े हैं
सबको बुरका पहनाओ…!
बुरका फिर भी बच गया और कुछ उलेमा भी…!
–फ़रीद ख़ान ,जनहितैषी कवि,शायर,संपर्क-अनुपलब्ध
प्रस्तुतकर्ता-डॉक्टर हूबनाथ,संपर्क-+91 98195 01044

